आवर्त सारणी के गुणों में आवर्तीता [Charactor of Aavrt Saarni]

विभिन्न राशियों में आवर्तीकरण:-

  1. आयनन विभव
  2. इलेक्ट्रोन बन्धुता
  3. विद्युत् ऋणता
  4. त्रिज्या
  5. संयोजकता

1.आयनन विभव:-

किसी विलगित गैसीय परमाणुके सबसे बाहरी कोश में सबसे ढीले बंधे इलेक्ट्रोन को निकालने के लिए दी जाने वाली ऊर्जा आयनन विभव कहलाती हैं|

  • आयनन विभव एक उष्माशोषी(एंडोथर्मिक) प्रक्रम हैं|
  • आयनन विभव का मान धातुओं के लिए ज्ञात किया जाता हैं|
  • इकाई-ev/atom ,jule/atom ,kailory/atom
  • किसी भी धात्विक परमाणु के लिए क्रमागत आयनन विभवो के मान लगातार बढ़ते जाते हैं|
  • [I.P.1<I.P.2<I.P.3——–]
  • आयनन विभव में एंथेल्पी परिवर्तन धनात्मक पाया जाता हैं|

आयनन विभव को प्रभावित करने वाले कारक-

1.परमाणु आकार –

  • परमाणु आकार का मान बढने पर आयनन विभव का मान कम हो जाता है क्योंकि नाभिक के द्वारा बाह्यतम कोश के इलेक्ट्रोन को आकर्षित करने की क्षमता कम हो जाती है|
  • अत: आयनन विभव = 1/परमाणु आकार

नोट-

  • आवर्त सारणी में सर्वाधिक आयनन विभव अक्रिय गैसों का [He] का पाया जाता हैं|जबकि न्यूनतम आयनन विभव क्षारीय धातुओं का [Cs] का पाया जाता हैं|
  • एक वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर लगातार कोशो की संख्या बढती जाती है इसलिए आयनन विभव का मान कम होता जाता हैं|

Li>Na>K>Rb>Cs

2.प्रभावी नाभिकीय आवेश-

  • इसका मान बढने पर परमाणु का आकार संकुचित होता जाता हैं अत:उसमें से इलेक्ट्रोन निकालने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती हैं|
  • आयनन विभव =प्रभावी नाभिकीय आवेश
  • सामान्यत एक आवर्त में बायीं से दाई ओर जाने पर प्रभावी नाभिकीय आवेश का मान बढ़ता जाता हैं अत: आयनन विभव का मान बढ़ता जाता हैं|

3.इलेक्ट्रानिक विन्यास-

  • स्थाई इलेक्ट्रोनिक विन्यास में से इलेक्ट्रोन निकालने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती हैं|
  • इलेक्ट्रोनिक विन्यास का स्थायित्त्व क्रम –पूर्ण पूरित >अर्द्ध पूरित >विषम पूरित
  • आयनन विभव = इलेक्ट्रोनिक विन्यास का स्थायित्त्व

4.भेदन क्षमता-

  • किसी परमाणु में कोश के अंतर्गत उपस्थित उपकोशो में भेदन क्षमता का क्रम
  • S>P>D>F
  • अत: आयनन विभव = भेदन क्षमता
  • द्वितीय आवर्त के तत्वों के आयनन विभव-
  • Li<B<Be<C<N<O<F<Ne

2.इलेक्ट्रोन बन्धुता-

किसी विलगित गैसीय परमाणु के सबसे बाह्यतम कोश में इलेक्ट्रोन जोड़ने के फलस्वरूप निकलने वाली ऊर्जा के मान को इलेक्ट्रोन बन्धुता कहते हैं|

