आवर्त सारणी के गुणों में आवर्तीता [Charactor of Aavrt Saarni]

विभिन्न राशियों में आवर्तीकरण:-

  1. आयनन विभव
  2. इलेक्ट्रोन बन्धुता
  3. विद्युत् ऋणता
  4. त्रिज्या
  5. संयोजकता

1.आयनन विभव:-

किसी विलगित गैसीय परमाणुके सबसे बाहरी कोश में सबसे ढीले बंधे इलेक्ट्रोन को निकालने के लिए दी जाने वाली ऊर्जा आयनन विभव कहलाती हैं|

  • आयनन विभव एक उष्माशोषी(एंडोथर्मिक) प्रक्रम हैं|
  • आयनन विभव का मान धातुओं के लिए ज्ञात किया जाता हैं|
  • इकाई-ev/atom ,jule/atom ,kailory/atom
  • किसी भी धात्विक परमाणु के लिए क्रमागत आयनन विभवो के मान लगातार बढ़ते जाते हैं|
  • [I.P.1<I.P.2<I.P.3——–]
  • आयनन विभव में एंथेल्पी परिवर्तन धनात्मक पाया जाता हैं|

आयनन विभव को प्रभावित करने वाले कारक-

1.परमाणु आकार –

  • परमाणु आकार का मान बढने पर आयनन विभव का मान कम हो जाता है क्योंकि नाभिक के द्वारा बाह्यतम कोश के इलेक्ट्रोन को आकर्षित करने की क्षमता कम हो जाती है|
  • अत: आयनन विभव = 1/परमाणु आकार

नोट-

  • आवर्त सारणी में सर्वाधिक आयनन विभव अक्रिय गैसों का [He] का पाया जाता हैं|जबकि न्यूनतम आयनन विभव क्षारीय धातुओं का [Cs] का पाया जाता हैं|
  • एक वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर लगातार कोशो की संख्या बढती जाती है इसलिए आयनन विभव का मान कम होता जाता हैं|

Li>Na>K>Rb>Cs

2.प्रभावी नाभिकीय आवेश-

  • इसका मान बढने पर परमाणु का आकार संकुचित होता जाता हैं अत:उसमें से इलेक्ट्रोन निकालने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती हैं|
  • आयनन विभव =प्रभावी नाभिकीय आवेश
  • सामान्यत एक आवर्त में बायीं से दाई ओर जाने पर प्रभावी नाभिकीय आवेश का मान बढ़ता जाता हैं अत: आयनन विभव का मान बढ़ता जाता हैं|

3.इलेक्ट्रानिक विन्यास-

  • स्थाई इलेक्ट्रोनिक विन्यास में से इलेक्ट्रोन निकालने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती हैं|
  • इलेक्ट्रोनिक विन्यास का स्थायित्त्व क्रम –पूर्ण पूरित >अर्द्ध पूरित >विषम पूरित
  • आयनन विभव = इलेक्ट्रोनिक विन्यास का स्थायित्त्व

4.भेदन क्षमता-

  • किसी परमाणु में कोश के अंतर्गत उपस्थित उपकोशो में भेदन क्षमता का क्रम
  • S>P>D>F
  • अत: आयनन विभव = भेदन क्षमता
  • द्वितीय आवर्त के तत्वों के आयनन विभव-
  • Li<B<Be<C<N<O<F<Ne

2.इलेक्ट्रोन बन्धुता-

किसी विलगित गैसीय परमाणु के सबसे बाह्यतम कोश में इलेक्ट्रोन जोड़ने के फलस्वरूप निकलने वाली ऊर्जा के मान को इलेक्ट्रोन बन्धुता कहते हैं|

  • सामान्यत:इलेक्ट्रोन बन्धुता [प्रथम इले. बन्धुता]ऊष्माक्षेपी प्रक्रम होता हैं|अर्थात एन्थलैपी परिवर्तन का मान ऋणात्मक पाया जाता हैं|जबकि द्वितीय,तृतीय आदि इलेक्ट्रोन बन्धुताएं ऊष्माशोषी होती हैं|
  • इलेक्ट्रोन ब्न्धुताओं के मान सामान्यत:अधात्विक तत्वों के लिए ज्ञात किये जाते हैं|
  • आवर्त सारणी में न्यूनतम इलेक्ट्रोन बन्धुता क्षारीय धातुओं की जबकि अधिकतम हैलोजन परिवार के तत्वों की पाई जाती हैं|

इलेक्ट्रोन बन्धुता को प्रभावित करने वाले कारक-

  1. परमाणु आकार –
  • परमाणु आकार का मान बढने पर नाभिकीय आकर्षण बल का मान कम हो जाता हैं|अत:एलेक्त्रों बन्धुता का मान भी कम हो जाता हैं|
  • इलेक्ट्रोन बन्धुता =1/परमाणु आकार
  • एक वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर परमाण्विक आकार का मान बढ़ता जाता हैं|इसलिए इलेक्ट्रोन बन्धुता का मान सामान्यत: कम होता जाता हैं|
  • Be>Mg>Ca>Sr>Ba
  • C >Si >Ge >Sn >Pb

2.प्रभावी नाभिकीय आवेश-

  • प्रभावी नाभिकीय आवेश का मान बढने पर परमाणु के द्वारा इलेक्ट्रोन ग्रहण करने की प्रवृति बढ़ जाती हैं|अत: इलेक्ट्रोन बन्धुता का मान बढ़ जाता हैं|
  • इलेक्ट्रोन बन्धुता = प्रभावी नाभिकीय आवेश
  • इलेक्ट्रोनिक विन्यासो का स्थायित्त्व:
  • किसी भी तत्व के बाह्यतम कोश में इलेक्ट्रोन जोड़ने के फलस्वरूप विषमपूरित इलेक्ट्रोनिक विन्यास अर्द्धपूरित  या पूर्ण पूरित इलेक्ट्रोनिक विन्यास में परिवर्तित हो जाता हैं|तो इलेक्ट्रोन बन्धुता का मान बढ़ जाता हैं|जबर्दपूरित या पूर्ण पूरित से विषम पूरित विन्यास प्राप्त होता हैं तो इलेक्ट्रोन बन्धुता का मान बढ़ जाता हैं|
  • अत: इलेक्ट्रोन बन्धुता = इलेक्ट्रोन विन्यास का स्थायित्त्व

नोट-

  • 1A वर्ग के तत्वों की इलेक्ट्रोन बन्धुता 2 A वर्ग के तत्वों से अधिक पायी जाती हैं|
  • 4 A वर्ग के तत्वों की इलेक्ट्रोन बन्धुता 5 A वर्ग के तत्वों से अधिक पायी जाती हैं|क्योंकि इलेक्ट्रोन जोड़ने के पश्चात विषमपूरित इलेक्ट्रोनिक विन्यास अर्द्धपूरित या पूर्ण पूरित इलेक्ट्रोनिक विन्यास में परिवर्तित हो जाते हैं|
  • Be <Li <B <N < C <O < F

3.पृष्ठीय आवेश घन्त्त्व-

  • सामान्यत: p खंड के तत्वो में द्वितीय आवर्त के तत्वों पर उच्च पृष्ठीय आवेश घन्त्त्व पाया जाता हैं|जबकि तृतीय आवर्त के तत्वों पर पृष्ठीय आवेश घन्त्त्व का मान द्वितीय आवर्त के तत्वों की तुलना में कुछ कम हो जाता हैं| अत: द्वितीय आवर्त के तत्व जुड़ने वाले इलेक्ट्रोनो को प्रतिकर्षित करते हैं|जिसके कारण इलेक्ट्रोन ब्न्धुताओ के मान तृतीय आवर्त के तत्वों से कम हो जाते हैं|
  • Cl >F >Br >I
  • S >O >Se >Te >Po
  • P >N >As >Sb >Bi

3.विद्युत् ऋणता:-

किन्ही दो बंधित परमाणुओं में बंध के इलेक्ट्रोनो को परमाणु के द्वारा आकर्षित करने की क्षमता को परमाणु की विद्युत् ऋणता कहा जाता हैं|

  • विद्युत् ऋणता इकाई रहित राशि हैं|
  • अक्रिय गैसों की विद्युत् ऋणता शून्य होती हैं|
  • न्यूनतम विद्युत् ऋणता क्षारीय धातुओं की तथा अधिकतम विद्युत् ऋणता हैलोजन वर्ग के तत्वों के फ़्लोरिन की पाई जाती हैं|
  • विद्युत् ऋणता एक सापेक्ष राशि हैं|आवर्त सारणी में सभी तत्वों की विद्युत् ऋणताऐ हाइड्रोजन तत्व के सापेक्ष मानी गई हैं|

विद्युत् ऋणता को प्रभावित करने वाले कारक :-

  • आवर्त व वर्ग में सतत रूप से परिवर्तित होने वाली एकमात्र राशि हैं|

1.परमाणु आकार

  • किसी भी परमाणु का आकार बढने पर उस परमाणु के नाभिक के द्वारा बंध में बंधित इलेक्ट्रोन को आकर्षित करने की क्षमता कम हो जाती हैं|
  • विद्युत् ऋणता =1/ परमाणु आकार
  • एक ही वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर कोशो की संख्या बढने के कारण परमाणु आकार बढ़ता जाता हैं|अत: विद्युत् ऋणता के मान कम हो जाते हैं|

2.प्रभावी नाभिकीय आवेश-

  • प्रभावी नाभिकीय आवेश का मान बढने पर परमाणु के द्वारा बंधित इलेक्ट्रोनो को आकर्षित करने की क्षमता बढ़ जाती हैं|
  • विद्युत् ऋणता = प्रभावी नाभिकीय आवेश
  • एक आवर्त में बायीं से दायीं ओर जाने पर प्रभावी नाभिकीय आवेश का मान बढ़ जाता हैं|अत: विद्युत् ऋणता का मान भी बढ़ जाता हैं|
  • Li 1.0 <Be 1.5  <B  2.0 <C  2.5 < N  3.0 < O 3.5  < F 4.0

4.परमाण्विक त्रिज्या

  • किसी भी परमाणु मे नाभिक से बाह्यतम कोश के मध्य की दूरी परमाण्विक त्रिज्या कहलाती हैं|
  • सामान्यत: त्रिज्याए 4 प्रकार की पाई जाती हैं|
  • सहसंयोजक त्रिज्या
  • धात्विक त्रिज्या
  • आयनिक त्रिज्या
  • वांडरवाल त्रिज्या

