भारतीय राजनीतिक संरचना Indian political structure

राज्यों का संघ भारत, धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य है| जिसमें शासन की संसदीय प्रणाली है| गणराज्य 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा द्वारा स्वीकृत और 26, जनवरी 1950 को लागु संविधान की व्यवस्थाओं के अनुसार प्रशासित किया गया|

संविधान में विधायी शक्तियां संसद एवं राज्य विधानसभाओं में विभजित है| तथा शेष शक्तियां संसद को प्राप्त है| संविधान में संशोधन का अधिकार भी भी संसद को प्राप्त है| संविधान में न्यायपालिका, भारत के नियंत्रण तथा महालेखा पारीक्षक , लोक सेवा आयोगों और मुख्य निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता  बनाए रखने के लिए प्रावधान है|

केंद्र और उसके क्षेत्र

भारत में 29 राज्य और सात केंद्रशासित प्रदेश है| ये राज्य निम्न है: आंध्र प्रदेश, असम, अरुणाचल प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, झारखंड, कर्नाटका, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, सिक्किम, तमिलनाडू, तेलंगाना, त्रिपुरा, उत्तरप्रदेश, और पश्चिम बंगाल|

केन्द्रशासित प्रदेश: अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, चंडीगढ़, दादरा और नगर हवेली, दमन और दीव, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, लक्षद्वीप तथा पुद्दुचेरी|

नागरिकता

संविधान में संपूर्ण भारत में एक समान नागरिकता की व्यवस्था की गई है, ऐसा प्रत्येक व्यक्ति भारत का नागरिक मन गया है, जो संविधान लागू होने के दिन 26 जनवरी, 1950 से स्थाई रूप से भारत में रहता हो, जो भारत में पैदा हुआ हो, जिसके माता पिता में से किसी एक का जन्म भारत में हुआ हो, जो सामान्यता कम से कम पांच साल से भारत क्षेत्र में रहता हो| नागरिक अधिनियम, 1955 में संविधान लागू होने के पश्चात नागरिकता ग्रहण करने, निर्धारित करने के संबंध में प्रावधान किए गए है|

मौलिक अधिकार

संविधान में सभी नागरिकों के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से बुनयादी स्वतंत्रता की व्यवस्था की गई है| संविधान में मोटे तौर पर छः प्रकार की स्वतंत्रता की मौलिक अधिकारों के रूप में गारंटी डी गई है, जिसकी सुरक्षा के लिए न्यायालय की शरण लि जा सकती है| संविधान के तीसरे भाग, अनुछेद-12 से 35 तक, में मौलिक अधिकारों का उल्लेख किया गया है| ये मौलिक अधिकार निम्न है:-

1.समानता का अधिकार: कानून के समक्ष समानता, धर्म, वंश, जाती, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध और रोजगार के लिए समान अवसर|

2.विचारों की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति का अधिकार: सम्मेलन करना, संस्था या केंद्र बनाने, देश में सर्वत्र आने जाने, भारत के किसी भी भाग में रहने तथा कोई रोजगार या व्यवस्था करने का अधिकार (इनमें से कुछ अधिकारों को देश की सुरक्षा, विदेशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टता या नैतिकता में सीमित किया गया है)

  1. शोषण से रक्षा का अधिकार: इसके अंतर्गत सभी प्रकार की बेगार, बालश्रम और व्यक्तियों के क्रय विक्रय करने का निषेध किया जाता है|
  2. अंतःकरण की प्रेरणा तथा धर्म को निर्बाध रुप से मनाने, उसके अनुरूप आचरण करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता का अधिकार|
  3. नागरिकों के किसी भी वर्ग को अपनी संस्कृति, भाषा और लिपि को संरक्षित करने तथा अल्पसंख्यकों द्वारा पसंद की शिक्षा ग्रहण करने एवं शिक्षा संस्थानों की स्थापना करने का अधिकार|
  4. मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए संवैधानिक उपायों का अधिकार|

