Alankar in Hindi Grammer

अलंकार

–  ” काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्व अलंकार कहे जाते हैं ! “

 
अलंकार के तीन भेद हैं – 
 
1. शब्दालंकार –  ये शब्द पर आधारित होते हैं ! प्रमुख शब्दालंकार हैं –  अनुप्रास , यमक ,
                       शलेष , पुनरुक्ति , वक्रोक्ति  आदि !
 
2. अर्थालंकार –  ये अर्थ पर आधारित होते हैं !  प्रमुख अर्थालंकार हैं –  उपमा , रूपक , उत्प्रेक्षा 
                     प्रतीप , व्यतिरेक , विभावना , विशेषोक्ति ,अर्थान्तरन्यास , उल्लेख , दृष्टान्त 
                     विरोधाभास , भ्रांतिमान  आदि !
 
3.उभयालंकार– उभयालंकार शब्द और अर्थ दोनों पर आश्रित रहकर दोनों को चमत्कृत करते हैं!
 
1- उपमा – जहाँ गुण , धर्म या क्रिया के आधार पर उपमेय की तुलना उपमान से की जाती है   
     जैसे – 
              हरिपद कोमल कमल से  ।
 
हरिपद ( उपमेय )की तुलना कमल ( उपमान ) से कोमलता के कारण की गई ! 
अत: उपमा अलंकार है !
 
2-  रूपक – जहाँ उपमेय पर उपमान का अभेद आरोप किया जाता है ! जैसे –
 
                   अम्बर पनघट में डुबो रही ताराघट उषा नागरी  ।
 
आकाश रूपी पनघट में उषा रूपी स्त्री तारा रूपी घड़े डुबो रही है ! यहाँ आकाश पर पनघट का , 
उषा पर स्त्री का और तारा पर घड़े का आरोप होने से रूपक अलंकार है !
 
3- उत्प्रेक्षा – उपमेय में उपमान की कल्पना या सम्भावना होने पर उत्प्रेक्षा अलंकार होता है ! 
     जैसे – 
                मुख मानो चन्द्रमा है
 
यहाँ मुख ( उपमेय ) को चन्द्रमा ( उपमान ) मान लिया गया है ! यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है !
इस अलंकार की पहचान मनु , मानो , जनु , जानो शब्दों से होती है !
 
4- यमक – जहाँ कोई शब्द एक से अधिक बार प्रयुक्त हो और उसके अर्थ अलग -अलग हों 
    वहाँ यमक अलंकार होता है ! जैसे –
 
                      सजना है मुझे सजना के लिए  ।
 
यहाँ पहले सजना का अर्थ है – श्रृंगार करना और दूसरे सजना का अर्थ – नायक शब्द दो बार 
प्रयुक्त है ,अर्थ अलग -अलग हैं ! अत: यमक अलंकार है !
 
5- शलेष – जहाँ कोई शब्द एक ही बार प्रयुक्त हो , किन्तु प्रसंग भेद में उसके अर्थ एक से     
    अधिक हों , वहां शलेष अलंकार है ! जैसे –
 
              रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून  ।
              पानी गए न ऊबरै मोती मानस चून  ।।
 
यहाँ पानी के तीन अर्थ हैं – कान्ति , आत्म – सम्मान  और जल  ! अत: शलेष अलंकार है ,
क्योंकि पानी शब्द एक ही बार प्रयुक्त है तथा उसके अर्थ तीन हैं !
 
6- विभावना – जहां कारण के अभाव में भी कार्य हो रहा हो , वहां विभावना अलंकार है !जैसे –
 
                        बिनु पग चलै सुनै बिनु काना
 
वह ( भगवान ) बिना पैरों  के चलता है और बिना कानों के सुनता है ! कारण के अभाव में कार्य 
होने से यहां विभावना अलंकार है !
 
7- अनुप्रास –  जहां किसी  वर्ण की अनेक बार क्रम से आवृत्ति  हो वहां अनुप्रास अलंकार होता 
    है ! जैसे – 
 
                    भूरी -भूरी भेदभाव भूमि से भगा दिया  । 
 
‘ भ ‘ की आवृत्ति  अनेक बार होने से यहां अनुप्रास अलंकार है !
 