उपरोक्त चारो त्रिज्याओ की त्रिजायाओ का बढ़ता हुआ क्रम :-

आयनिक त्रिज्या < सहसंयोजक त्रिज्या < धात्विक त्रिज्या < वांडरवाल त्रिज्या

1.सहसंयोजक त्रिज्या (sbcr);-

  • सामान्यत:सहसंयोजक यौगिक दो प्रकार के पाये जाते हैं|
  • अध्रुवीय सहसंयोजक यौगिक –इस प्रकार के यौगिको के निर्माण समान प्रकार के परमाणुओ के संयोजन या अतिव्यापन से होता हैं|
  • Rcr =d/2
  • अध्रुवीय एकल बंधित सहसंयोजक अणु में अंतरनाभिकीय दूरी का आधा मान सहसंयोजक त्रिज्या कहलाती हैं|
  • ध्रुवीय सहसंयोजक यौगिक – वे सहसंयोजक यौगिक या अणु जिनमे विषम परमाणुओ के मध्य सहसंयोजक बंध उपस्थित पाया जाता हैं|
  • इस प्रकार के यौगिको में दो परमाणुओ के मध्य बंधित इलेक्ट्रोन अधिक विद्युत् ऋणी परमाणु की तरफ विस्थापित हो जाते हैं|जिसके कारण परमाणुओ पर आंशिक आवेश उत्पन्न हो जाता हैं|अधिक विद्युत् ऋणी पर आंशिक ऋणआवेश  जबकि कम विद्युत् ऋणी पर धनावेश आ जाता हैं|
  • ध्रुवीय सहसंयोजक बंध में बंध लम्बाई का मान कुछ कम हो जाता हैं तथा बंध ऊर्जा का मान कुछ बढ़ जाता हैं|
  • बंध ऊर्जा = 1/बंध लम्बाई =विद्युत् ऋणता
  • शुमाकर व स्टीवेंसन नामक वैज्ञानिकों ने ध्रुवीय सहसंयोजक बन्धो की बंध लम्बाई व त्रिज्या ज्ञात करने के लिए निम्न सूत्र का प्रतिपादन किया|
  • dA-B = rA+rB -0.09 (XA – X B)
  • H-F ,H –Cl ,H-Br ,H -I

धात्विक त्रिज्या –

  • किसी धात्विक क्रिस्टल जालक में दो समीपवर्ती धातु परमाणुओ के अंतर नाभिकीय दूरी का आधा मान धात्विक त्रिज्या कहलाता हैं|
  • rmr =d/2
  • धात्विक त्रिज्या का मान धात्विक बंध की सामर्थ्य पर निर्भर करता हैं|
  • धात्विक बंध सामर्थ्य = 1/ धात्विक बंध की लम्बाई
  • नोट

  • d व f ब्लांक के तत्वों में मुख्यत धात्विक त्रिज्याए पाई जाती है जबकि p ब्लाक के तत्वों में सहसंयोजक व s ब्लाक के तत्वों में आयनिक त्रिज्या पाई जाती हैं|

वांडरवाल त्रिज्या –

सहसंयोजक अणुओ में दो निकटतम बंधित परमाणुओ के मध्य की अंतरनाभिकीय दूरी का आधा मान वांडर वाल त्रिज्या के नाम से जाना जाता हैं|

  • सामान्यत यह त्रिज्या अधात्विक तत्वों के बीच पाई जाती हैं|
  • rvwr =d/2
  • सहसंयोजक अणुओ के मध्य वांडरवाल त्रिज्याए पाई जाती हैं|

आयनिक त्रिज्या –

किसी भी प्रकार के आयन में नाभिक से बाह्यतम कोश के मध्य की दूरी आयनिक त्रिज्या कहलाती हैं|

  • सामान्यत आयनिक त्रिज्या दो प्रकार की पाई जाती हैं|
  • धनायनिक त्रिज्या
  • ऋणायनिक त्रिज्या

नोट

  • मुलक :-परमाणु या परमाणुओ का समूह जिन पर की आवेश उपस्थित पाया जाता हैं मूलक कहलाते हैं|
  • जैसे- Cl,Br,Na+,So4
  • आयन :-यदि किसी एकल परमाणु पर आवेश उपस्थित पाया जाता हैं तो उसे आयन कहा जाता हैं|
  • जैसे– Cl,Br,Na+
  • एक आयन हमेशा मूलक होता है लेकिन एक मूलक आयन हो भी सकता है और नहीं भी|

धनायनिक त्रिज्या –

  • किसी धनायन में नाभिक से भाय्तं कोश के मध्य की दूरी धनायनिक त्रिज्या कहलाती हैं|
  • धनायन पर आवेश की मात्र बढने पर धनायनिक त्रिज्या का मान लगातार कम होता जाता हैं|
  • धनायन का आकार/त्रिज्या =1/ धनायन पर उपस्थित आवेश

ऋणायनिक त्रिज्या –

  • किसी भी ऋणआयन में नाभिक से बाह्यतम कोश के मध्य की दूरी को ऋणायनिक त्रिज्या त्रिज्या कहा जाता है|
  • ऋणआयन पर आवेश की मात्रा बढने पर ऋणायनिक त्रिज्या का मान लगातार बढ़ता जाता हैं|
  • जैसे- M-4 >M-3 >M-2 >M-1
  • अत: धनायन की त्रिज्या का मान उदासीन परमाणु की तुलना में कुछ कम पाया जाता हैं|जबकि ऋणआयन की त्रिज्या का मान अधिक पाया जाता हैं|

परमाण्विक त्रिज्या को प्रभावित करने वाले कारक:-

1.कोशो की संख्या –

  • कोशो की संख्या का मान बढने पर परमाण्विक त्रिज्या का मान बढ़ता जाता हैं|
  • जैसे- Li <Na <K <Rb <Cs
  • ऊपर से नीचे जाने कोशो की संख्या बढती है अत: परमाण्विक त्रिज्या का मान बढ़ता जाता हैं|

2.प्रभावी नाभिकीय आवेश –

  • इसका मान बढने पर परमाणु का आकार संकुचित होता जाता हैं|
  • एक आवर्त में बायीं से दायी ओर जाने पर प्रभावी नाभिकीय आवेश का मान बढ़ता है अत: परमाण्विक त्रिज्या का मान कम होता जाता हैं|

नोट

  • किसी भी आवर्त में सबसे बड़ा परमाण्विक आकार या त्रिज्या अक्रिय गैसों की पाई जाती हैं|

3.परिरक्षण प्रभाव व आवरनी प्रभाव –

  • एक ही कोश में उपस्थित इलेक्ट्रोनो के मध्य लगने वाले प्रतिकर्षण बल के मान को परिरक्षण प्रभाव कहा जाता हैं|
  • दो या दो से अधिक भिन्न-भिन्न कक्षाओं में उपस्थित इलेक्ट्रान के मध्य लगने वाले प्रतिकर्षण बल को आवरनी प्रभाव कहा जाता हैं|
  • इन दोनों का मान बढने पर परमाण्विक त्रिज्या का मान बढ़ता जाता हैं|

5.संयोजकता [Valency] –

  • किसी भी परमाणु के द्वारा अन्य परमाणु के साथ जितने बंध बनाए जाते हैं वह उसकी संयोजकता कहलाती हैं|
  • सामान्यत: संयोजकताओं केआधार पर तत्वों को 4 भागों में वर्गीकृत कर सकते हैं|
S खंड के तत्व 1A 2A
संयोजकता 1 2
वैद्युत संयोजकता +1 +2

 

P खंड के तत्व 3A 4A 5A 6A 7A
संयोजकता 3 4 3,5 2 1
वैद्युत संयोजकता +3,

-5

+4,

-4

+5,

-3

+6,

-2

+7,

-1

नोट-

  • अक्रिय गैसों की संयोजकताए एवं वैद्युत संयोजकताए दोनों के मान शून्य पाए जाते हैं|

d खंड के तत्व –

  • ये सामान्यत:वैद्युत संयोजकता प्रदर्शित करते हैं|
  • परिवर्तनशील वैद्युत संयोजकता प्रदर्शित करना d खंड के तत्वों का विशिष्ट लक्षण हैं|
3d श्रेणी Sc Ti V Cr Mn Fe Co Ni Cu ,    Zn
संयोजकता +2,

+3

+2,

+3

+4

+2,

+3,

+4,

+5

+2

,+3,

+4,

+5,

+6

+2,

+3,

+4,

+5,

+6,

+7

+2

+3

+2 +2 +1,+2

Zn=+2

 

  • अधिकतम वैद्युत संयोजकता Os तत्व की +8 पाई जाती हैं|

f खंड के तत्व:-

  • इस खंड के तत्व भी सामान्यत: वैद्युत संयोजकता प्रदर्शित करते हैं|
  • इस खंड के अधिकतर तत्वों की वैद्युत संयोजकता +3 पाई जाती हैं|

आवर्त सारणी [Periodic Table] in Hindi

आधुनिक आवर्त सारणी (मौजले की आवर्त सारणी)-

यह आवर्त सारणी परमाणु क्रमांक z पर आधारित हैं|

इनके अनुसार सभी तत्वों के भौतिक व रासायनिक गुणधर्म परमाणु क्रमांकों के आवर्ती फलन होते हैं|अर्थात तत्वों को यदि उनके बढ़ते हुए परमाणु क्रमांक के आधार पर व्यवस्थित किया जाए तो एक निश्चित समय अंतराल पश्चात समान गुण वाले तत्वों की पुनरावृति होती है|इसे ही मौजले का आवर्त नियम कहा गया|

आधुनिक आवर्त सारणी आफबाहु सिद्धांत का ग्राफीय निरूपण हैं|आधुनिक आवर्त सारणी का दीर्घ रूप बोर-बरी नामक वैज्ञानिको ने प्रतिपादित किया|

आधुनिक आवर्त सारणी में 18 वर्ग तथा 7 आवर्त बनाए गए|

इन सातो आवर्तो को नाम प्रदान किया गया|

क्रम संख्या आवर्त का नाम कहां से कहां तक तत्वों की संख्या
1 अति लघु आवर्त Z=1 ,H Z=2 ,He 2
2 लघु आवर्त Z=3 ,Li Z=10,Ne 8
3 लघु आवर्त Z=11,Na Z=18,Ar 8
4 दीर्घ आवर्त Z=19,K Z=36,Kr 18
5 दीर्घ आवर्त Z=37,Rb Z=54,Xe 18
6 अति दीर्घ आवर्त Z=55,Cs Z=86,Rn 32
7 अपूर्ण आवर्त Z=87,Fr Z=115,Uup 29

नोट-

यदि आवर्त सारणी में 112 तत्व माने जाए तो 7 वे आवर्त में कुल 26 तत्व उपस्थित होते है|

आवर्त सारणी में सबसे बड़ा वर्ग =3rd B, 32 तत्व |

जबकि सबसे बड़ा आवर्त 6 है जिसमे 32 तत्व पाये जाते हैं|

लैंथेनाईड तत्व 6ठे आवर्त में पाये जाते हैं|जबकि एक्टिंनाइड तत्व 7वे आवर्त में पाये जाते हैं|

आधुनिक वर्गीकरण:

प्रकृति में उपस्थित सभी तत्वों को आधुनिक समय में इलेक्ट्रोनिक विन्यास के आधार पर 4 खंडो में विभाजित किया गया है|अर्थात किसी तत्व का अंतिम इलेक्ट्रोन जिस कक्षक में भरा जाता है उसे उसी खंड में रखा गया हैं|

  1.  S खंड (14 तत्व)
  2. P खंड(33तत्व)
  3. Dखंड(40तत्व)
  4. F खंड(28तत्व)

S खंड के तत्व –

इस खंड में वे तत्व रखे गये है जिनका अंतिम इलेक्ट्रोन S उपकोश में भरा जाता हैं|

इस खंड में कुल 14 तत्व हैं|जिन्हें क्रमश:1-A(1) वर्ग व 2-A(2)वर्ग में रखा गया हैं|

इन्हें क्रमश क्षारीय धातु व क्षारीय मृदा धातु कहते हैं|

आवर्त सारणी में इस खंड के तत्वों को बाई तरफ रखा गया हैं|

1-A

H   2-A             [He] 1s2

Li          Be

Na       Mg

K        Ca

Rb     Sr

Cs     Ba

Fr     Ra

नोट-

  1. इस खंड में दो अधात्विक तत्व [H &He] व शेष 12 तत्व धातुएं हैं|
  2. तत्व गैसीय अवस्था [H &He] तथा 2 तत्व [Cs &Fr]द्रव अवस्था में तथा शेष 10 तत्व ठोस अवस्था में पाए जाते हैं|
  3. दो तत्व रेडियोसक्रिय अवस्था [Fr &Ra] में पाए जाते हैं|
  4. इस खंड के तत्वों की वैद्युत संयोजकता [आक्सीकरण अंक]व इलेक्ट्रोनिक विन्यास क्रमश:+1,+2तथा ns1 ,ns2 पाए जाते हैं|
  5. Li,Na,K ऐसी धातुएं है जिनको चाक़ू की सहायता से काटा जा सकता है|
  6. Na को केरोसीन में रखा जाता है क्योंकि वह जल से क्रिया कर लेता हैं|
  7. Li,K को माँ के अंतर्गत लपेट कर रखा जाता हैं क्योंकि ये धातुएं वायु व जल दोनों से क्रिया कर लेती हैं|
  8. Cs &Gs ऐई धातुएं हैं मुट्ठी में रखने पर वाष्पशील अवस्था में आ जाती हैं|
  9. आतिशबाजी के दौरान पटाखों की रोशनी में ईट जैसा लाल रंग स्ट्रांशियम तत्व के कारण व सेब जैसा हरा रंग बेरियम के कारण आता हैं|
  10. विद्युत बल्बों में फिलामेंट टंगस्टन धातु का बना होता है जबकि फ्लैश बल्बों में [जीरो वाट]में फिलामेंट मैग्नीशियम धातु का बना होता हैं|
  11. प्रकाश वैधुत सेलो में सीजियम धातु का उपयोग किया जाता हैं|
  12. सर्वाधिक प्रबल अपचायक धातु लिथियम को माना जाता हैं|जबकि सबसे बड़ा आकार s खंड में सीजियम का होता हैं|
  13. सबसे छोटा आकार s खंड में हाइड्रोजन[H] का होता है|जबकि सबसे छोटा आकार धातुओं में लिथियम [Li] का होता हैं|
  14. Ca तत्व सर्वाधिक मात्रा में दूध व अंकुरित अनाजों में पाया जाता हैं|
  15. इस खंड के तत्वों का आयनन विभन न्यूनतम होता हैं|
  16. इसके अतिरिक्त विद्युत् ऋणता व इलेक्ट्रोन बन्धुता के मान भी न्यूनतम होते हैं|

P खंड के तत्व-

इस खंड के अंतर्गत वे तत्व रखे गये है जिनका अंतिम इलेक्ट्रानिक विन्यास P उपकोश में भरा जाता हैं|

P उपकोश में अधिकतम 6 इलेक्ट्रोन आ सकते हैं|

इस खंड के तत्वों को 6 वर्गो में विभाजित किया गया हैं|

इस खंड में तीनो प्रकार के [धातु,अधातु,उपधातु]तत्व रखे गये हैं|इन तत्वों की संख्या 33 मानी गई हैं|

इस खंड के तत्व परिवर्तनशील वैद्युत संयोजकता प्रदर्शित करते हैं|

भिखारी तत्व :वर्ग 13 {3rd  A}:-

Z=5[B]                       धातु=4 ,उपधातु=1[B],अधातु=0

Z=13[Al]

Z=31[Ga]

Z=49[In]

Z=81[Tl

नोट;

Ga तत्व द्रव अवस्था में पाया जाता हैं|शेष तत्व ठोस अवस्था में पाये जाते हैं|

Al को भविष्य की धातु कहा जाता है तथा पृथ्वी की भूपर्पटी में सर्वाधिक मात्रा में पाई जाने वाली धातु हैं|

कार्बन परिवार के तत्व [वर्ग14,4th A]

Z= 6 C             धातु =3,उपधातु =1 ,अधातु =1

Z=14Si

Z=32Ge

Z=50 Sn

Z=82 Pb

कार्बन तत्व को सामान्य तत्व के नाम से जाना जाता हैं|

प्रकृति में सर्वाधिक मात्रा में यौगिक केवल दो तत्वों कार्बन व हाइड्रोजन के पाये जाते हैं|

सीसा,मर्करी दो ऐसी धातु है जो विद्युत् की कुचालक पाई जाती है जबकि पारा धातु ताप की सर्वश्रेष्ठ सुचालक पाई जाती हैं|

कार्बन ग्रेफाईट नामक अधातु विद्युत् की सुचालक पाई जाती है|

इस खंड की धातुएं (4th A)मिश्र धातुओं का निर्माण करने में प्रयुक्त होती हैं|

सिलिकन नामक उपधातु का प्रयोग कम्प्यूटर चिप का निर्माण करने में किया जाता हैं|

 N(5th –A) परिवार के तत्व [15]:

इस परिवार के तत्वों को निकोजन परिवार के तत्व कहा जाता हैं|

Z=7    -N        धातु-2 ,उपधातु =1 ,अधातु=2

Z=15-P

Z=33-As

Z=51-Sb

Z=83-Bi

नोट:

1.वायुमंडल में सर्वाधिक मात्रा में नाइट्रोजन तत्व उपस्थित पाया जाता हैं|

2.भूमि में सामान्यत: तीन तत्वों की (N,P,K) की कमी पाई जाती हैं|

3.पेड़-पौधों को नाइट्रोजन तत्व सर्वाधिक मात्रा में वायुमंडलीय नाइट्रोजन से प्राप्त होता हैं|

4.वायुमंडलीय नाइट्रोजन को नाइट्रेट आयन में परिवर्तित करने का कार्य दलहनी पादपो की जडो में उपस्थित ग्रंथियों में पाये जाने वाले राइजोबियम ,एजोतोबेक्टर आदि जीवाणुओं के द्वारा किया जाता हैं|इस प्रक्रिया को नाइट्रोजन स्थिरीकरण/यौगिकीकरण कहते हैं|

5.पेड़-पौधे नाइट्रोजन तत्व को नाइट्रेट आयन के रूप में प्रयोग करते हैं|

6.कीट भक्षी पादपों में (ड्रोसेरा,युट्रीकुलेरिया,युक्का) नाइट्रोजन तत्व की कमी पाई जाती हैं|जिसे ये कीटो का भक्षण कर पूरा करते हैं|

फास्फोरस तत्व के 4 अपररूप पाये जाते हैं|

  • लाल फास्फोरस-दियासलाई का निर्माण करने में,मसाला बनाने में किया जाता हैं|सर्वाधिक स्थाई भी यही हैं|
  • काला फास्फोरस-यह अर्द्ध चालक प्रकृति दर्शाता है|
  • पीला फास्फोरस-यह सर्वाधिक क्रियाशील पाया जाता हैं|इसलिए इसे जल में डुबोकर रखा जाता हैं|
  • सफेद फास्फोरस-प्रकृति में सबसे न्यूनतम मात्रा में पाया जाता हैं|

आक्सीजन परिवार के तत्व (16)[6th –A]

इस वर्ग के तत्वों को चाल्कोजन व पिकोजन परिवार के तत्व कहा जाता हैं|

Z=8- O            धातु-1 ,उपधातु-1,अधातु-3 (O, S, Se

Z=16-S

Z=34-Se

Z=52-Te

Z=84-Po

1.पृथ्वी की भू-पर्पटी व मनुष्य के शरीर में सर्वाधिक मात्रा में आक्सीजन तत्व उपस्थित पाया जाता हैं|

  1. आक्सीजन की खोज प्रीस्तले नामक वैज्ञानिक ने की तथा यह पदार्थो को जलाने में सहायक हैं|इसलिए इसे पोषक गैस कहते हैं|

3.जबकि स्वयं ज्वलनशील गैस हाइड्रोजन को मानते हैं|

4.हाइड्रोजन को खोज कैवेंडिश ने की थी|तथा ज्वलनशील गैस कहा,हाइड्रोजन नाम लैवाशिये ने दिया|

5.मधुमक्खी पालन की क्रिया में शहद प्राप्त करते समय व्यक्ति अपने शरीरपर गंधक या सल्फर का लेप करता हैं|

6.प्रकृति में सर्वाधिक समस्थानिक पोलोनियम के 27 पाये जाते हैं|

हैलोजन परिवार के तत्व [7th-A (17)]

Z=9 -F

Z=17 -Cl

Z=35 -Br

Z=53 -I

Z=85 –At

1.फ़्लोरिन तत्व को कपटी तत्व या काला भेडिया भी कहा जाता है|क्योंकि इसकी विद्युत् ऋणता आवर्त सारणी में सर्वाधिक (4.0)पाई जाती हैं|

2.क्लोरिन गैस का उपयोग जल के शुद्धिकरण में तथा पुष्पों का रंग उड़ाने में किया जाता हैं|

3.आयोडीन तत्व वाष्पशील अधात्विक तत्व हैं|इस तत्व की सर्वाधिक मात्रा समुंद्री शैवाल (लैमिनेरिया) से प्राप्त होती हैं|

शून्य वर्ग के तत्व (18)-

Z=2 -He

Z=10 -Ne

Z=18 –Ar

Z=36 -Kr

Z=54 -Xe

Z=86 –Rn

1.वायुमंडल में केवल 5 अक्रीय गैस उपस्थित पाई जाती हैं|रेडान अनुपस्थित होती हैं|

2.रेडान का निर्माण कृत्रिम विधियों के द्वारा रेडियम तत्व से एल्फा कण के उत्सर्जन के द्वारा होता हैं|