  • सामान्यत:इलेक्ट्रोन बन्धुता [प्रथम इले. बन्धुता]ऊष्माक्षेपी प्रक्रम होता हैं|अर्थात एन्थलैपी परिवर्तन का मान ऋणात्मक पाया जाता हैं|जबकि द्वितीय,तृतीय आदि इलेक्ट्रोन बन्धुताएं ऊष्माशोषी होती हैं|
  • इलेक्ट्रोन ब्न्धुताओं के मान सामान्यत:अधात्विक तत्वों के लिए ज्ञात किये जाते हैं|
  • आवर्त सारणी में न्यूनतम इलेक्ट्रोन बन्धुता क्षारीय धातुओं की जबकि अधिकतम हैलोजन परिवार के तत्वों की पाई जाती हैं|

इलेक्ट्रोन बन्धुता को प्रभावित करने वाले कारक-

  1. परमाणु आकार –
  • परमाणु आकार का मान बढने पर नाभिकीय आकर्षण बल का मान कम हो जाता हैं|अत:एलेक्त्रों बन्धुता का मान भी कम हो जाता हैं|
  • इलेक्ट्रोन बन्धुता =1/परमाणु आकार
  • एक वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर परमाण्विक आकार का मान बढ़ता जाता हैं|इसलिए इलेक्ट्रोन बन्धुता का मान सामान्यत: कम होता जाता हैं|
  • Be>Mg>Ca>Sr>Ba
  • C >Si >Ge >Sn >Pb

2.प्रभावी नाभिकीय आवेश-

  • प्रभावी नाभिकीय आवेश का मान बढने पर परमाणु के द्वारा इलेक्ट्रोन ग्रहण करने की प्रवृति बढ़ जाती हैं|अत: इलेक्ट्रोन बन्धुता का मान बढ़ जाता हैं|
  • इलेक्ट्रोन बन्धुता = प्रभावी नाभिकीय आवेश
  • इलेक्ट्रोनिक विन्यासो का स्थायित्त्व:
  • किसी भी तत्व के बाह्यतम कोश में इलेक्ट्रोन जोड़ने के फलस्वरूप विषमपूरित इलेक्ट्रोनिक विन्यास अर्द्धपूरित  या पूर्ण पूरित इलेक्ट्रोनिक विन्यास में परिवर्तित हो जाता हैं|तो इलेक्ट्रोन बन्धुता का मान बढ़ जाता हैं|जबर्दपूरित या पूर्ण पूरित से विषम पूरित विन्यास प्राप्त होता हैं तो इलेक्ट्रोन बन्धुता का मान बढ़ जाता हैं|
  • अत: इलेक्ट्रोन बन्धुता = इलेक्ट्रोन विन्यास का स्थायित्त्व

नोट-

  • 1A वर्ग के तत्वों की इलेक्ट्रोन बन्धुता 2 A वर्ग के तत्वों से अधिक पायी जाती हैं|
  • 4 A वर्ग के तत्वों की इलेक्ट्रोन बन्धुता 5 A वर्ग के तत्वों से अधिक पायी जाती हैं|क्योंकि इलेक्ट्रोन जोड़ने के पश्चात विषमपूरित इलेक्ट्रोनिक विन्यास अर्द्धपूरित या पूर्ण पूरित इलेक्ट्रोनिक विन्यास में परिवर्तित हो जाते हैं|
  • Be <Li <B <N < C <O < F

3.पृष्ठीय आवेश घन्त्त्व-

  • सामान्यत: p खंड के तत्वो में द्वितीय आवर्त के तत्वों पर उच्च पृष्ठीय आवेश घन्त्त्व पाया जाता हैं|जबकि तृतीय आवर्त के तत्वों पर पृष्ठीय आवेश घन्त्त्व का मान द्वितीय आवर्त के तत्वों की तुलना में कुछ कम हो जाता हैं| अत: द्वितीय आवर्त के तत्व जुड़ने वाले इलेक्ट्रोनो को प्रतिकर्षित करते हैं|जिसके कारण इलेक्ट्रोन ब्न्धुताओ के मान तृतीय आवर्त के तत्वों से कम हो जाते हैं|
  • Cl >F >Br >I
  • S >O >Se >Te >Po
  • P >N >As >Sb >Bi