8- भ्रान्तिमान – उपमेय में उपमान की भ्रान्ति होने से और तदनुरूप क्रिया होने से 
                     भ्रान्तिमान अलंकार होता है ! जैसे –
 
नाक का मोती अधर की कान्ति से , बीज दाड़िम का समझकर भ्रान्ति से  ।
देखकर सहसा हुआ शुक मौन है । सोचता है अन्य शुक यह कौन है ?
 
यहां नाक में तोते का और दन्त  पंक्ति में अनार के दाने का भ्रम हुआ है , यहां भ्रान्तिमान 
अलंकार है !
 
9- सन्देह – जहां उपमेय के लिए  दिए गए उपमानों में सन्देह बना रहे तथा निशचय न हो सके,          
    वहां सन्देह अलंकार होता है !जैसे –
 
          सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है ।
          सारी ही की नारी है कि नारी की ही सारी है
 
10- व्यतिरेक – जहां कारण बताते हुए उपमेय की श्रेष्ठता उपमान से बताई गई हो , वहां 
      व्यतिरेक अलंकार होता है !जैसे –
 
          का सरवरि तेहिं देउं मयंकू । चांद कलंकी वह निकलंकू ।।
 
मुख की समानता चन्द्रमा से कैसे दूं ? चन्द्रमा में तो कलंक है , जबकि मुख निष्कलंक है !
 
11- असंगति – कारण और कार्य में संगति न होने पर असंगति अलंकार होता है ! जैसे –
 
                      हृदय घाव मेरे पीर रघुवीरै
 
घाव तो लक्ष्मण के हृदय में हैं , पर पीड़ा राम को है , अत: असंगति अलंकार है !
 
12- प्रतीप – प्रतीप का अर्थ है उल्टा या विपरीत । यह उपमा अलंकार के विपरीत होता है ।
      क्योंकि इस अलंकार में उपमान को लज्जित , पराजित या हीन दिखाकर उपमेय 
      की श्रेष्टता बताई जाती है ! जैसे – 
 
               सिय मुख समता किमि करै चन्द वापुरो रंक
 
सीताजी के मुख ( उपमेय )की तुलना बेचारा चन्द्रमा ( उपमान )नहीं कर सकता । उपमेय 
की श्रेष्टता प्रतिपादित होने से यहां प्रतीप अलंकार है !
 
13- दृष्टान्त – जहां उपमेय , उपमान और साधारण धर्म का बिम्ब -प्रतिबिम्ब भाव होता है,जैसे-
             बसै बुराई जासु तन ,ताही को सन्मान ।
             भलो भलो कहि छोड़िए ,खोटे ग्रह जप दान ।।
 
यहां पूर्वार्द्ध में उपमेय वाक्य और उत्तरार्द्ध में उपमान वाक्य है ।इनमें ‘ सन्मान होना ‘ और 
‘ जपदान करना ‘ ये दो भिन्न -भिन्न धर्म कहे गए हैं । इन दोनों में बिम्ब -प्रतिबिम्ब भाव 
है । अत: दृष्टान्त अलंकार है ! 
 
14- अर्थान्तरन्यास – जहां सामान्य कथन का विशेष से या विशेष कथन का सामान्य से 
      समर्थन किया जाए , वहां अर्थान्तरन्यास अलंकार होता है ! जैसे –
 
              जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग ।
              चन्दन विष व्यापत नहीं लपटे रहत भुजंग ।।
 
15- विरोधाभास – जहां वास्तविक विरोध न होते हुए भी विरोध का आभास मालूम पड़े ,
      वहां विरोधाभास अलंकार होता है ! जैसे –
 
              या अनुरागी चित्त की गति समझें नहीं कोइ ।
              ज्यों -ज्यों बूडै स्याम रंग त्यों -त्यों उज्ज्वल होइ ।।
 
यहां स्याम रंग में डूबने पर भी उज्ज्वल होने में विरोध आभासित होता है , परन्तु वास्तव 
में ऐसा नहीं है । अत: विरोधाभास अलंकार है ! 
 
16- मानवीकरण – जहां जड़ वस्तुओं या प्रकृति पर मानवीय चेष्टाओं का आरोप किया जाता है ,
      वहां मानवीकरण अलंकार है ! जैसे –
 
              फूल हंसे कलियां मुसकाई
 
यहां फूलों का हंसना , कलियों का मुस्कराना मानवीय चेष्टाएं हैं , अत: मानवीकरण अलंकार है!
 