मौलिक कर्तव्य

1976 में पारित संविधान में 42 वें संशोधन के अंतर्गत, नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों का भी उल्लेख किया गया है| यह कर्तव्य संविधान के भाग चार ‘ए’ के अनुच्छेद 51 ‘क’ में दिए गए हैं| इसमें अन्य बातों के अलावा यह कहा गया है कि नागरिकों का कर्तव्य है कि वह संविधान का पालन करें, स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए राष्ट्रीय संघर्ष को प्रेरित करने वाले आदर्शों का अनुसरण करें, देश की रक्षा करें और कहे जाने पर राष्ट्रीय सेवा में जुट जाएं| धर्म, भाषा और क्षेत्रीय तथा वर्ग संबंधि विभिन्नताओं को बुलाकर सदभाव और भाईचारे की भावनाओं को बढ़ावा दें|

राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत

संविधान में निहित राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत यधपि न्यायालयों द्वारा लागू नहीं कराया जा सकते| तथापि वे देश के प्रशासन का मूलभूत आधार है और सरकार का यह कर्तव्य है कि वह कानून बनाते समय इन सिद्धांतों का पालन करें\ यह सिद्धांत संविधान के भाग 4 के अनुच्छेद 36 से 51 में दिए गए हैं| उनमें कहा गया है- सरकार ऐसी प्रभावी सामाजिक व्यवस्था कायम करके लोगों के कल्याण के लिए प्रोत्साहन देने का प्रयास करेगी, जिससे राष्ट्रीय जीवन के सभी क्षेत्रों में सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक न्याय का पालन हो| सरकार ऐसी नीति निर्देशन करेगी जो सभी स्त्री पुरुषों को जीवनयापन के लिए यथेष्ट अवसर दें, समान कार्य के लिए समान वेतन तथा अपनी आर्थिक क्षमता, विकास की सीमाओं के अनुसार सबको काम तथा शिक्षा दिलाने की प्रभावी व्यवस्था करें और बेरोजगारी, बुढ़ापे, बीमारी तथा अपंगता या अन्य प्रकार की अक्षमता की स्थिति में सबको वित्तीय सहायता दे| सरकार श्रमिकों के लिए निर्वाह- वेतन, कार्य की मानवोचित दशाओं, रहन सहन के अच्छे स्तर तथा उधोगों के प्रबंधन में उनकी पूर्ण भागीदारी के लिए भी प्रयतन करेगी|

आर्थिक क्षेत्र में, सरकार को अपनी नीति इस ढंग से लागू करनी चाहिए जिससे कि समाज के भौतिक संसाधनों पर अधिकार और उनका लोगों के बीच इस प्रकार वितरण हो कि वे सभी लोगों के कल्याण के लिए उपयोगी सिद्ध हो और यह सुनिश्चित हो कि आर्थिक व्यवस्था को लागू करने के परिणामस्वरुप सर्वसाधारण के हितों के विरुद्ध धन और उत्पादन के साधन कुछ भी लोगों के पास केंद्रीय नहीं हो सके|

कुछ अन्य महत्वपूर्ण निर्देशांक:-

  1. बच्चों को स्वास्थ वातावरण में विकास के लिए अवसर तथा सुविधाएं उपलब्ध कराना|
  2. 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए निशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करना|
  3. अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति और समाज के अन्य कमजोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देना|
  4. ग्राम पंचायतों का गठन: करना कार्यपालिका से न्यायपालिका को अलग रखना|
  5. संपूर्ण देश के लिए समान नागरिक संहिता की घोषणा|
  6. राष्ट्रीय स्मारकों की सुरक्षा: समान अवसरों के आधार पर न्याय को बढ़ावा देना|
  7. नि:शुल्क कानूनी सहायता की व्यवस्था|
  8. पर्यावरण की सुरक्षा तथा सुधार|
  9. वनों एवं वन्यजीवों की सुरक्षा तथा अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा|
  10. राष्ट्रों के बीच न्यायोचित भाषा तथा समानतापूर्ण संबंधों को प्रोत्साहन|
  11. अंतरराष्ट्रीय कानूनों और संधियों की शर्तों का साम्मान एवं अंतरराष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता द्वारा निपटाने को बढ़ावा देना|