3.विद्युत् ऋणता:-

किन्ही दो बंधित परमाणुओं में बंध के इलेक्ट्रोनो को परमाणु के द्वारा आकर्षित करने की क्षमता को परमाणु की विद्युत् ऋणता कहा जाता हैं|

  • विद्युत् ऋणता इकाई रहित राशि हैं|
  • अक्रिय गैसों की विद्युत् ऋणता शून्य होती हैं|
  • न्यूनतम विद्युत् ऋणता क्षारीय धातुओं की तथा अधिकतम विद्युत् ऋणता हैलोजन वर्ग के तत्वों के फ़्लोरिन की पाई जाती हैं|
  • विद्युत् ऋणता एक सापेक्ष राशि हैं|आवर्त सारणी में सभी तत्वों की विद्युत् ऋणताऐ हाइड्रोजन तत्व के सापेक्ष मानी गई हैं|

विद्युत् ऋणता को प्रभावित करने वाले कारक :-

  • आवर्त व वर्ग में सतत रूप से परिवर्तित होने वाली एकमात्र राशि हैं|

1.परमाणु आकार

  • किसी भी परमाणु का आकार बढने पर उस परमाणु के नाभिक के द्वारा बंध में बंधित इलेक्ट्रोन को आकर्षित करने की क्षमता कम हो जाती हैं|
  • विद्युत् ऋणता =1/ परमाणु आकार
  • एक ही वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर कोशो की संख्या बढने के कारण परमाणु आकार बढ़ता जाता हैं|अत: विद्युत् ऋणता के मान कम हो जाते हैं|

2.प्रभावी नाभिकीय आवेश-

  • प्रभावी नाभिकीय आवेश का मान बढने पर परमाणु के द्वारा बंधित इलेक्ट्रोनो को आकर्षित करने की क्षमता बढ़ जाती हैं|
  • विद्युत् ऋणता = प्रभावी नाभिकीय आवेश
  • एक आवर्त में बायीं से दायीं ओर जाने पर प्रभावी नाभिकीय आवेश का मान बढ़ जाता हैं|अत: विद्युत् ऋणता का मान भी बढ़ जाता हैं|
  • Li 1.0 <Be 1.5  <B  2.0 <C  2.5 < N  3.0 < O 3.5  < F 4.0

4.परमाण्विक त्रिज्या

  • किसी भी परमाणु मे नाभिक से बाह्यतम कोश के मध्य की दूरी परमाण्विक त्रिज्या कहलाती हैं|
  • सामान्यत: त्रिज्याए 4 प्रकार की पाई जाती हैं|
  • सहसंयोजक त्रिज्या
  • धात्विक त्रिज्या
  • आयनिक त्रिज्या
  • वांडरवाल त्रिज्या