17- अतिशयोक्ति – अतिशयोक्ति का अर्थ है – किसी बात को बढ़ा -चढ़ाकर कहना । जब काव्य 
      में कोई बात बहुत बढ़ा -चढ़ाकर कही जाती है तो वहां अतिशयोक्ति अलंकार होता है !जैसे –
 
                           लहरें व्योम चूमती उठतीं
 
यहां लहरों को आकाश चूमता हुआ दिखाकर अतिशयोक्ति का विधान किया गया है !
 
18- वक्रोक्ति – जहां किसी वाक्य में वक्ता के आशय से भिन्न अर्थ की कल्पना की जाती है ,
      वहां वक्रोक्ति अलंकार होता है !    
    – इसके दो भेद होते हैं – (1 ) काकु वक्रोक्ति   (2) शलेष वक्रोक्ति  ।   
 
1- काकु वक्रोक्ति – वहां होता है जहां वक्ता के कथन का कण्ठ ध्वनि के कारण श्रोता भिन्न 
    अर्थ लगाता है । जैसे –
 
              मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू
 
2- शलेष वक्रोक्ति – जहां शलेष के द्वारा वक्ता के कथन का भिन्न अर्थ लिया जाता है ! जैसे –
 
              को तुम हौ इत आये कहां घनस्याम हौ तौ कितहूं बरसो ।
              चितचोर कहावत हैं हम तौ तहां जाहुं जहां धन है सरसों ।।
 
19- अन्योक्ति – अन्योक्ति का अर्थ है अन्य के प्रति कही गई उक्ति । इस अलंकार में अप्रस्तुत के   
      माध्यम से प्रस्तुत का वर्णन किया जाता है ! जैसे –
 
             नहिं पराग नहिं मधुर मधु नहिं विकास इहि काल ।
             अली कली ही सौं बिध्यौं आगे कौन हवाल  ।।
 
यहां भ्रमर और कली का प्रसंग अप्रस्तुत विधान के रूप में है जिसके माध्यम से राजा जयसिंह 
को सचेत किया गया है , अत: अन्योक्ति अलंकार है !
 

Samas in Hindi Grammer

समास

 
 
दो या दो से अधिक शब्दों के मेल से नए शब्द बनाने की क्रिया को समास कहते हैं !
सामासिक पद को विखण्डित करने की क्रिया को विग्रह कहते हैं !
 
समास के छ: भेद हैं –
 
1- अव्ययीभाव समास – जिस समास में पहला पद प्रधान होता है तथा समस्त पद अव्यय का 
     काम करता है , उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं !जैसे – 
 
      ( सामासिक पद )                     ( विग्रह )
 
1.      यथावधि                          अवधि के अनुसार    
 
2.      आजन्म                           जन्म पर्यन्त 
 
3.      प्रतिदिन                           दिन -दिन 
 
4.      यथाक्रम                           क्रम के अनुसार 
 
5.      भरपेट                              पेट भरकर 
 
 
2- तत्पुरुष समास –  इस समास में दूसरा पद प्रधान होता है तथा विभक्ति चिन्हों का लोप 
     हो जाता है !  तत्पुरुष समास के छ: उपभेद विभक्तियों के आधार पर किए गए हैं –
 
1. कर्म तत्पुरुष 
 
2. करण तत्पुरुष
 
3. सम्प्रदान तत्पुरुष 
 
4. अपादान तत्पुरुष 
 
5. सम्बन्ध तत्पुरुष 
 
6. अधिकरण तत्पुरुष 
 
– उदाहरण इस प्रकार हैं – 

        ( सामासिक पद )                   ( विग्रह )                           ( समास )
 
1.       कोशकार                          कोश को करने वाला               कर्म तत्पुरुष 
 
2.       मदमाता                          मद से माता                         करण तत्पुरुष 

3.       मार्गव्यय                         मार्ग के लिए व्यय                 सम्प्रदान तत्पुरुष 
 
4.       भयभीत                           भय से भीत                         अपादान तत्पुरुष 
 
5.       दीनानाथ                          दीनों के नाथ                        सम्बन्ध तत्पुरुष 