कार्यपालिका

केंद्रीय कार्यपालिका के अंतर्गत राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री के नेतृत्व में एक मंत्रीपरिषद होता है, जो राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देता है|

राष्ट्रपति

राष्ट्रपति का निर्वाचन एक निर्वाचन मंडल के सदस्य अनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर एकल हस्तांतरणीय मत द्वारा करते हैं| इस निर्वाचन मंडल में संसद के दोनों सदनों तथा राज्यों की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य होते हैं| राज्यों के बीच आपस में समानता तथा राज्य और केंद्रों के बीच समानता बनाए रखने के लिए प्रत्येक मत को उचित महत्व दिया जाता है| राष्ट्रपति को अनिवार्य रूप से भारत का नागरिक, कम से कम 35 वर्ष की आयु तथा लोकसभा का सदस्य बनने का पात्र होना चाहिए| राष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्षों का होता है तथा पुनर्निर्वाचित किया जा सकता है| संविधान के अनुच्छेद-61 में निहित प्रक्रिया द्वारा उन्हें पद से हटाया जा सकता है| वह उपराष्ट्रपति को संबंधित स्व-हस्तलिखित पत्र द्वारा पद त्याग कर सकते है|

कार्यपालिका के समस्त अधिकार राष्ट्रपति में निहित है| वह उनका उपयोग संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ सरकारी अधिकारियों द्वारा कराते है| रक्षा सेनाओं की सर्वोच्च कमान भी राष्ट्रपति के पास होती है| राष्ट्रपति को संसद का अधिवेशन बुलाने, उसका सत्रावसान करने, संसद को संबोधित करने तथा संदेश भेजने, लोकसभा को भंग करने, दोनों सदनों के अधिवेशन काल को छोड़ कर किसी भी समय अध्यादेश जारी करने, बजट तथा वित्त विधेयक प्रस्तुत करने की सिफारिश करने तथा विधेयकों को स्वीकृति प्रदान करने, क्षमादान देने, दंड रोकने अथवा उनमें कमी या परिवर्तन करने या कुछ मामलों में दंड को स्थगित करने, छूट देने या दंड को बदलने के अधिकार प्राप्त होते हैं| किसी राज्य में संवैधानिक व्यवस्था के विफल हो जाने पर राष्ट्रपति उस सरकार के संपूर्ण या कोई भी अधिकार अपने हाथ में ले सकते हैं|

यदि राष्ट्रपति को इस बारे में विश्वास हो जाए कोई ऐसा गंभीर संकट पैदा हो गया है जिससे देश अथवा उसके किसी भी बात की सुरक्षा को युद्ध अथवा बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह का खतरा उत्पन्न हो गया है, तो वह देश में आपात स्थिति की घोषणा कर सकते हैं|

उपराष्ट्रपति

उपराष्ट्रपति का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार एकल हस्तांतरणीय मत द्वारा एक निर्वाचन मंडल के सदस्य करते हैं| निर्वाचन मंडल में दोनों सदनों के सदस्य होते हैं| उपराष्ट्रपति को अनिवार्य रूप से भारत का नागरिक, कम से कम 35 वर्ष की आयु का और राज्यसभा का सदस्य बनने का पात्र होना चाहिए| उनका कार्यकाल 5 वर्ष का होता है और इन्हें इस पद का पुननिर्वाचित किया जा सकता है| संविधान के अनुच्छेद-67 (ख) में निहित कार्यविधि द्वारा उन्हें पद से हटाया जा सकता है|

उपराष्ट्रपति राज्यसभा के पदेन सभापति होते हैं| जब राष्ट्रपति बीमारी या किसी अन्य कारण से अपना कार्य करने में असमर्थ हों या जब राष्ट्रपति की मृत्यु या पद त्याग या पद से हटाया जाने के कारण राष्ट्रपति का पद रिक्त हो गया है, तब छह महीने के भीतर नए राष्ट्रपति के चुने जाने तक वह राष्ट्रपति के रूप में कार्य कर सकते हैं| ऐसी स्थिति में वह राज्यसभा के सभापति के रूप में कार्य नहीं कर सकते|