उपरोक्त चारो त्रिज्याओ की त्रिजायाओ का बढ़ता हुआ क्रम :-

आयनिक त्रिज्या < सहसंयोजक त्रिज्या < धात्विक त्रिज्या < वांडरवाल त्रिज्या

1.सहसंयोजक त्रिज्या (sbcr);-

  • सामान्यत:सहसंयोजक यौगिक दो प्रकार के पाये जाते हैं|
  • अध्रुवीय सहसंयोजक यौगिक –इस प्रकार के यौगिको के निर्माण समान प्रकार के परमाणुओ के संयोजन या अतिव्यापन से होता हैं|
  • Rcr =d/2
  • अध्रुवीय एकल बंधित सहसंयोजक अणु में अंतरनाभिकीय दूरी का आधा मान सहसंयोजक त्रिज्या कहलाती हैं|
  • ध्रुवीय सहसंयोजक यौगिक – वे सहसंयोजक यौगिक या अणु जिनमे विषम परमाणुओ के मध्य सहसंयोजक बंध उपस्थित पाया जाता हैं|
  • इस प्रकार के यौगिको में दो परमाणुओ के मध्य बंधित इलेक्ट्रोन अधिक विद्युत् ऋणी परमाणु की तरफ विस्थापित हो जाते हैं|जिसके कारण परमाणुओ पर आंशिक आवेश उत्पन्न हो जाता हैं|अधिक विद्युत् ऋणी पर आंशिक ऋणआवेश  जबकि कम विद्युत् ऋणी पर धनावेश आ जाता हैं|
  • ध्रुवीय सहसंयोजक बंध में बंध लम्बाई का मान कुछ कम हो जाता हैं तथा बंध ऊर्जा का मान कुछ बढ़ जाता हैं|
  • बंध ऊर्जा = 1/बंध लम्बाई =विद्युत् ऋणता
  • शुमाकर व स्टीवेंसन नामक वैज्ञानिकों ने ध्रुवीय सहसंयोजक बन्धो की बंध लम्बाई व त्रिज्या ज्ञात करने के लिए निम्न सूत्र का प्रतिपादन किया|
  • dA-B = rA+rB -0.09 (XA – X B)
  • H-F ,H –Cl ,H-Br ,H -I

धात्विक त्रिज्या –

  • किसी धात्विक क्रिस्टल जालक में दो समीपवर्ती धातु परमाणुओ के अंतर नाभिकीय दूरी का आधा मान धात्विक त्रिज्या कहलाता हैं|
  • rmr =d/2
  • धात्विक त्रिज्या का मान धात्विक बंध की सामर्थ्य पर निर्भर करता हैं|
  • धात्विक बंध सामर्थ्य = 1/ धात्विक बंध की लम्बाई
  • नोट

  • d व f ब्लांक के तत्वों में मुख्यत धात्विक त्रिज्याए पाई जाती है जबकि p ब्लाक के तत्वों में सहसंयोजक व s ब्लाक के तत्वों में आयनिक त्रिज्या पाई जाती हैं|

वांडरवाल त्रिज्या –

सहसंयोजक अणुओ में दो निकटतम बंधित परमाणुओ के मध्य की अंतरनाभिकीय दूरी का आधा मान वांडर वाल त्रिज्या के नाम से जाना जाता हैं|

  • सामान्यत यह त्रिज्या अधात्विक तत्वों के बीच पाई जाती हैं|
  • rvwr =d/2
  • सहसंयोजक अणुओ के मध्य वांडरवाल त्रिज्याए पाई जाती हैं|

आयनिक त्रिज्या –

किसी भी प्रकार के आयन में नाभिक से बाह्यतम कोश के मध्य की दूरी आयनिक त्रिज्या कहलाती हैं|

  • सामान्यत आयनिक त्रिज्या दो प्रकार की पाई जाती हैं|
  • धनायनिक त्रिज्या
  • ऋणायनिक त्रिज्या

नोट

  • मुलक :-परमाणु या परमाणुओ का समूह जिन पर की आवेश उपस्थित पाया जाता हैं मूलक कहलाते हैं|
  • जैसे- Cl,Br,Na+,So4
  • आयन :-यदि किसी एकल परमाणु पर आवेश उपस्थित पाया जाता हैं तो उसे आयन कहा जाता हैं|
  • जैसे– Cl,Br,Na+
  • एक आयन हमेशा मूलक होता है लेकिन एक मूलक आयन हो भी सकता है और नहीं भी|

धनायनिक त्रिज्या –

  • किसी धनायन में नाभिक से भाय्तं कोश के मध्य की दूरी धनायनिक त्रिज्या कहलाती हैं|
  • धनायन पर आवेश की मात्र बढने पर धनायनिक त्रिज्या का मान लगातार कम होता जाता हैं|
  • धनायन का आकार/त्रिज्या =1/ धनायन पर उपस्थित आवेश