6.       आपबीती                          अपने पर बीती                      अधिकरण तत्पुरुष                           
3- कर्मधारय समास –  जिस समास के दोनों पदों में विशेष्य – विशेषण या उपमेय – उपमान     सम्बन्ध हो तथा दोनों पदों में एक ही कारक की विभक्ति आये उसे कर्मधारय समास
कहते हैं !  जैसे :-
       ( सामासिक पद )                 ( विग्रह )
1.      नीलकमल                     नीला है जो कमल
2.      पीताम्बर                       पीत है जो अम्बर
3.      भलामानस                    भला है जो मानस
4.      गुरुदेव                           गुरु रूपी देव
5.      लौहपुरुष                       लौह के समान ( कठोर एवं शक्तिशाली  ) पुरुष

4-  बहुब्रीहि समास –  अन्य पद प्रधान समास को बहुब्रीहि समास कहते हैं !इसमें दोनों पद
किसी अन्य अर्थ को व्यक्त करते हैं और वे किसी अन्य संज्ञा के विशेषण की भांति कार्य
करते हैं ! जैसे –
 ( सामासिक पद )               ( विग्रह )
1.      दशानन                        दश हैं आनन जिसके  ( रावण )
2.      पंचानन                        पांच हैं मुख जिनके    ( शंकर जी )
3.      गिरिधर                        गिरि को धारण करने वाले   ( श्री कृष्ण )
4.      चतुर्भुज                        चार हैं भुजायें जिनके  ( विष्णु )
5.      गजानन                       गज के समान मुख वाले  ( गणेश जी )

5-  द्विगु समास –  इस समास का पहला पद संख्यावाचक होता है और सम्पूर्ण पद समूह
का बोध कराता है ! जैसे –
   ( सामासिक पद )                  ( विग्रह )
1.        पंचवटी                           पांच वट वृक्षों का समूह
2.        चौराहा                            चार रास्तों का समाहार
3.        दुसूती                             दो सूतों का समूह
4.        पंचतत्व                          पांच तत्वों का समूह
5.        त्रिवेणी                            तीन नदियों  ( गंगा , यमुना , सरस्वती  ) का समाहार

6-  द्वन्द्व समास –  इस समास में दो पद होते हैं तथा दोनों पदों की प्रधानता होती है ! इनका
विग्रह करने के लिए  ( और , एवं , तथा , या , अथवा ) शब्दों का प्रयोग किया जाता है !
जैसे –
  ( सामासिक पद )                      ( विग्रह )
1.         हानि – लाभ                        हानि या लाभ
2.         नर – नारी                           नर और नारी
3.         लेन – देन                           लेना और देना
4.         भला – बुरा                          भला या बुरा
5.         हरिशंकर                             विष्णु और शंकर 

Dhatu in Hindi Grammer

धातु



क्रिया के मूल रूप को धातु कहते हैं !जैसे – पढ़ , लिख , आ ,खा , जा , सो , हंस ! ‘पढ़‘ धातु  से 
से अनेक क्रिया रूप बनते हैं ! जैसे – पढ़ा , पढ़ता है , पढ़ना , पढ़ा था , पढ़िए ! इनमें पढ़ एक 

 

ऐसा अंश है , जो सभी रूपों में मिल रहा है ! इस  समान रूप से मिलने वाले अंश को 
धातु या क्रिया धातु कहते हैं !

 

 
धातु के भेद इस प्रकार हैं – 
 
1. सामान्य ( मूल ) धातु –  सामान्य , मूल या रूढ़ क्रिया धातुएं रूढ़ शब्द के रूप में प्रचलित हैं!

 

    यौगिक अथवा व्युत्पन्न न होने के कारण ही इन्हें सामान्य या सरल धातुएं भी कहते हैं ;
    जैसे – सुनना , खेलना , लिखना , जाना , खाना आदि !

 

 
2. व्युत्पन्न धातु –  जो धातुएं किसी मूल धातु में प्रत्यय लगा कर अथवा मूल धातु को किसी 
    अन्य प्रकार से बदलकर बनाई जाती हैं , उन्हें व्युत्पन्न धातुएं कहते हैं ! जैसे –

 

 
    मूल रूप           व्युत्पन्न धातु ( प्रेरणार्थक )                      व्युत्पन्न ( अकर्मक )

1.  काटना                    कटवाना                                                        कटना 
 
2.  खाना                      खिलाना , खिलवाना                         

 

 
3.  खोलना                   खुलवाना                                                       खुलना 

–  मूल धातुएं अकर्मक होती हैं , या सकर्मक ! मूल अकर्मक धातुओं से प्रेरणार्थक अथवा   
   सकर्मक धातुएं व्युत्पन्न होती हैं !