3.वायुमंडल में सर्वाधिक मात्रा में अक्रीय गैसों में आर्गन (0.003%)पाई जाती हैं|

  1. अक्रीय गैसों में केवल वांडर वाल त्रिज्याएँ उपस्थित पाई जाती हैं|जिनका मान इनकी वास्तविक परमाण्विक त्रिज्या के बराबर पाया जाता हैं|
  2. केवल अक्रीय गैसे प्रकृति में एकल परमाण्विक अवस्था में पाई जाती हैं|क्योंकि इनका अष्टक पूर्ण पाया जाता हैं|जिसके कारण ये सर्वाधिक स्थाई होती हैं|

6.इनका आयनन विभव सर्वाधिक (हीलियम का सर्वाधिक)पाया जाता हैं|जबकि विद्युत् ऋणता,इलेक्ट्रोन बन्धुता व संयोजकता के मान शून्य पाये जाते हैं|

अक्रीय गैसों के उपयोग:-

  1. हीलियम के उपयोग-
  • वायुयान के टायरों में
  • गुब्बारों को भरने में
  • कृत्रिम श्वसन के दौरान (आक्सीजन 30%+हीलियम 20%)गैसों का मिश्रण काम में लिया जाता हैं|
  • इस मिश्रण में हीलियम गैस तनुकारी की तरह कार्य करती हैं|

 

2. नियाँन के उपयोग-

  • फ्लैश बल्बों व विज्ञापन बोर्डो में
  • वायुयानों को हवाई अड्डो पर उतरते समय होम सिग्नल के रूप में
  • समुंद्री जहाजो व पनडुब्बियो को होम सिग्नल देने हेतु फास्फींन गैस का उपयोग किया जाता हैं|
3.आर्गन के उपयोग-
  • विद्युत बल्बों में नाइट्रोजन व आर्गन का मिश्रण भरा होता हैं|
  • ट्यूबलाइटो में पारे की वाष्प व आर्गन का मिश्रण भरा होता हैं|
  1. जिनाँन के उपयोग-
  • इसको स्ट्रेंजर गैस के नाम से जाना जाता हैं|
  • यही एक ऐसी गैस है जो आक्सीजन व फ़्लोरिन तत्वों के साथ क्रिया करके योगिको का निर्माण करती हैं|अर्तात प्रकृति में सर्वाधिक योगिक अक्रीय गैसों में जिनाँन के ही पाये जाते हैं|
  • रेडान अक्रीय गैस रेडियो सक्रिय प्रकृति की पाई जाती हैं इसलिए इसका उपयोग चिकित्सालय में चिकित्सा कर्म में किया जाता हैं|

D खंड के तत्व :-

  • इस खंड में वे तत्व रखे गये है जिनका अंतिम इलेक्ट्रोन d उपकोश में प्रवेश करता हैं|
  • इस खंड में उपस्थित 40 तत्वों को 10 वर्गो तथा 4 आवर्तो में विभाजित किया गया हैं|
वर्ग →

आवर्त ↓

3rd B

(3)

4th B

(4)

5th B

(5)

6th B

(6)

7th B

(7)

8th

(8,9,10)

1st B

(11)

2nd

(12)

4 Sc 21 Ti 22 V 23 Cr 24 Mn 25 Fe26,Co27,Ni28 Cu 29 Zn 30
5 Y 39 Zr 40 Nd 41 Mo 42 Tc 43 Ru44,Rh45,Pd46 Ag 47 Cd 48
6 La 57 Hf 72 Ta 73 W 74 Re 75 Os76,Ir77,Pt78 Au 79 Hg 80
7 Ac 89 Unq 104 Unp 105 Unh 106 Uns 107 Uno108,Une109,Uun110 Uuu 111 Uub 112

नोट

  • सबसे भारी धातु आस्मियम इस श्रेणी में रखी गई है|जबकि सर्वाधिक गलनांक टंगस्टन (3400)का पाया जाता है|
  • प्रथम मानव निर्मित तत्व टेक्निशियम इस श्रेणी में पाया जाता हैं|
  • सर्वाधिक तनन सामर्थ्य गोल्ड की जो इस श्रेणी में पाया जाता हैं|
  • सर्वाधिक चालक धातु सिल्वर जो इस श्रेणी में पाया जाता हैं|
  • सर्वाधिक वैद्युत संयोजकता आस्मियम की +8 इस श्रेणी में पाया जाता हैं|
  • लैंथेनम व एक्टिनम इस श्रेणी में पाया जाता हैं|
  • जिंक,कैडमियम,पारा वाष्पशील धातुएं कहलाती है जो इस श्रेणी में पायी जाती हैं|
  • कॉपर,सिल्वर,गोल्ड जो सिक्का धातुएं कहलाती है इस श्रेणी में पायी जाती हैं|

संक्रमण तत्व:-

  • d खंड के तत्व जिनमे किसी भी अवस्था में(आद्य या आयनिक अवस्था ) d उपकोश अपूर्ण पाया जाता हैं संक्रमण तत्व कहलाते हैं|
  • अत: संक्रमण तत्वो की संख्या 36 मानी गई हैं|
  • जिंक(30),कैडमियम(48),पारा(80) व Uub(112)तत्वों को संक्रमण तत्व नही माना जाता हैं|
  • इस खंड के अधिकतर यौगिक युग्मित इलेक्ट्रोन की उपस्थिति के कारण रंगीन व अनुचुम्बकीय पाये जाते हैं|
  • परिवर्तनशील संयोजकता प्रदर्शित करना इस खंड के तत्वों का विशिष्ट गुण हैं|
  • इस खंड के अधिकतर तत्व द्रव व ठोस अवस्था में पाये जाते हैं|

F खंड के तत्व:-

  • इस खंड के अंतर्गत वे तत्व आते है जिनका अंतिम इलेक्ट्रान f उपकोश में प्रवेश करता हैं|
  • इस खंड के अंतर्गत कुल 28तत्व की दो श्रेणियां है जिन्हें लैंथेनाइड व एक्टिनाइड श्रेणी के नाम से जाना जाता हैं|

लैंथेनाइड श्रेणी [4f श्रेणी]

  • इस श्रेणी में सीरियम (58) से लेकर ल्युतेशियम (91) तक के 14 तत्व रखे गये हैं|
  • इस श्रेणी के सभी तत्वों को भारी धातुएं व दुर्लभ मृदा धातुएं कहा जाता हैं|

एक्टिनाइड श्रेणी[5f श्रेणी]

  • इस श्रेणी में थोरियम (90) से लारेंशियम(103) तक के 14 तत्व रखे गये हैं|इन्हें रेडियोसक्रिय तत्व कहा जाता हैं|
  • इस श्रेणी के तत्वों को आवर्त सारणी में अलग स्थान प्रदान किया गया हैं|
  • इस खंड के अधिकतर तत्व मिश्र धातुओं का निर्माण करते हैं|तथा इन मिश्र धातुओं को मिश धातु कहा जाता हैं|
  • इस खंड के अधिकतर तत्वों की आक्सीकरण अवस्था +3 पाई जाती हैं|
  • इस खंड के सभी तत्व ठोस अवस्था में पाये जाते हैं|

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

पदार्थ (Matter)

 

पदार्थ :

किसी भी वस्तु को पदार्थ कहने के लिए उसके अंतर्गत निम्न तीन गुण उपस्थित हिने चाहिए|

1.वस्तु का स्वयं का द्रव्यमान होना चाहिए|

2.वस्तु के द्वारा अन्तरिक्ष या आकाश में स्थान घेरना चाहिए|

3.यदि वस्तु की संरचना परिवर्तित करने का प्रयास किया जाए तो वह अपनी संरचना परिवर्तन का विरोध करती हो अर्थात वस्तु जडत्व का गुण रखती हो|

ब्रह्माण्ड में केवल दो चीजे उपस्थित पाई जाती है|

1.पदार्थ

2.ऊर्जा

पदार्थ का वर्गीकरण दो प्रकार से किया जाता है

1.भौतिक वर्गीकरण

2.रासायनिक वर्गीकरण

भौतिक वर्गीकरण अवस्थाओं के आधार पर किया जाता है जिसके आधार पर पदार्थ तीन प्रकार का होता है|

a.ठोस

b.द्रव

c.गैस

रासायनिक वर्गीकरण

1.शुद्ध  A. तत्व a.धातु  b.अधातु  c.उपधातु

B.यौगिक  a. कार्बनिक  b.अकार्बनिक

2.अशुद्ध (मिश्रण)-a. समांगी b.विषमांगी

पदार्थो को भौतिक अवस्थाओं के आधार पर सामान्यत:तीन भागों में विभाजित किया गया है|

1.ठोस पदार्थ-

वे पदार्थ जिनका आकार व आयतन दोनों निश्चित पाये जाते है ठोस कहलाते है पदार्थ की इस अवस्था में

a.अन्तरआणविक दूरी का मान न्यूनतम पाया जाता है

b.घनत्व का मान उच्चतम पाया जाता है

c.आयतन का मान न्यूनतम पाया जाता है

d.स्थायित्व अधिकतम पाया जाता है

e.आंतरिक ऊर्जा व क्रियाशीलता न्यूनतम पाई जाती है|

जैसे-पत्थर,कोयला,लकड़ी,चौक आदि|

2.द्रव पदार्थ-

वे पदार्थ जिनके आयतन निश्चित लेकिन आकार अनिश्चित पाए जाते है तथा द्रव पदार्थ जिस पात्र में डाले जाते है उसी का आकार ग्रहण कर लेते है|

जैसे-दूध,जल,वाष्पशील द्रव,केरोसिन,स्प्रिट आदि|

3.गैसीय पदार्थ-

वे पदार्थ जिनके आकार व आयतन दोनों अनिश्चित पाए जाते है अर्थात दोनों ही पात्र के आकार को ग्रहण कर लेते है|

पदार्थ की गैसीय अवस्था में –

अंतरआणविक दूरी का मान अधिकतम पाया जाता है

a.आयतन का मान अधिकतम

b.घनत्व का मान न्यूनतम

c.स्थायित्व का मान न्यूनतम

d.क्रिया शीलता का मान उच्चतम

नोट

पदार्थ की अवस्थाएं एक दूसरे में परिवर्तित हो सकती है तथा अवस्था परिवर्तन के लिए केवल दो भौतिक राशियों ताप व दाब में परिवर्तन किया जा सकता है|

जैसे- Solid →Liquid →Gas

Ice → Water →Gas (P↓ T↑)

Solid ← liquid ← Gas

Ice ←Water ←Gas (P↑T↓)

पदार्थ का रासायनिक वर्गीकरण:-

क्वार्क कण → मौलिक कण →परमाणु → अणु →पदार्थ

प्रकृति में कुल 115 तत्व पाये जाते है जिन्हें अवस्थाओं के आधार पर तीन भागों में वर्गीकृत कर सकते हैं|

1.गैसीय तत्व-

इनकी संख्या 11 पाई जाती है|

He,Ne,Ar,Kr,Xe,Rn,F,O,N,Cl,H

2.द्रव तत्व –

इनकी संख्या 5 पाई जाती है जिनमे से 4 धातु व 1 अधातु है|

Cs ,Fr,Ga,Hg(धातु) ,Br(अधातु)