ऋणायनिक त्रिज्या –

  • किसी भी ऋणआयन में नाभिक से बाह्यतम कोश के मध्य की दूरी को ऋणायनिक त्रिज्या त्रिज्या कहा जाता है|
  • ऋणआयन पर आवेश की मात्रा बढने पर ऋणायनिक त्रिज्या का मान लगातार बढ़ता जाता हैं|
  • जैसे- M-4 >M-3 >M-2 >M-1
  • अत: धनायन की त्रिज्या का मान उदासीन परमाणु की तुलना में कुछ कम पाया जाता हैं|जबकि ऋणआयन की त्रिज्या का मान अधिक पाया जाता हैं|

परमाण्विक त्रिज्या को प्रभावित करने वाले कारक:-

1.कोशो की संख्या –

  • कोशो की संख्या का मान बढने पर परमाण्विक त्रिज्या का मान बढ़ता जाता हैं|
  • जैसे- Li <Na <K <Rb <Cs
  • ऊपर से नीचे जाने कोशो की संख्या बढती है अत: परमाण्विक त्रिज्या का मान बढ़ता जाता हैं|

2.प्रभावी नाभिकीय आवेश –

  • इसका मान बढने पर परमाणु का आकार संकुचित होता जाता हैं|
  • एक आवर्त में बायीं से दायी ओर जाने पर प्रभावी नाभिकीय आवेश का मान बढ़ता है अत: परमाण्विक त्रिज्या का मान कम होता जाता हैं|

नोट

  • किसी भी आवर्त में सबसे बड़ा परमाण्विक आकार या त्रिज्या अक्रिय गैसों की पाई जाती हैं|

3.परिरक्षण प्रभाव व आवरनी प्रभाव –

  • एक ही कोश में उपस्थित इलेक्ट्रोनो के मध्य लगने वाले प्रतिकर्षण बल के मान को परिरक्षण प्रभाव कहा जाता हैं|
  • दो या दो से अधिक भिन्न-भिन्न कक्षाओं में उपस्थित इलेक्ट्रान के मध्य लगने वाले प्रतिकर्षण बल को आवरनी प्रभाव कहा जाता हैं|
  • इन दोनों का मान बढने पर परमाण्विक त्रिज्या का मान बढ़ता जाता हैं|

5.संयोजकता [Valency] –

  • किसी भी परमाणु के द्वारा अन्य परमाणु के साथ जितने बंध बनाए जाते हैं वह उसकी संयोजकता कहलाती हैं|
  • सामान्यत: संयोजकताओं केआधार पर तत्वों को 4 भागों में वर्गीकृत कर सकते हैं|
S खंड के तत्व 1A 2A
संयोजकता 1 2
वैद्युत संयोजकता +1 +2

 

P खंड के तत्व 3A 4A 5A 6A 7A
संयोजकता 3 4 3,5 2 1
वैद्युत संयोजकता +3,

-5

+4,

-4

+5,

-3

+6,

-2

+7,

-1

नोट-

  • अक्रिय गैसों की संयोजकताए एवं वैद्युत संयोजकताए दोनों के मान शून्य पाए जाते हैं|

d खंड के तत्व –

  • ये सामान्यत:वैद्युत संयोजकता प्रदर्शित करते हैं|
  • परिवर्तनशील वैद्युत संयोजकता प्रदर्शित करना d खंड के तत्वों का विशिष्ट लक्षण हैं|
3d श्रेणी Sc Ti V Cr Mn Fe Co Ni Cu ,    Zn
संयोजकता +2,

+3

+2,

+3

+4

+2,

+3,

+4,

+5

+2

,+3,

+4,

+5,

+6

+2,

+3,

+4,

+5,

+6,

+7

+2

+3

+2 +2 +1,+2

Zn=+2

 

  • अधिकतम वैद्युत संयोजकता Os तत्व की +8 पाई जाती हैं|

f खंड के तत्व:-

  • इस खंड के तत्व भी सामान्यत: वैद्युत संयोजकता प्रदर्शित करते हैं|
  • इस खंड के अधिकतर तत्वों की वैद्युत संयोजकता +3 पाई जाती हैं|