सरल लोलक

  • सरल लोलक

एक दृढ आधार से डोरी के माध्यम से बंधे हुए पिंड को सरल लोलक कहा जाता हैं|

आवर्तकाल (T):

सरल लोलक के द्वारा एक चक्कर पूर्ण करने में लिया गया समय अंतराल आवर्तकाल कहलाता हैं|

आवर्तकाल =1/आवृति(n)

मात्रक=सैकिंड/मिनट/घंटा

सरल लोलक का आवर्तकाल रस्सी की लम्बाई,गुरुत्त्वीय त्वरण तथा ताप आदि कर मान पर निर्भर करता है|

  1. यदि सरल लोलक तथा इस पर आधारित युक्तियों को ऊँचाई या गहराई पर ले जाया जाए तो गुरुत्त्वीय त्वरण का मान कम हो जाता है अर्थात आवर्तकाल बढ़ जाता है|
  2. सामान्यत गर्मी के दिनों में रस्सी की लम्बाई बढ़ जाती हैं अर्थात आवर्तकाल का मान बढ़ जाता है|जबकि सर्दी के दिनों में रस्सी की लम्बाई घट जाती है इसलिए आवर्तकाल का मान कम हो जाता है|
  3. यदि सरल लोलक या इस पर आधरित युक्तियों को कृत्रिम उपग्रह या अन्तरिक्ष में ले जाया जाए तथा गुरुत्त्वीय त्वरण का मान शून्य हो जाए तो आवर्तकाल का मान अनंत हो जाता हैं|अत:सरल लोलक व इस पर आधारित युक्तियाँ यहाँ पर गतिशील नही होती हैं|
  4. झुला झूलते समय एक व्यक्ति के पास दूसरा व्यक्ति आकर बैठ जाए तो झूले की गति या आवर्तकाल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है जबकि झूला झूलने वाला व्यक्ति अचानक खड़ा हो जाए तो लम्बाई कम होने के कारण आवर्तकाल का मान कम हो जाता है तथा झूला तीव्र गति से चलने लगता हैं|
  5. आवृति-सरल लोलक द्वारा 1 सेकिंड में लगाए गए चक्करों की संख्या आवृति कहलाती हैं|

n=1/T sec-1,Hz ,साइकिल/सेकण्ड

 स्प्रिंग लोलक: 

  • स्प्रिंग लोलक का आवर्तकाल सामान्यत पिंड के पदार्थ की प्रकृति,स्प्रिंग के पदार्थ की प्रकृति ,स्प्रिंग नियतांक तथा पिंड के द्रव्यमान पर निर्भर करता है|
  • द्रव्यमान के साथ परिवर्तन-स्प्रिंग लोलक का आवर्तकाल पिंड के द्रव्यमान के वर्गमूल के समानुपाती पाया जाता है|
  • स्प्रिंग नियतांक के साथ परिवर्तन-आवर्तकाल का मान स्प्रिंग नियतांक के वर्गमूल के व्युत्क्रमानुपाती पाया जाता हैं|
  • पदार्थ की प्रकृति के साथ परिवर्तन-भिन्न-2 पदार्थो से बनी हुई स्प्रिंग के स्प्रिंग नियतांक अलग-2 पाये जाते है इसलिए आवर्तकाल भी अलग-2 होता हैं|

स्प्रिंग संयोजन तथा स्प्रिंग नियतांक:-

यदि स्प्रिंगो को श्रेनी क्रम  में संयोजित कर दिया जाए तो

1/k=1/k1+1/k2

k1=k1k2/k1+k2

समांतर क्रम संयोजन –

k1= k1+k2

नोट:-

1.सरल आवर्त गति में जब पिंड माध्य स्थिति से गुजरता है तो पिंड का वेग अधिकतम पाया जाता है अर्थात गतिज ऊर्जा का मान अधिकतम होता है|

2.पिंड पर लगने वाले प्रत्यानयन बल का मान शून्य पाया जाता है अर्थात पिंड के त्वरण का मान शून्य पाया जाता है अर्थात स्थितिज ऊर्जा का मान न्यूनतम प्राप्त होता हैं|

3.जब पिंड उच्चतम बिंदु पर पाया जाता है तो स्थितिज ऊर्जा का मान अधिकतम व गतिज ऊर्जा का मान न्यूनतम पाया जाता हैं|साथ ही पिंड पर लगने वाले प्रत्यानयन बल,त्वरण का मान अधिकतम प्राप्त होता है और पिंड का वेग न्यूनतम प्राप्त होता है|

सरल आवर्त गति में –

1.विस्थापन –जब पिंड माध्य स्थिति पर होता है तब शून्य होता है और उच्चतम स्थिति पर पिंड के उपस्थित होने पर विस्थापन का मान अधिकतम व आयाम के बराबर पाया जाता है|

2.वेग –ज्यावक्रीय फलन/कोणीय विस्थापन में परिवर्तन की दर वेग कहलाती है|

3.त्वरण-वेग में परिवर्तन की दर को त्वरण कहा जाता हैं|

4.  ऊर्जा पिंड की गतिज ऊर्जा K.E.= ½ mv2

स्थितिज ऊर्जा P.E.=किसी पिंड की स्थिति के कारण उत्पन्न कार्य करने की क्षमता स्थितिज ऊर्जा कहलाती हैं|

P.E.= mgh

नोट:-

स्प्रिंग में संकुचन के दौरान संचित स्थितिज ऊर्जा को ज्ञात करने के लिए सामान्यत:       1/2 k(A2Y2) सूत्र का उपयोग किया जाता है|

5.प्रत्यानयन बल-पिंड की गति के दौरान पिंड पर माध्य स्थिति की ओर आरोपित होने वाला बल प्रत्यानयन बल कहलाता हैं|

इस बल का मान पिंड के विस्थापन के समानुपाती व दिशा विपरीत पाई जाती हैं|

F=-ky