3.ठोस तत्व-

इनकी संख्या 99 मानी गई हैं|गैसीय तथा द्रव तत्वों को छोडकर शेष सभी तत्व ठोस अवस्था में पाए जाते है|

तत्वों को प्राप्ति स्रोत के आधार दो भागों में बांटा गया है|

1.प्राकृतिक तत्व –इनकी संख्या 92 मानी गई है|

2.कृत्रिम तत्व-इनकी संख्या 23 मानी गई है इनका निर्माण तत्वांतरण विधि के द्वारा किया गया है प्रथम मानव निर्मित तत्व टेक्निशियम (Tc)था|

सर्वप्रथम तत्वों का वर्गीकरण लेवोशियर वैज्ञानिक ने किया तथा दो भागों में विभाजित किया

a.धातु

b. अधातु

रसायन विज्ञान का जनक इन्ही को माना जाता है|

तत्वों को वर्गीकृत करके व्यवस्थित रूप प्रदान करने का प्रयास निम्न वैज्ञानिकों ने किया|

1.प्राउट की संकल्पना(1815)-

इनके अनुसार सभी तत्वों का निर्माण हाइड्रोजन परमाणुओं से मिलकर होता है|अर्थात तत्वों का भार हाइड्रोजन परमाणु के भार का पूर्ण गुणज पाया जाता हैं|

तत्व का भार = n x हाइड्रोजन परमाणु का भार (n=1,2,3____)

2.डोरबिनर का त्रिक नियम(1824)-

इन्होनें समान गुण वाले तत्वों को तीन-तीन के समूहों में व्यवस्थित किया|जिन्हें त्रिक कहा गया|इन्होनें केवल तीन त्रिको का निर्माण किया|जबकि इनके समय में कुल 6 ट्रिक पाये जाते थे|

1.Li ,Na ,K

2.Ca ,Sr ,Ba

3.Cl,Br,I

4.P ,As,Sb

5.S ,Se ,Te

6.Fe,Co ,Ni

3.न्यूलैंड का अष्टक नियम(1829)-

यह संगीत के सात स्वरों पर आधारित था|इस नियमानुसार यदि तत्वों को बढ़ते हुए परमाणु भार के आधार पर व्यवस्थित किया जाए तो आने वाले हर आठवे तत्व के गुणधर्म प्रथम तत्व के समान पाए जाते है इन्होने केवल इस आधार पर 16 तत्वों को व्यवस्थित किया|

Li,Be,B,C,N,O,F

Na,Mg,Al,Si,P,S,Cl

K,Ca

  1. लोथर मेयर का आयतन वक्र(1864)-

इन्होने परमाणु आयतन तथा घनत्व के मध्य एक वक्र स्थापित किया जिसे आयतन वक्र कहा गया तथा उसके आधार पर तत्वों को वर्गीकृत किया|

  1. इनके अनुसार वक्र के शीर्ष पर क्षारीय धातुएं पाई जाती है|
  2. वक्र के अवरोही स्थान पर क्षारीय मृदा धातुएं पाई जाती हैं|

c.वक्र के आरोही स्थान पर हैलोजन तत्व उपस्थित होते है|

d.वक्र के पैंदे में उपधातुए व संक्रमण धातुएं उपस्थित होती है|

5.मैंडलीफ की आवर्त सारणी/वर्गीकरण (1869)-

इन्होने उस समय तक ज्ञात सभी तत्वों को (64/63)वर्गीकृत करके आवर्त सारणी के रूप में व्यवस्थित करने का प्रयास किया|अर्थात प्रथम सफल वर्गीकरण का श्रेय मैंडलीफ को दिया गया|अत:आवर्त सारणी के जनक इन्ही को माना जाता हैं|

इनकी आवर्त सारणी परमाणु भार आधारित थी|

मैंडलीफ की आवर्त सारणी में कुछ उर्ध्वाधर खाने बनाए गये जिन्हें वर्ग कहा गया |इनकी संख्या 9 मानी गई|तथा कुछ क्षेतिज खाने बनाए गये जिन्हें आवर्त कहा गया|इनकी संख्या 7 मानी गई|

नोट:

मैंडलीफ की मूल आवर्त सारणी में 8 वर्ग उपस्थित थे जबकि शून्य वर्ग को रैम्जे ने 1864 में जोड़ा|

मैंडलीफ का आवर्त नियम:-

इनके अनुसार तत्वों के भौतिक व रासायनिक गुणधर्म परमाणु भार के बढ़ते हुए क्रम में व्यवस्थित किये जाए तो एक निश्चित अंतराल पश्चात समान गुण वाले तत्वों की पुनरावृति होती है इसे मैंडलीफ का आवर्त नियम कहा जाता है|

विशेषताएं-

1.तत्वों का प्रथम सफल वर्गीकरण प्रतिपादित किया|

2.सभी वर्गो को दो उपवर्गों में A &B में विभाजित किया|

नोट

8thवर्ग व शून्य वर्ग को विभाजित नही किया गया|

3.एक वर्ग में उपस्थित सभी तत्वों के गुणधर्म समान पाए जाते है

4.Fe,Co,Ni तीनो तत्वों को जुड़वां तत्व व Cu,Ag,Au को सिक्का धातुएं तथा  Zn,Cd,Hg को वाष्पशील धातुएं कहा गया|

कमियाँ-

1.समस्थानिको को इनकी आवर्त सारणी में समान स्थान प्रदान किया गया |जबकि इनके अनुसार समस्थानिको को अलग-अलग स्थान प्रदान किया जाना चाहिए|

2.हाइड्रोजनतत्व की स्थिति को निश्चित नहीं किया गया|

नोट-हाइड्रोजन को 1A वर्ग में क्षारीय धातुओं के साथ रखा गया है|लेकिन 1A,4 A(कार्बन परिवार)व 7 A (हैलोजन परिवार) के साथ रखा जा सकता है|

3.तत्वों के परमाणु भारो की आवर्तिता में नियमितता नही पाई गई|

जैसे- Arके पश्चात K तत्व आता है लेकिन परमाणु भार Ar का अधिक पाया जाता हैं|

 

 

 

 

 

गुरुत्वाकर्षण बल

पृथ्वी पर सामान्यत: 4 मूल बल पाये जाते हैं|

1.गुरुत्वाकर्षण बल
2.स्थिर वैद्युत आकर्षण बल
3.नाभिकीय आकर्षण बल
4. चुम्बकीय आकर्षण बल

उपरोक्त चारों मूल बलों में से सबसे प्रबल नाभिकीय बल को जबकि सबसे दुर्बल गुरुत्वाकर्षण बल को माना जाता है|

गुरुत्वाकर्षण बल आरोपित होने के लिए न्यूनतम दो पिंडो की आवश्यकता होती है|

  • किन्ही दो असमान/समान द्रव्यमान वाले पिंडो के मध्य लगने वाले बल को गुरुत्वाकर्षण बल कहा जाता है|

इस बल का मान दोनों पिंडो के द्रव्यमानो के गुणनफल के समानुपाती व बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती पाया जाता हैं|

Fg=G m1m2/r2

नोट:

किसी एकल पिंड पर पृथ्वी के द्वारा आरोपित गुरुत्वाकर्षण बल का मान उस पिंड के भार के समान पाया जाता है

गुरुत्त्वीय त्वरण:

mg=GMm/ r2g=GM/ r2

  • पृथ्वी की सतह से h ऊचाई गुरुत्वीय त्वरण का मान कम हो जाता हैं|

g=GM/(r+h)2

  • पृथ्वी की सतह से अंदर की ओर जाने पर गुरुत्वीय त्वरण का मान कम होता जाता है क्योकिं पृथ्वी की त्रिज्या का मान हमेशा नियत रहता है जबकि सतहसे गहराई की ओर जाने पर पिंड की सतह से दूरी का मान बढ़ता जाता हैं|

g=GM/(r+d)2

  • गुरुत्वीय त्वरण का मान पृथ्वी की सतह पर भूमध्य रेखा पर न्यूनतम व ध्रुवो पर अधिकतम पाया जाता हैं|क्योकि केंद्र से भूमध्य रेखा के मध्य की दूरी का मान अधिकतम जबकि केंद्र से ध्रुवो के मध्य की दूरी का मान भूमध्य रेखा की तुलना में कम पाया जाता हैं|
  • यदि कोई पिंड निर्वात के अंतर्गत गतिशील होता है तो वहां पर गुरुत्वाकर्षण बल का मान शून्य पाया जाता है|
  • यदि दी भिन्न भिन्न द्रव्यमान वाले पिंड निर्वात के अंतर्गत समान ऊँचाई से छोड़े जाए तो पृथ्वी की सतह तक पहुंचने में दोनों को समान समय लगेगा|
  • जबकि वायुमंडल की उपस्थिति में अधिक द्रव्यमान वाले पिंड पर गुरुत्वाकर्षण बल का मान अधिक हिने के कारण पृथ्वी की सत पर पहले पहुंचेगा|अर्थात अल्प समय लगेगा|

नोट:

  • पृथ्वी के गुरुत्वीय त्वरण का मान अधिकतम सतह पर पाया जाता है|सतह से ऊपर या नीचे जाने पर कम होता जाता हैं|

 

सरल लोलक

  • सरल लोलक

एक दृढ आधार से डोरी के माध्यम से बंधे हुए पिंड को सरल लोलक कहा जाता हैं|

आवर्तकाल (T):

सरल लोलक के द्वारा एक चक्कर पूर्ण करने में लिया गया समय अंतराल आवर्तकाल कहलाता हैं|

आवर्तकाल =1/आवृति(n)

मात्रक=सैकिंड/मिनट/घंटा

सरल लोलक का आवर्तकाल रस्सी की लम्बाई,गुरुत्त्वीय त्वरण तथा ताप आदि कर मान पर निर्भर करता है|

  1. यदि सरल लोलक तथा इस पर आधारित युक्तियों को ऊँचाई या गहराई पर ले जाया जाए तो गुरुत्त्वीय त्वरण का मान कम हो जाता है अर्थात आवर्तकाल बढ़ जाता है|
  2. सामान्यत गर्मी के दिनों में रस्सी की लम्बाई बढ़ जाती हैं अर्थात आवर्तकाल का मान बढ़ जाता है|जबकि सर्दी के दिनों में रस्सी की लम्बाई घट जाती है इसलिए आवर्तकाल का मान कम हो जाता है|
  3. यदि सरल लोलक या इस पर आधरित युक्तियों को कृत्रिम उपग्रह या अन्तरिक्ष में ले जाया जाए तथा गुरुत्त्वीय त्वरण का मान शून्य हो जाए तो आवर्तकाल का मान अनंत हो जाता हैं|अत:सरल लोलक व इस पर आधारित युक्तियाँ यहाँ पर गतिशील नही होती हैं|
  4. झुला झूलते समय एक व्यक्ति के पास दूसरा व्यक्ति आकर बैठ जाए तो झूले की गति या आवर्तकाल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है जबकि झूला झूलने वाला व्यक्ति अचानक खड़ा हो जाए तो लम्बाई कम होने के कारण आवर्तकाल का मान कम हो जाता है तथा झूला तीव्र गति से चलने लगता हैं|
  5. आवृति-सरल लोलक द्वारा 1 सेकिंड में लगाए गए चक्करों की संख्या आवृति कहलाती हैं|

n=1/T sec-1,Hz ,साइकिल/सेकण्ड

 स्प्रिंग लोलक: 