 

 
3.  नाम धातु –  संज्ञा , सर्वनाम और विशेषण शब्दों के पीछे प्रत्यय लगाकर जो क्रिया 
     धातुएं बनती हैं , उन्हें नाम धातु क्रिया कहते हैं , जैसे –

 

 
–  संज्ञा शब्दों सेलाज से लजाना , बात से बतियाना !  हिनहिन से हिनहिनाना ,  
–  विशेषण शब्दों से –  गर्म से गर्माना , मोटा से मुटाना  !

 

–  सर्वनाम से –    अपना से अपनाना  !
 
4.  मिश्र धातु –  जिन संज्ञा , विशेषण और क्रिया विशेषण शब्दों के बाद  ‘ करना ‘  यह होना 

 

     जैसे क्रिया पदों के प्रयोग से जो नई क्रिया धातुएं बनती हैं , उन्हें मिश्र धातुएं कहते हैं 
 
1.  होना या करना  – काम करना , काम होना !

 

 
2.  देना –  धन देना , उधार देना !
 
3.  खाना  –  मार खाना , हवा खाना !

4.  मारना –  गोता मारना , डींग मारना !
 
5.  लेना –  जान लेना , खा लेना !
 

 

6.  जाना –  पी जाना , सो जाना !
 
7.  आना –  याद आना , नजर आना !
 
5-  अनुकरणात्मक धातु –  जो धातुएं किसी ध्वनि के अनुकरण पर बनाई जाती हैं ,                                   

 

     अनुकरणात्मक धातुएं कहते हैं ! जैसे – 
     टनटन – टनटनाना , चटकना , पटकना , खटकना धातुएं भी अनुकरणात्मक धातुओं 

 

     के अंतर्गत आती हैं !         

Sandhi in Hindi grammer

 

 संधि :-
 
दो पदों में संयोजन होने पर जब दो वर्ण पास -पास आते हैं , तब उनमें जो विकार सहित 
मेल होता है , उसे संधि कहते हैं !
 
संधि तीन प्रकार की होती हैं :-
 
1. स्वर संधि –  दो स्वरों के पास -पास आने पर उनमें जो रूपान्तरण होता है , उसे स्वर 
                   कहते है !  स्वर संधि के पांच भेद हैं :-
 
1. दीर्घ स्वर संधि 
 
2. गुण स्वर संधि 
 
3. यण स्वर संधि 
 
4. वृद्धि स्वर संधि 
 
5. अयादि स्वर संधि 
 
1-  दीर्घ स्वर संधि–    जब दो सवर्णी स्वर पास -पास आते हैं , तो मिलकर दीर्घ हो जाते हैं !
     जैसे –
 
1. अ+अ = आ          भाव +अर्थ = भावार्थ 
 
2. इ +ई =  ई           गिरि +ईश  = गिरीश 
 
3. उ +उ = ऊ           अनु +उदित = अनूदित 
 
4. ऊ +उ  =ऊ          वधू +उत्सव =वधूत्सव 
 
5. आ +आ =आ        विद्या +आलय = विधालय   
 
2-   गुण संधि :-  अ तथा आ के बाद इ , ई , उ , ऊ तथा ऋ आने पर क्रमश: ए , ओ तथा 
      अनतस्थ  र होता है इस विकार को गुण संधि कहते है !
      जैसे :-
 
1. अ +इ =ए           देव +इन्द्र = देवेन्द्र 
 
2. अ +ऊ =ओ         जल +ऊर्मि = जलोर्मि 
 
3. अ +ई =ए            नर +ईश = नरेश 
 
4. आ +इ =ए           महा +इन्द्र = महेन्द्र 
 
5. आ +उ =ओ          नयन +उत्सव = नयनोत्सव 
 
3- यण स्वर संधि :-   यदि इ , ई , उ , ऊ ,और ऋ के बाद कोई भिन्न स्वर आए तो इनका 
    परिवर्तन क्रमश:  य , व् और  र में हो जाता है ! जैसे –  
 
1. इ का य = इति +आदि = इत्यादि 
 
2. ई का य = देवी +आवाहन = देव्यावाहन 
 
3. उ का व = सु +आगत = स्वागत 
 
4. ऊ का व = वधू +आगमन = वध्वागमन 
 
5. ऋ का र = पितृ +आदेश = पित्रादेश 
 
3-  वृद्धि स्वर संधि :-  यदि  अ  अथवा  आ के बाद ए अथवा ऐ हो तो दोनों को मिलाकर 
     ऐ और यदि ओ  अथवा औ हो तो दोनों को मिलाकर औ हो जाता है ! जैसे  – 
 
