मानव शरीर और उसके मुख्य अंग Human body and its main organ

  1. नेत्र(Eye)

दृष्टि वह संवेदन है जिस पर प्रत्येक मनुष्य निर्भर रहता है, नेत्र शरीर का एक अमूल्य अवयव है।  नेत्रों  के द्वारा ही हमें वस्तु का दृष्टि ज्ञान होता है।  इसका निर्माण अत्यंत कोमल तंतुओं से होता है परंतु इसकी रचना जटिल एवं कार्य संषिष्ट है।

प्रत्येक नेत्र की रचना गोलीका आकार की होती है इसीलिए इसे अक्षीगोलक(Eye ball) कहते हैं। अक्षीगोलक एक गड्डे में स्थित रहता है, इसे नेत्र गुहा कहते हैं।  इसी गड्डे में नेत्र को सुरक्षा मिलती है।  नेत्र गोलक का व्यास 2.5 से.मी. होता है। नेत्र गुहा शंकु(Orbital cavity) रूप में होती है। दृष्टि तंत्रिका (Optic nerve)  तथा मस्तिष्क में स्थित दृष्टि केंद्र (Visual centes) कुछ नेत्र उपांग भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है।

नेत्र उपांग(Appendage of the Eye)

  1. भौह
  2. नेत्र श्लेष्मा पलकें
  3. नेत्र पक्षन
  4. नेत्र श्लेष्मा
  5. अश्रु उपकरण
  6. पेशियां
  7. कर्ण(Ear)

कर्ण शरीर का संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है, यह शरीर का आवश्यक अंग है। इससे किसी भी ध्वनि का बोध होता है। कर्ण द्वारा सुनने की क्रिया आठ वीं कपाल तंत्रिका, श्रवण तंत्रिका की सहायता से सम्पन्न होती है। कर्ण के मुख्य तीन भाग होते हैं।

बाह्यकर्ण

मध्यकर्ण

अन्तःकर्ण

a.बाह्यकर्ण(Outer Ear)

बाह्यकर्ण के दो स्पष्ट भाग होते हैं,पहला कर्ण पाली एवं दूसरा भाग कर्ण कुहर। जिसमें कर्ण पली बाहर की ओर स्थित है यह भाग अर्धचंद्राकार दिखाई देता है इसी का ऊपरी भाग पितप्रतयावसा उपस्थिति का बना होता है। कर्ण पाली का मुख्य कार्य ध्वनि को उत्पन्न तरंगों को एकत्रित करके आगे कान के भीतर भेजना है।बाह्य कर्ण का दूसरा भाग बाह्य क्छुर को कान की नली भी कहा जाता है यह नली लगभग 1 इंच लंबी होती है। नली का मार्ग सीधा नहीं बल्कि घुमावदार होता है रचना की दृष्टि से बाह्य कर्ण कुहर के दो भाग होते है। एक तिहाई भाग कार्टिलेज तथा भीतरी दो तिहाई भाग अस्थि निर्मित होता है। बाह्य कर्ण कुहर की त्वचा में विशेष प्रकार की ग्रंथि होती है जिसे कर्णमल संधि कहते हैं। इस ग्रंथि से पीला, चिकना पदार्थ स्रावित होता है जो बाह्य को चिकना रखता है।

बाह्य कर्ण कुहर पर छोटे छोटे रोम होते हैं जो बाहरी धूल के कण आदि को अंदर जाने से रोकते हैं। बाह्य कर्ण के दोनों भाग का कार्य न केवल ध्वनि तरंगों को एकत्रित करना है बल्कि उन्हें पारेषित करके आगे बढ़ाना भी है।

b.मध्यकर्ण (Middle Ear)

यह भाग अनियमित टेड़े आकार की गुहा है। मध्य कर्ण एक झिल्ली कृत पर्दे, कर्ण पटल के द्वारा बाह्य कर्ण से पृथक रहता है। जिस स्थान पर कर्ण पटल स्थित है वहीं से मध्य कर्ण का आरंभ होता है। वास्तव में मध्य कर्ण एक शंकरा आयताकार बॉक्स के समान है जिसकी अग्र मध्य पश्च भित्तियां होती हैं।

मध्य कर्ण की अग्र और पश्च भित्तियों में छिद्र हैं। अग्रभित्ति में कर्ण पटल के बिल्कुल समीप एक छिद्र होता है यह छिद्र नलिका का मुख्य द्वार है यह नलिका कंठ कर्ण नली कहलाती है। इस नलिका के द्वारा कान का संबंध नासा ग्रसनी गुहा से रहता है पश्चभित्ति का कण से संबंध शंखास्थी की कर्णमूल पदार्थ में स्थित कर्णमूल कोटर तथा करण मूल वायु सेल से रहता है मध्य कर्ण में तीन छोटी अस्थियां होती है जो कर्णास्थिका कहलाती है। संपूर्ण मध्य कर्ण गुहा श्लैष्मिक कला अस्तर से ढका रहता है। तीनों छोटी हस्तियां एक श्रृंखला के रूप में स्थित होती है जो निम्न है। मुग्दरक, घूर्णक, बलयक

  1. जिव्हा(Tongue)