  • स्प्रिंग लोलक का आवर्तकाल सामान्यत पिंड के पदार्थ की प्रकृति,स्प्रिंग के पदार्थ की प्रकृति ,स्प्रिंग नियतांक तथा पिंड के द्रव्यमान पर निर्भर करता है|
  • द्रव्यमान के साथ परिवर्तन-स्प्रिंग लोलक का आवर्तकाल पिंड के द्रव्यमान के वर्गमूल के समानुपाती पाया जाता है|
  • स्प्रिंग नियतांक के साथ परिवर्तन-आवर्तकाल का मान स्प्रिंग नियतांक के वर्गमूल के व्युत्क्रमानुपाती पाया जाता हैं|
  • पदार्थ की प्रकृति के साथ परिवर्तन-भिन्न-2 पदार्थो से बनी हुई स्प्रिंग के स्प्रिंग नियतांक अलग-2 पाये जाते है इसलिए आवर्तकाल भी अलग-2 होता हैं|

स्प्रिंग संयोजन तथा स्प्रिंग नियतांक:-

यदि स्प्रिंगो को श्रेनी क्रम  में संयोजित कर दिया जाए तो

1/k=1/k1+1/k2

k1=k1k2/k1+k2

समांतर क्रम संयोजन –

k1= k1+k2

नोट:-

1.सरल आवर्त गति में जब पिंड माध्य स्थिति से गुजरता है तो पिंड का वेग अधिकतम पाया जाता है अर्थात गतिज ऊर्जा का मान अधिकतम होता है|

2.पिंड पर लगने वाले प्रत्यानयन बल का मान शून्य पाया जाता है अर्थात पिंड के त्वरण का मान शून्य पाया जाता है अर्थात स्थितिज ऊर्जा का मान न्यूनतम प्राप्त होता हैं|

3.जब पिंड उच्चतम बिंदु पर पाया जाता है तो स्थितिज ऊर्जा का मान अधिकतम व गतिज ऊर्जा का मान न्यूनतम पाया जाता हैं|साथ ही पिंड पर लगने वाले प्रत्यानयन बल,त्वरण का मान अधिकतम प्राप्त होता है और पिंड का वेग न्यूनतम प्राप्त होता है|

सरल आवर्त गति में –

1.विस्थापन –जब पिंड माध्य स्थिति पर होता है तब शून्य होता है और उच्चतम स्थिति पर पिंड के उपस्थित होने पर विस्थापन का मान अधिकतम व आयाम के बराबर पाया जाता है|

2.वेग –ज्यावक्रीय फलन/कोणीय विस्थापन में परिवर्तन की दर वेग कहलाती है|

3.त्वरण-वेग में परिवर्तन की दर को त्वरण कहा जाता हैं|

4.  ऊर्जा पिंड की गतिज ऊर्जा K.E.= ½ mv2

स्थितिज ऊर्जा P.E.=किसी पिंड की स्थिति के कारण उत्पन्न कार्य करने की क्षमता स्थितिज ऊर्जा कहलाती हैं|

P.E.= mgh

नोट:-

स्प्रिंग में संकुचन के दौरान संचित स्थितिज ऊर्जा को ज्ञात करने के लिए सामान्यत:       1/2 k(A2Y2) सूत्र का उपयोग किया जाता है|

5.प्रत्यानयन बल-पिंड की गति के दौरान पिंड पर माध्य स्थिति की ओर आरोपित होने वाला बल प्रत्यानयन बल कहलाता हैं|

इस बल का मान पिंड के विस्थापन के समानुपाती व दिशा विपरीत पाई जाती हैं|

F=-ky

 

 

 

 

 

 

बल और ऊर्जा (Force and Energy)

बल:-

वह भौतिक राशि जो किसी पिंड या वस्तु की स्थिति को परिवर्तित कर देती हो या परिवर्तित करने का प्रयास करती हो बल कहलाती है|

बल को न्यूटन की गति के प्रथम नियमानुसार परिभाषित किया जाता है|जबकि बल का संख्यात्मक मान न्यूटन की गति के द्वितीय नियम के द्वारा प्राप्त होता है|

F= m X a

बल एक सदिश राशि है|जिसकी दिशा त्वरण या मन्दन की दिशा में पाई जाती हैं|

मात्रक =K.g x मीटर/सेकण्ड2= न्यूटन ,विमा =M1L1T-2

1 न्यूटन = 105 डाईन

  • अभिकेन्द्रीय बल: जब कोई पिंड या वस्तु किसी वृत्ताकार पथ में गतिशील होता है तो पिंड पर केंद्र की ओर लगने वाले बल को अभिकेन्द्रीय बल कहते है|

  • वृत्ताकार पथ में गति के लिए अभिकेन्द्रीय बल जिम्मेदार होता है इसका मान

F=mv2/r ,F=m X(v2/r)

जैसे -1.धागे में बंधे हुए पत्थर की गति में अभिकेन्द्रीय बल का मान धागे के तनाव बल के समान पाया जाता है|

2.परमाणु के अंदर इलेक्ट्रान की कक्षाओं में गति:

इसमें स्थिर वैधुत आकर्षण बल (ze2/r2)अभिकेन्द्रीय बल के बराबर पाया जाता है|

अपकेन्द्रीय बल:किसी पिंड या वस्तु की वृत्ताकार पथ में गति के दौरान पिंड पर बाहर की ओर आरोपित होने वाले बल को अपकेन्द्रिय बल कहा जाता है|

किसी पिंड की रेखीय गति के लिए अपकेन्द्रिय बल जिम्मेदार होता है|इसका मान F= mv2/r के बराबर पाया जाता है|

अपकेन्द्रिय बल,अभिकेन्द्रीय बल के समान पाए जाते है लेकिन दिशा में विपरीत होते है|

  • नोट:-1.यदि अपकेन्द्रिय बल का मान अभिकेन्द्रीय बल से अधिक पाया जाता है तो पिंड या वस्तु वृत्ताकार पथ को छोडकर रेखिक गति करने लगती है|

2.यदि अभिकेन्द्रीय बल का मान अपकेन्द्रिय बल से अधिक पाया जाता है तो पिंड का वृत्ताकार पथ धीरे-धीरे कम हो जाता है तथा अंतत:पिंड केंद्र में गिर जाता है|

3.किसी पिंड को निश्चित वृत्ताकार पथ में गति के लिए अभिकेन्द्रीय बल का मान,अपकेन्द्रिय बल के बराबर होना चाहिए|

अपकेन्द्रिय बल पर आधारित घटनाये:

1.मलाई निकालने वाली मशीन में क्रीम का निकालना

2.वाशिंग मशीन के द्वारा कपड़ो की धुलाई

घर्षण बल:-

सामान्यता:गति की अवस्था में दोनों विपरीत दिशा में गतिशील सतहों के मध्य गति के विपरीत दिशा में एक बल आरोपित होता है जो गति का विरोध करता है घर्षण बल कहलाता हैं|

घर्षण बल का मान सम्पर्क में आने वाली सतहों के क्षेत्रफल पर निर्भर नही करता है लेकिन सतह की प्रकृति पर निर्भर करता है|

खुरदरी सतह के लिए घर्षण बल का मान अधिक पाया जाता है जबकि चिकनी सतह के लिए घर्षण बल का मान कम पाया जाता है|

सामान्यत घर्षण बल तीन प्रकार के पाये जाते है:-

1.स्थैतिक घर्षण बल :-

पिंड या वस्तु की स्थिर अवस्था में लगने वाले बल के मान को स्थैतिक घर्षण बल कहा जाता है इसका मान उच्चतम पाया जाता है|

2.गतिक घर्षण (सर्पी)बल:-

पिंड या वस्तु की गति के लिए तैयार अवस्था में पाया जाता है इस अवस्था में लगने वाले बक को गतिक घर्षण बल कहते है|

3.लोटनी घर्षण बल :-

पिंड के गतिशील होने पर विपरीत दिशा में लगने वाले बल को लोटनी घर्षण बल कहा जाता है|

पिंड या वस्तु की स्थिर अवस्था में आरोपित बल की तुलना में घर्षण बल का मान अधिक पाया जाता है|

गतिक या सर्पी अवस्था में पिंड पर आरोपित बल का मान घर्षण बल के समान पाया जाता है|तथा इसे साम्यावस्था की स्थिति कहते है|

लोटनी गति की अवस्था में आरोपित बल का मान घर्षण बल की तुलना में अधिक पाया जाता है|

Fs>Fk>Fr

यांत्रिक उर्जाएं:-

ये सामान्यत:दो प्रकार की पाई जाती है

1.गतिज ऊर्जा (K.E)-

पिंड की गति के कारण पाई जाने वाली कार्य करने की क्षमता को गतिज ऊर्जा कहा जाता हैं|

K.E =1/2 mv2                              (p=m X v)

K.E =m2v2/2m

K.E=p2/2m

2.स्थितिज ऊर्जा(P.E.):-

पिंड या वस्तु की स्थिति के कारण उत्पन्न होने वाली कार्य करने की क्षमता को स्थितिज ऊर्जा कहा जाता है|

P.E.=mgh स्थिति मे परिवर्तन (ऊचाई)

ऊर्जा संरक्षण के नियमानुसार ना तो ऊर्जा को उत्पन्न किया जा सकता है और ना ही नष्ट किया जा सकता है अर्थात एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित किया जा सकता है |

अत:किसी भी पिंड या वस्तु की ऊर्जा का मान हमेशा नियत पाया जाता है|

यंत्र               ऊर्जा रूपान्तरण

डायनेमो (जनित्र)    यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में

विद्युत् मोटर        विद्युत् ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में

माइक्रोफोन         ध्वनि ऊर्जा को विद्युत् ऊर्जा में

सैल               रासायनिक ऊर्जा को विद्युत् ऊर्जा में

सोलर सैल          प्रकाश ऊर्जा को विद्युत् ऊर्जा में

मोमबत्ती            रासायनिक ऊर्जा को प्रकाश ऊर्जा में

विद्युत् बल्ब/ट्यूबलाईट विद्युत् ऊर्जा को प्रकाश ऊर्जा में

गति ,कार्य एवं ऊर्जा (Motion,Work and Energy)