1. अ +ए =ऐ        एक +एक =  एकैक 
 
2. अ +ऐ =ऐ        मत +ऐक्य = मतैक्य 
 
3. अ +औ=औ      परम +औषध = परमौषध 
 
4. आ +औ =औ    महा +औषध = महौषध 
 
5. आ +ओ =औ     महा +ओघ = महौघ 
 
5- अयादि स्वर संधि :-  यदि ए , ऐ और ओ , औ के पशचात इन्हें छोड़कर कोई अन्य स्वर 
    हो तो इनका परिवर्तन क्रमश: अय , आय , अव , आव में हो जाता है जैसे – 
 
1. ए का अय          ने +अन = नयन 
 
2. ऐ का आय         नै +अक = नायक 
 
3. ओ का अव         पो +अन = पवन 
 
4. औ का आव        पौ +अन = पावन 
 
5. का परिवर्तन में =   श्रो +अन = श्रवण 
 
2- व्यंजन संधि :-  व्यंजन के साथ स्वर अथवा व्यंजन के मेल से उस व्यंजन में जो 
    रुपान्तरण होता है , उसे व्यंजन संधि कहते हैं जैसे :- 
 
1. प्रति +छवि = प्रतिच्छवि 
 
2. दिक् +अन्त = दिगन्त 
 
3. दिक् +गज = दिग्गज 
 
4. अनु +छेद =अनुच्छेद 
 
5. अच +अन्त = अजन्त  
 
3- विसर्ग संधि : –  विसर्ग के साथ स्वर या व्यंजन का मेल होने पर जो विकार होता है ,                          
    उसे विसर्ग संधि कहते हैं ! जैसे –
 
1. मन: +रथ = मनोरथ 
 
2. यश: +अभिलाषा = यशोभिलाषा 
 
3. अध: +गति = अधोगति 
 
4. नि: +छल  = निश्छल 
 
5. दु: +गम = दुर्गम 

Punctuation in Hindi Grammer

विराम चिन्ह 

 
भाषा में स्थान -विशेष पर रुकने अथवा उतार -चढ़ाव आदि दिखाने के लिए जिन चिन्हों का प्रयोग किया जाता है उन्हें ही  ‘ विराम चिन्ह ‘ कहते है !
                   
               
1. पूर्ण विराम :-  ( )
                             
 – प्रत्येक वाक्य की समाप्ति पर इस चिन्ह का प्रयोग किया जाता है !
 
2. उपविराम :-   ( : )
 
 – उपविराम का प्रयोग संवाद -लेखन एकांकी लेखन या नाटक लेखन में वक्ता के नाम 
   के बाद किया जाता है !   
 
3. अर्ध विराम :-  ( ; )
 
  – इसमें उपविराम से भी कम ठहराव होता है ! यदि खंडवाक्य का आरंभ वरन, पर , परन्तु ,
    किन्तु , क्योंकि इसलिए , तो भी आदि शब्दों से हो तो उसके पहले इसका प्रयोग करना 
    चाहिए ! 
 
4. अल्प विराम :-  ( , )
 
  – इसमें बहुत कम ठहराव होता है !
 
5. प्रश्नबोधक :-  ( ? )    
 
6. विस्मयादिबोधक :-  ( ! )
 
 – विस्मय , हर्ष , शोक , घृणा , प्रेम आदि भावों को प्रकट करने वाले शब्दों के आगे इसका 
   प्रयोग होता है !
 
7. निर्देशक चिन्ह :-   ( _ )
 
8. योजक चिन्ह :-     ( )
 
 – द्वन्द्व समास के दो पदों के बीच , सहचर शब्दों के बीच प्रयोग !
 
9. कोष्ठक चिन्ह :-   ( )
 
10. उदधरण चिन्ह :-  (  ” “  )
 
11. लाघव चिन्ह :-  ( o )
 
12. विवरण चिन्ह :-  (  :- )

Voices in Hindi Grammer

 

वाच्य :-


क्रिया के जिस रूपांतर से यह बोध हो कि क्रिया द्वारा किए गए विधान का केंद्र बिंदु कर्ता है ,
 
कर्म अथवा क्रिया -भाव , उसे वाच्य कहते हैं !
 