मंत्रिपरिषद्

कार्य-संचालन में राष्ट्रपति की सहायता करने तथा उन्हें परामर्श देने के लिए प्रधानमंत्री के नेतृत्व में एक मंत्रिपरिषद् की व्यवस्था है| प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति भी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के परामर्श से करते हैं मंत्रिपरिषद् संयुक्त रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होते हैं| प्रधानमंत्री का कर्तव्य है कि वह केंद्र के कार्यों के संचालन के संबंध में मंत्रिपरिषद् के निर्णय, कानून बनाने के प्रस्तावों तथा उनसे संबंधित जानकारियों से राष्ट्रपति को अवगत कराते रहें| मंत्रिपरिषद् में कैबिनेट मंत्री, राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार), राज्यमंत्री तथा उपमंत्री होते हैं|

विधायिका

केंद्र की विधायिका को ‘संसद’ कहा जाता है| इसमें राष्ट्रपति, दोनों सदनों (लोकसभा तथा राज्यसभा) शामिल है| संसद के दोनों सदनों की बैठक पिछली बैठक के 6 महीने के भीतर बुलानी होती है| कुछ अवसरों पर दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन किया जाता है|

राज्यसभा

संविधान में व्यवस्था है की राज्यसभा में साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा आदि क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या अनुभव रखने वाले 12 सदस्यों को राष्ट्रपति मनोनीत करेंगे तथा राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के चुने हुए सदस्यों की संख्या 238 से अधिक नहीं होगी| राज्यसभा के सदस्यों का विवरण परिशिष्ट में दिया जाता है|

राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष होता है; राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्यों का चुनाव राज्यों की विधानसभाओं के चुने हुए सदस्यों द्वारा एकल हस्तांतरणीय मतों के आधार पर अनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के जरिए किया जाता है| केंद्रशासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों का चुनाव संसद द्वारा निर्धारित कानून के अंतर्गत किया जाता है| राज्यसभा कभी भी भंग नहीं होती और उसके एक-तिहाई सदस्य हर 2 वर्ष के बाद अवकाश ग्रहण करते हैं|

लोकसभा

लोकसभा के सदस्य व्यस्क मताधिकार के आधार पर लोगों द्वारा सीधे चुने जाते हैं| संविधान में लोकसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या अब 552 है 530 सदस्य राज्यों और 20 सदस्य केंद्रशासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा राष्ट्रपति को आंगल भारतीय (एंग्लो इंडियन) समुदाय के दो व्यक्तियों को उस हालत में मनोनीत करने का अधिकार होता है, जब उन्हें ऐसा लगे लगे की सदन में इस समुदाय को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला है|

लोकसभा के लिए विभिन्न राज्यों की सदस्य संख्या का निर्धारण किस प्रकार किया जाता है कि राज्य के लिए निर्धारित सीटों की संख्या और उस राज्य की जनसंख्या का अनुपात, जहां तक व्यवहारिक रूप से संभव हो, सभी राज्यों में समान हो|

वर्तमान लोकसभा के 543 सदस्य हैं| इनमें से 530 सदस्य राज्यों से तथा 13 सदस्य केंद्रशासित प्रदेशों से सीधे चुने गए हैं| 84वें संविधान संशोधन विधेयक 2001 के तहत विभिन्न राज्यों में लोकसभा की वर्तमान सीटों की कुल संख्या का निर्धारण 1971 की जनगणना के आधार पर किया गया है तथा 2026 के बाद की जाने वाली पहली जनगणना तक इसमें कोई फेर-बदल नहीं किया जाएगा|

लोकसभा का कार्यकाल, यदि उसे भंग न किया जाए, सदन की पहली बैठक की तिथि से लेकर 5 वर्ष होता है| किंतु यदि आपात स्थिति लागू हो तो यह अवधि संसद द्वारा कानून बनाकर बढ़ाई जा सकती है| परंतु यह वृद्धि एक समय पर 1 वर्ष से अधिक नहीं हो सकती और आपात स्थिति समाप्त होने के बाद किसी भी हालत में 6 महीने से अधिक समय तक नहीं हो सकती है|