गति

  • दूरी-किसी भी वस्तु या पिंड के द्वारा तय किये गये पथ या मार्ग की लम्बाई दूरी कहलाती हैं|
  • दूरी एक अदिश राशि हैं|
  • इसका मान हमेशा धनात्मक पाया जाता हैं|
  • दूरी के मात्रक:-C.G.S-सेमी.,M.K.S.-मीटर, F.P.S.-फुट ,S.I.-मीटर ,विमा-M0L1T0

2.विस्थापन:-

किसी वस्तु या पिंड के द्वारा निश्चित दिशा में तय की गये पथ की लम्बाई विस्थापन कहलाती है|अर्थात किसी पिंड या वस्तु के द्वारा तय किए गये पथ में प्रारम्भिक व अंतिम बिन्दुओं के मध्य की सीधी व न्यूनतम दूरी विस्थापन कहलाती हैं|

-इसके मात्रक दूरी के समान होते है|

-विस्थापन का मान धनात्मक,ऋणात्मक व शून्य सम्भव हैं|क्योकि विस्थापन एक सदिश राशि हैं|

वेग व चाल:-

1.चाल:-दूरी में परिवर्तन की दर चाल कहलाती हैं|अर्थात एकांक समय में किसी पिंड के द्वारा पथ पर तय की गई लम्बाई के मान को चाल कहते हैं|

चाल=दूरी/समय ,U=d/t मीटर/सेकण्ड

-यह एक अदिश राशि हैं|अर्थात चाल का मान हमेशा धनात्मक पाया जाता हैं|

2.विस्थापन में परिवर्तन की दर वेग कहलाती हैं|अर्थात किसी पिंड के द्वारा एकांक समय में पथ पर निश्चित दिशा में तय की गई दूरी वेग कहलाती हैं|

V=ds/dt मीटर/सेकण्ड

विमा-M0L1T-1

-वेग एक सदिश राशि हैं|अर्थात इसके मान धनात्मक,ऋणात्मक व शून्य सम्भव हैं|

त्वरण:-

वेग में परिवर्तन की दर को त्वरण कहा जाता हैं|अर्थात किसी पिंड या वस्तु के वेग में इकाई समय में जितना परिवर्तन होता हैं उसे त्वरण कहते हैं|

ऋणात्मक त्वरण को मन्दं कहा जाता हैं,तथा मन्दं हमेशा गति के विपरीत दिशा में लगता हैं|

a=dv/dt ,a=v2-v1/t2-t1 ,मात्रक =मीटर प्रति सेकण्ड2

त्वरण एक सदिश राशि हैं|

विमा-M0L1T-2

संवेग व आवेग:-

संवेग (p)-किसी पिंड या वस्तु के द्रव्यमान तथा वेग के गुणनफल को संवेग कहा जाता हैं|

P=m X v ,मात्रक=K.g.m/sec. ,विमा=M1L1T-1

सवेग की दिशा वेग की दिशा में पाई जाती हैं|संवेग एक सदिश राशि हैं|

सवेग संरक्षण का नियम/सिद्धांत:-

इस सिद्धांत के अनुसार जब किसी पिंडो के समूह पर बाह्य आरोपित बल का मान शून्य पाया जाता है तो समूह में उपस्थित सभी पिंडो के संवेगों का बीजगणितीय योग शून्य पाया जाता हैं|इसे रेखीय संवेग संरक्षण का सिद्धांत कहते हैं|अर्थात

P1+P2+P3+—–=0

जैसे-राकेट या जेट विमानों की गति|

आवेग (J):-

जब किसी पिंड या वस्तु पर उच्च मान का बल अल्प समय के लिए आरोपित किया जाता हैं तो दोनों के गुणनफल को आवेग कहा जाता हैं|

J=F.dt

आवेग की दिशा सदैव बल की दिशा में पाई जाती हैं|

मात्रक =K.gm/sec. ,विमा = M1L1T-1

आवेग एक सदिश राशि हैं|

न्यूटन की गति के द्वितीय नियम के अनुसार किसी पिंड पर आरोपित आवेग का मान उस पिंड के संवेग में परिवर्तन के बराबर पाया जाता हैं|

P2-P1=F.dt, Fdp/dt,  F.dt= P2-P1

 

सरल आवर्त गति:

1.दोलनी गति:किसी पिंड या कण की किसी निश्चित बिंदु के इर्द-गिर्द गति को दोलनी गति कहते हैं|

2.सरल आवर्त गति:किसी पिंड या कण की किसी बिंदु के इर्द-गिर्द निश्चित रेखीय पथ में गति

3.आवर्ती गति:किसी पिंड या कण की किसी बिंदु के सापेक्ष गति जिसमे कण या पिंड निश्चित समय अंतराल पश्चात अपनी गति दोहराता है|जैसे- चन्द्रमा,तारो की गति|

न्यूटन के गति के नियम:-

1687 में न्यूटन नामक वैज्ञानिक ने पिंडो की गति को समझाने के लिए सामान्यत तीन नियम प्रतिपादित किए,जिन्हें न्यूटन की गति के नियम कहा गया|इन नियमो को न्यूटन ने 1687 में अपनी पुस्तक `प्रिंसिपिया’ में प्रतिपादित किया|

गति का प्रथम नियम-

इसे जडत्व या गैलीलियों का नियम भी कहा जाता है|इस नियम को गैलिलियो ने प्रतिपादित किया था|इस नियम के द्वारा बल को परिभाषित किया जाता है|

जडत्व-किसी भी वस्तु के द्वारा अपनी संरचना परिवर्तन के विरोध करने को उस वस्तु का जडत्व कहा जाता है|जडत्व का संख्यात्मक मान द्रव्यमान को मानते है|

अत:न्यूटन की गति के प्रथम नियम द्वारा बल एवं जडत्व दोनों को परिभाषित किया जाता हैं|

इस नियम के द्वारा कोई भी वस्तु जिस अवस्था में है उसी अवस्था में तब तक पाई जाती है जब क उस पर कोई बाह्य बल आरोपित न किया जाए |इसे न्यूटन की गति का प्रथम नियम कहा जाता है| जैसे:-एक गतिशील मोटर साइकिल पर ब्रेक लगाने से पीछे बैठे हुए व्यक्ति का अचानक आगे की ओर झुक जाना|, खड़ी हुई बाईक को अचानक चलाने पर पीछे बैठे हुए व्यक्ति का पीछे की ओर झुक जाना|मिट्टी युक्त कम्बल को अचानक झटकने से मिट्टी के कणों का कम्बल से अलग हो जाना|

न्यूटन की गति का द्वितीय नियम:-

द्वितीय व तृतीय नियम का प्रतिपादन न्यूटन ने किया|इस विषय के अनुसार किसी वस्तु या पिंड पर आरोपित बाह्य बल का मान उस पिंड के संवेग में परिवर्तन की दर के समानुपाती पाया जाता हैं|

इस नियमानुसार बल का संख्यात्मक मान प्राप्त होगा|

F  dp /dt ,F= k dp/dt ,k= बल नियतांक

F= dp/dt  (dp =m.dv)

F=m.dv/dt (dv/dt=a)

F= m.a

न्यूटन की गति का तृतीय नियम:-

  • इसे क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम भी कहा जाता है|क्रिया व प्रतिक्रिया बल दो अलग अलग वस्तुओं या पिंडो पर लागू होते है|
  • क्रिया व प्रतिक्रिया बल के मान समान पाए जाते है|लेकिन दोनों की दिशा एक-दूसरे के विपरीत होती है|
  • प्रतिक्रिया बल का मान पिंड के हमेशा लम्बवत दिशा में लागू होता है|
  • जैसे-मनुष्य की गति,घोड़ों के द्वारा घोड़ा गाडी को खेचना,समुन्द्र के किनारे पर नाविक के द्वारा नाव से उतरते समय नाव को समुन्द्र की तरफ धक्का देना,जल में नाव की गति|

कार्य एवं ऊर्जा:-

-किसी भी पिंड पर आरोपित किए गए बल तथा पिंड के बल की दिशा में विस्थापन घटक के गुणनफल को कार्य कहा जाता है|

W=F .S cos

कार्य एक प्रकार की अदिश राशि है|अर्थात इसका मान पिंड के द्वारा तय किए गए मार्ग पर निर्भर करता है|इसलिए इसे पथ फलं भी कहा जाता है|

-संरक्षी बल क्षेत्रो में किया गया कार्य सदिश जबकि असंरक्षी बल क्षेत्रो में किया गया कार्य अदिश होता है|

कार्य को जूल में मापा जाता हैं|

अन्य मात्रक –Jule=N x M,Jule= W x Sec. ,1 Jule = 107 अर्ग ,1 अर्ग = 10-7 jule

जैसे- कुली के द्वारा किसी भी प्रकार के सामान को सिर पर रखकर खड़े रहना=शून्य कार्य

-दीवार पर बल आरोपित करना = शून्य कार्य

–किसी भी पिंड की गति के लिए खीचने की तुलना में धक्का लगाना आसान हैं|

ऊर्जा:-

कार्य करने की क्षमता को ऊर्जा कहा जाता है|

सामान्यत: ऊर्जा को कार्य के समान जूल में मापा जाता है|लेकिन खाद्य ऊर्जा को हमेशा कैलोरी में मापा जाता है|जबकि विद्युत ऊर्जा को KWH(यूनिट)में मापा जाता है|

ऊर्जा एक अदिश राशि है|

लिफ्ट:-

1.गुरुत्वाकर्षण बल की दिशा हमेशा पृथ्वी के केंद्र की ओर पाई जाती है|

2.लिफ्ट की गति में पिंड पर लगने वाला छद्म आभासी बल गति के विपरीत दिशा में पाया जाता है|

स्थिति 1. a त्वरण से लिफ्ट यदि ऊपर की तरफ गतिशील होती है तो-

व्यक्ति का वास्तविक भार =mg

व्यक्ति का भार w1=mg +ma =m(g+a)

अर्थात लिफ्ट में ऊपर की तरफ जाने पर व्यक्ति का भार बढा हुआ महसूस होगा|

स्थिति 2. a त्वरण से लिफ्ट नीचे की ओर गतिशील हो तो-

व्यक्ति का भार w1=mg-ma

w1=m(g-a)

अर्थात लिफ्ट में नीचे की तरफ गति करने पर व्यक्ति का भार घटा हुआ महसूस होगा|

स्थिति 3. यदि लिफ्ट अचानक टूट जाए या g त्वरण से लिफ्ट नीचे की ओर गतिशील हो तो-

w1=mg-mg

w1= 0

अर्थात भारहीनता की अवस्था होगी|

वृतीय गति:-

किसी पिंड की एक वृत्ताकार पथ के अनुदिश गति को वृत्तिय गति कहा जाता है|

वृतीय गति में केंद्र से दूरी का मान हमेशा नियत पाया जाता है लेकिन कोणीय विस्थापन  परिवर्तित होता रहता है|