वाच्य के तीन भेद हैं – 
 
1- कर्तृवाच्य –  जिसमें कर्ता प्रधान हो उसे कर्तृवाच्य कहते हैं !
 
    कर्तृवाच्य में क्रिया के लिंग , वचन आदि कर्ता के समान होते हैं , जैसे – सीता गाना गाती है , 
     इस वाच्य में सकर्मक और अकर्मक दोनों प्रकार की क्रियाओं का प्रयोग किया जाता है !
     कभी -कभी कर्ता के साथ  ‘ ने ‘  चिन्ह नहीं लगाया जाता !
 
2-  कर्मवाच्य –  जिस वाक्य में कर्म प्रधान होता है , उसे कर्मवाच्य कहते हैं !
 
    कर्मवाच्य में क्रिया के लिंग , वचन आदि कर्म के अनुसार होते हैं , जैसे – रमेश से पुस्तक 
    लिखी जाती है ! इसमें केवल  ‘ सकर्मक ‘ क्रियाओं का प्रयोग होता है !
 
3-  भाववाच्य –  जिस वाक्य में भाव प्रधान होता है , उसे भाववाच्य कहते हैं !
 
     भाववाच्य में क्रिया की प्रधानता रहती है , इसमें क्रिया सदा एक वचन , पुल्लिंग और 
     अन्य पुरुष में आती है ! इसका प्रयोग प्राय: निषेधार्थ में होता है , 
     जैसे – चला नहीं जाता , पीया नहीं जाता !
 
–  कर्तृवाच्य से कर्मवाच्य बनाना :-
 
 
          ( कर्तृवाच्य )                             ( कर्मवाच्य )
 
1-   रीमा चित्र बनाती है !               –  रीमा द्वारा चित्र बनाया जाता है !
 
2-   मैंने पत्र लिखा !                     –  मुझसे पत्र लिखा गया !
 
 
–  कर्तृवाच्य से भाववाच्य बनाना :-
 
          ( कर्तृवाच्य )                             ( भाववाच्य )
 
1-   मैं नहीं पढ़ता !                      –   मुझसे पढ़ा नहीं जाता !
 
2-   राम नहीं रोता है !                  –   राम से रोया नहीं जाता !
  

Genders in Hindi Grammer

 लिंग :-

संज्ञा के जिस रूप से किसी जाति  का बोध होता है ,उसे लिंग कहते हैं !

इसके दो भेद होते हैं :-

1-  पुल्लिंग :-  जिस संज्ञा शब्दों से पुरुष जाति का बोध होता है , उसे पुल्लिंग कहते हैं –  जैसे – बेटा , राजा  आदि !

2-  स्त्रीलिंग :-  जिन संज्ञा शब्दों से स्त्री जाति का  बोध होता है, उसे स्त्रीलिंग कहते हैं –  जैसे –  बेटी , रानी आदि !

स्त्रीलिंग प्रत्यय –

पुल्लिंग शब्द को स्त्रीलिंग बनाने के लिए कुछ प्रत्ययों को शब्द में जोड़ा जाता है जिन्हें स्त्री प्रत्यय कहते हैं ! जैसे – 

1.   =   बड़ा – बड़ी , भला – भली 

2.  इनी =  योगी – योगिनी , कमल – कमलिनी 

3.  इन =   धोबी – धोबिन , तेली – तेलिन 

4.  नी =   मोर – मोरनी , चोर – चोरनी 

5.  आनी =  जेठ – जेठानी , देवर – देवरानी 

6.  आइन =   ठाकुर – ठकुराइन , पंडित – पंडिताइन 

7.  इया =   बेटा – बिटिया , लोटा – लुटिया 


कुछ शब्द अर्थ की द्रष्टि से समान होते हुए भी लिंग की द्रष्टि से भिन्न होते हैं ! उनका उचित प्रयोग करना चाहिए !जैसे –               

      पुल्लिंग                        स्त्रीलिंग 
                     
1.   कवि                            कवयित्री 

2.   विद्वान                          विदुषी 

3.   नेता                             नेत्री 

4.   महान                           महती 

5.   साधु                             साध्वी 

(  ऊपर दिए गए  शब्दों का सही प्रयोग करने पर ही शुद्ध वाक्य बनता है !  )

जैसे :-   1-  वह एक विद्वान लेखिका है –   (  अशुद्ध वाक्य  )
                 
                 वह एक विदुषी लेखिका है –   (   शुद्ध वाक्य    )

Numbers in Hindi grammer

वचन:-


संज्ञा अथवा अन्य विकारी शब्दों के जिस रूप में संख्या का  बोध हो , उसे वचन कहते हैं !