जीव्हा मुख्यत: स्वाद ज्ञानकेंद्रीय है।  जिव्हा वस्तु के स्वाद का अनुभव कराती है।  जिसके आधार पर उसके उपयोग किए जाने या न किए जाने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया जाता है।  स्वाद रासायनिक संवेदना है जो स्वाद संग्राहक अंगों को उत्तेजित करते हैं।  प्रत्येक वस्तु में रासायनिक तत्व भिन्न भिन्न होने के कारण उनके स्वाद में विभिन्नता पाई जाती है।

किसी वस्तु के स्वाद को जानने के लिए वस्तु का स्वादेंद्रियों को सीधे संपर्क में आना होता है स्वाद का पता भोजन की तरल अवस्था में ही चलता है। भोजन का कुछ अंश लार में घुल जाता है। लार में घुला हुआ यह भोजन स्वाद कलिकाओं को क्रियाशील कर देता है खाद्य पदार्थ द्वारा एक रासायनिक क्रिया होती है जिसके फलस्वरुप तंत्रिका आवेग पैदा हो जाता है। ये आवेश मस्तिष्क के स्वाद केंद्र तक पहुंचते हैं और स्वाद का अनुभव देने लगते हैं किसी वस्तु का स्वाद जानने के लिए उसे घुलनशील होना अनिवार्य है। जीवा पर रखी हुई ठोस वस्तु का स्वाद अस्पष्ट होता है। मुख्य रूप से स्वाद चार प्रकार का होता है कड़वा, मीठा, नमकीन, खट्टा। अधिकांश खाद्य पदार्थों में स्वाद के अतिरिक्त गंध भी होती है। जिव्हा के आगे का भाग मीठे वे नमकीन स्वाद का अनुभव नहीं कराता क्योंकि यहां पर स्वाद का मध्य भाग किसी भी प्रकार के स्वाद का अनुभव नहीं करता क्योंकि यहां पर कलिकाओं का अभाव रहता है कुछ वैज्ञानिक धात्विक और छारीय स्वादों को भी इस वर्ग में सम्मिलित करते हैं।  स्वाद का मुख्य अंग जिव्हा है क्योंकि स्वाद के संग्राहक इसी में निहित होते है।

  1. नासिका(Nose)

नासिका भी अन्य ज्ञानेंद्रियों की तरह महत्वपूर्ण ज्ञानेंद्रि है। यह घ्राण संवेदना के ज्ञान का अंगक है। सुगंध और दुर्गंध की अनुभूति नासिका के द्वारा होती है। घ्राण संवेदना एक रासायनिक संवेदना है। सूंघने की क्रिया के लिए वस्तु की अवस्था गैस के रुप में होना आवश्यक है।  जब यह गैस  नासिका गुहा में अग्रेसित होती है तो घ्राण क्षेत्र की कोशिकाएं उत्तेजित हो जाती हैं एवं घ्राण का अनुभव होने लगता है घ्राण संवेदना तभी सींव है जब गैस का नाक की श्लेष्मा के साव में घुलनशील स्थिति में आ जाए। नासिका गुहा में गैस या कण वायु के माध्यम से पहुंचते हैं।


नाक द्वारा जोर से खींची गई गैस अधिक मात्रा तथा तीव्र गति से नासिका गुहा में जाती है जिससे गंध का अनुभव तुरंत हो जाता है, यहां तक कभी-कभी गंध असहनीय हो जाती है। नाक ऊपरी हिस्से पर लगाए गए रासायनिक पदार्थ की गंध नासिका द्वारा सरलता से अनुभव कि जा सकती है। घ्राण प्रदेश से आने वाली सूक्ष्म तंतु वृक्षायन द्वारा घ्राण बल्ब के तंतु से मिले रहते हैं। घ्राण बल्ब मस्तिष्क का भी बाहर निकला हुआ भाग है, जो की एथमायड अस्थि की प्लेट के ऊपर उपस्थित होता है। घ्राण बल्ब से संवेदन घ्राण पथ में पहुंचता है। घ्राण तंत्र अनेक केन्द्र्कों में प्रसारित होते हुए अनंत में घ्राण केंद्र में पहुंचता है यह केंद्र प्रममस्तिष्क में स्थित होता है तथा यहीं पर घ्राण संवेदन ग्रहण किये जाते हैं।

  1. त्वचा

त्वचा शरीर की सतह पर एक सुरक्षात्मक आवरण होता है। यह उन गुहाओं की उपकला से संबंध रखती है जिनके द्वारा त्वचा पर खुलते हैं। त्वचा में स्पर्श तंत्रिका अंताग स्थित होते हैं। यह शरीर के तापमान तथा शरीर में होने वाली जल हानि को नियंत्रित करती है। त्वचा स्पर्श संवेदन की महत्वपूर्ण ज्ञानेंद्रिय है। संवेदन के अनुभव के लिए संबंधित संवेदी तंत्रिकाओं में उत्तेजना आवश्यक है। इस प्रकार उत्पन्न उत्तेजना मस्तिष्क में परेषित होने के पश्चात केंद्रीय तंत्रिका तंत्र उसका विश्लेषण करती है एवं मस्तिष्क द्वारा उस विशेष संवेदना का अनुभव होता है त्वचा को दो स्तरों में विभाजित किया जाता है, बाह्य त्वचा, अंत:स्तत्वचा