वचन के दो भेद होते हैं – 

1-  एकवचन :-  संज्ञा के जिस रूप से एक ही वस्तु , पदार्थ या प्राणी का बोध होता है , उसे एकवचन कहते हैं !
     जैसे –  लड़की , बेटी , घोड़ा , नदी आदि !

2-  बहुवचन :-  संज्ञा के जिस रूप से एक से अधिक वस्तुओं , पदार्थों या प्राणियों का बोध होता है , उसे बहुवचन कहते हैं !
     जैसे –  लड़कियाँ , बेटियाँ , घोड़े  , नदियाँ  आदि !

–  एकवचन से  बहुवचन बनाने के नियम इस प्रकार हैं –

1-   को एं कर देने से =    रात = रातें 

2-  अनुस्वारी  ( . ) लगाने से =    डिबिया =  डिबियां 

3-  यां जोड़ देने से =    रीति =  रीतियां 

4-  एं लगाने से =   माला =  मालाएं 

5-    को कर देने से =   बेटा =  बेटे 

Verbs in Hindi Grammer

क्रिया :-

जिस शब्द से किसी कार्य का होना या करना समझा जाय , उसे क्रिया कहते हैं ! जैसे – खाना , पीना  , सोना , रहना , जाना आदि !

क्रिया के दो भेद हैं :- 

1- सकर्मक क्रिया :-  जो क्रिया कर्म के साथ आती है , उसे सकर्मक क्रिया कहते हैं !
    जैसे – मोहन फल खाता है ! ( खाना क्रिया के साथ कर्म फल है  )


 2- अकर्मक क्रिया :-  अकर्मक क्रिया के साथ कर्म नहीं होता तथा उसका फल कर्ता पर पड़ता है !
     जैसे – राधा रोती है ! ( कर्म का अभाव है तथा रोती है क्रिया का फल राधा पर पड़ता है  )

–  रचना के आधार पर क्रिया के पाँच भेद है :-

1- सामान्य क्रिया :-वाक्य में केवल एक क्रिया का प्रयोग ! जैसे –  तुम चलो , मोहन पढ़ा  आदि !


2- संयुक्त क्रिया :-  दो या दो से अधिक धातुओं के मेल से बनी क्रियाएँ संयुक्त क्रियाएँ होती है ! जैसे – गीता स्कूल चली गई आदि !

3- नामधातु क्रियाएँ :-  क्रिया को छोड़कर दुसरे शब्दों  ( संज्ञा , सर्वनाम , एवं  विशेषण  ) से जो धातु बनते है , उन्हें नामधातु क्रिया कहते है जैसे –  अपना – अपनाना , गरम – गरमाना  आदि !

4- प्रेरणार्थक क्रिया :-  कर्ता स्वयं कार्य न करके किसी अन्य को करने की प्रेरणा देता है  जैसे – लिखवाया , पिलवाती आदि !

5- पूर्वकालिक क्रिया :-  जब कोई कर्ता एक क्रिया समाप्त करके दूसरी क्रिया करता है तब पहली क्रिया  ‘ पूर्वकालिक क्रिया कहलाती है जैसे –  वे पढ़कर चले गये  ,  मैं नहाकर जाउँगा  आदि !

Karak in Hindi Grammer

                   

                                              कारक 
 
जो किसी शब्द का क्रिया के  साथ सम्बन्ध बताए  वह कारक है !
 
कारक के आठ भेद हैं :-
 
जिनका विवरण इस  प्रकार है :-
 
 कारक                                                             कारक चिन्ह 
 
1. कर्ता                                                              ने 
 
2. कर्म                                                               को 
 
3. करण                                                             से , के द्वारा 
 
4. सम्प्रदान                                                        को , के लिए 
 
5. अपादान                                                         से (अलग करना )  
 
6. सम्बन्ध                                                         का , की , के 
 
7. अधिकरण                                                      में , पर 
 
8. सम्बोधन                                                        हे , अरे