जैसे- सर्कस में मोटरगाडियों की मौत के कुँए के दौरान गति,डोरी के सिरों पर पत्थर बांधकर वृत्ताकार पथ में गति,पुली या घिरनी के सिरे पर उपस्थित पिंड की गति|

कोणीय वेग:-

कोणीय विस्थापन में परिवर्तन की दर को कोणीय वेग कहा जाता है|
=w /t रेडियन/सेकण्ड

कोणीय त्वरण:-कोणीय वेग में परिवर्तन की दर को कोणीय त्वरण कहा जाता है|
= w /t रेडियन/सेकण्ड2

नोट-रेखीय वेग व कोणीय वेग में सम्बन्ध: V= w X r

 

प्रकाश (LIGHT)

प्रकाश

प्रकाश एक प्रकार की ऊर्जा है,प्रकाश की प्रकृति द्वैत पाई जाती है|अर्थात प्रकाश तरंग व कण दोनों की तरह व्यवहार करता हैं|

नोट-प्रकाश की तरंग प्रकृति की व्याख्या हाइमन व हाइजेनबर्ग के द्वारा की गई|जबकि प्रकाश की कणीय प्रकृति की व्याख्या न्यूटन द्वारा की गई|

  • प्रकाश एक सीधी सरल रेखा में संचरित होता है|
  • प्रकाश एक प्रकार की अनुप्रस्थ यांत्रिक तरंगे है|
  • सूर्य का दृश्य प्रकाश सात रंगो से मिलकर बना होता हैयह सर्वप्रथम न्यूटन नामक वैज्ञानिक ने बताया|

नोट:-उष्मा का संचरण पदार्थ की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में भिन्न-भिन्न विधियों द्वारा होता है|

  1. ठोस पदार्थ-चालन विधि द्वारा
  2. द्रव पदार्थ –संवहन विधि द्वारा
  3. गैसीय पदार्थ-विकिरण विधि द्वारा

सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक विकिरणों के द्वारा लगभग 8 मिनट 20 सेकण्ड में पहुंचता है|जबकि सूर्य का प्रकाश चन्द्रमा से परावर्तित होकर पृथ्वी तक विकिरण विधियों द्वारा आने में 1.28 सेकण्ड का समय लेता है|

प्रकाश का सर्वाधिक वेग निर्वात में 3×108m/sec. पाया जाता हैं|क्योंकि निर्वात का अपवर्तनांक न्यूनतम व एक पाया जाता हैं|

प्रकाश का फोटोन सिद्धांत मैक्स प्लांक नामक वैज्ञानिक ने प्रतिपादित किया इनके अनुसार प्रकाश ऊर्जा के छोटे-चौटे बंडलों के रूप में संचरित होता हैं,जिन्हें क्वांटा कहा जाता हैं|तथा दृश्य प्रकाश के क्वांटा को फोटोन कहा जाता हैं|

प्रत्येक क्वांटा की ऊर्जा निश्चित पाई जाती है|जिसका मान क्वांटा की तरंगदैर्ध्य के व्युत्क्रमानुपाती होता हैं|

E= ,E=h ,  c /

=hc/  ,E=hc /   {h=6.62×10-34 ,E=12400/A˚}

प्रकाश की तरंग सिद्धांत से सम्बन्धित घटनाएं

  1. प्रकाश का परावर्तन
  2. प्रकाश का अपवर्तन
  3. प्रकाश का पूर्ण आंतरिक परावर्तन
  4. प्रकाश का वर्ण विक्षेपण
  5. प्रकाश का व्यतिकरण
  6. प्रकाश का विवर्तन
  7. प्रकाश का ध्रुवण

प्रकाश की कणीय सिद्धांत से सम्बन्धित घटनाएं-

1.प्रकाश विद्युत प्रभाव 2.क्राम्पटन प्रभाव

प्रकाश का परावर्तन

सूर्य के प्रकाश को जब किसी अपारदर्शक सतह पर डाला जाता है तो प्रकाश का सतह से टकराकर लौटना प्रकाश का परावर्तन कहलाता है|

प्रकाश के परावर्तन से सम्बन्धित दो नियम दिए गए|

1.आपतित किरण,अभिलम्ब व परावर्तित किरण तीनों एक ही तल में पाए जाते हैं|

2.आपतन कोण का मान परावर्तन कोण के मान के समान पाया जाता हैं|,i =

जैसे-मनुष्यों के द्वारा वस्तुओं को देखने की प्रक्रिया परावर्तन घटना से सम्बन्धित होती हैं|

नोट:-1.सामान्यत कोई भी वस्तु उस रंग की दिखलाई देती है जिस रंग को वह परावर्तित करती है|

2.जब कोई वस्तु सभी रंगो को अवशोषित कर लेती है अर्थात किसी भी प्रकाश किरण का परावर्तन नही करती है तो काली दिखलाई देती है|

3.यदि वस्तु प्रकाश के सभी रंगो का परावर्तन करती है अर्थात किसी भी रंग का अवशोषण नही करती है तो वस्तु श्वेत चमकीली दिखाई देती हैं|

प्रकाश का अपवर्तन

प्रकाश की किरणों का माध्यम परिवर्तन के कारण अपने वास्तविक मार्ग से विचलित हो जाना प्रकाश का अपवर्तन कहलाता हैं|

सामान्स्त: विचलन दो प्रकार के प्राप्त होते हैं|

1.जब प्रकाश की किरण विरल माध्यम से सघन माध्यम की ओर गतिशील होती है तो किरने अपने वास्तविक पथ से अभिलम्ब की ओर मुड जाती हैं|

नोट-सघन माध्यम-जिस माध्यम के लिए अपवर्तनांक का मान अधिक पाया जाता हैं|

विरल माध्यम-जिस माध्यम के लिए अपवर्तनांक का मान कम पाया जाता हैं|

2.यदि प्रकाश की किरण सघन माध्यम से विरल माध्यम में गतिशील होती है तों वह अभिलम्ब से दूर हो जाती हैं|

अपवर्तन के नियम:-

1.आपतित किरण,अभिलम्ब व अपवर्तित किरण तीनों एक ही तल में उपस्थित पाये जाते हैं|

2.आपतित किरण की ज्या तथा अपवर्तित किरण की ज्या का अनुपात नियत पाया जाता है|तथा इस नियतांक मान को पदार्थ का अपवर्तनांक कहा जाता हैं|

प्रकाश के अपवर्तन से सम्बन्धित घटनाएं:-

1.आकाश में तारों का लगातार टिमटिमाते हुए दिखलाई देना|

2.पानी से भरे हुए गिलास के पेंदे में रखे सिक्के का अपनी वास्तविक स्थिति से ऊपर उठा हुआ दिखाई देना|

3.पानी से बहरे हुए गिलास में आंशिक रूप से डूबी हुई पेन्सिल /सीधी छड का मुडा हुआ दिखाई देना|

  1. सूर्य का उदय होने से पूर्व व अस्त होनें के पश्चात भी दिखाई देना|
  2. समुंद्रके पेंदे में स्थित मछली का अपनी वास्तविक स्थिति से कुछ ऊपर उठा हुआ दिखाई देना|
  3. श्वेत प्रकाश को प्रिज्म में से गुजारने पर सात रंगो में विभाजन अपवर्तन की घटना के कारण होता हैं|

नोट:अपवर्तनांक-

प्रकाश की किरणों को अवरोधित करने की क्षमता को पदार्थ का अपवर्तनांक कहा जाता हैं|जिसका मान स्नेल के नियम से ज्ञात किया जाता हैं|

किसी भी पदार्थ के अपवर्तनांक का मान सामान्यत पदार्थ की प्रकृति व उसके तापमान पर निर्भर करता है|

तापमान का मान बढने पर पदार्थ का अपवर्तनांक कम हो जाता है|अपवर्तनांक एक इकाई रहित राशि हैं|

यदि किसी माध्यम में प्रकाश का वेग ज्ञात हो तो उस माध्यम का अपवर्तनांक ज्ञात किया जा सकता है-

प्रकाश का माध्यम में वेग=निर्वात में प्रकाश का वेग/पदार्थ का अपवर्तनांक {U=C/ , =c/u

विभिन्न प्रकार के माध्यमों में प्रकाश का वेग माध्यम के अपवर्तनांक के मान पर निर्भर करता हैं|

सघन माध्यमों में प्रकाश का वेग कम पाया जाता है जबकि विरल माध्यमों में प्रकाश का वेग अधिक पाया जाता हैं|

पूर्ण आंतरिक परावर्तन:-

प्रकाश की यह घटना अपवर्तन की एक विशिष्ट अवस्था है इसको घटित होने के लिए निम्न दो शर्तो का पालन होना चाहिए|

1.प्रकाश की किरण सघन माध्यम से विरल माध्यम में गतिशील होनी चाहिए

2.आपतन कोण का मान क्रांतिक कोण से अधिक होना चाहिए|{}

पूर्ण आंतरिक परावर्तन से सम्बन्धित घटनाएं:-

1.गर्मी के दिनों में रेगिस्तान में मृग मरीचिका का बनना|

2.हीरे का चमकीला दिखाई देना (2.42 सर्वाधिक अपवर्तनांक)

3.सूर्य उदय व अस्त होते समय कुछ लालिमा का दिखलाई देना|

4.विद्युत बल्बों का चमकना|

5.सोनोग्राफी व एक्स रे चित्रों का निर्माण|

6.किसी जल से भरे हुए स्थान में काले रंग की वस्तुओं को रख देने पर वो चमकीली दिखाई देती है|

7.शीशे के चटकने पर दरारों का स्पष्ट चमकते हुए दिखाई देना|

वर्ण विक्षेपण:-

वर्ण विक्षेपण की घटना में अपवर्तन की घटना घटित होती है|जब किसी निकाल प्रिज्म में से सूर्य के श्वेत प्रकाश को गुजारा जाता है तो वह श्वेत प्रकाश अपने वास्तविक सात मूल रंगो में विभेदित हो जाता है इस परिघटना को वर्ण विक्षेपण कहते है|तथा रंगो से प्राप्त चित्रों को वर्ण स्पेक्ट्रम कहा जाता हैं|

सर्वाधिक वर्ण विक्षेपण बैंगनी रंग का पाया जाता है जबकि न्यूनतम वर्ण विक्षेपण लाल रंग का पाया जाता हैं|

रंगो का समूहन:-

सामान्यत:रंग तीन प्रकार के पाये जाते है-1.प्राथमिक रंग  2.द्वितीयक/गौण रंग  3.सम्पूरक रंग

1.प्राथमिक रंग-वे रंग जिनका निर्माण अन्य रंगो के मिश्रण से नहीं किया जा सकता अर्थात जिनका प्रकृति में स्वतंत्र अस्तित्त्व पाया जाता है|इनकी संख्या सामान्यत: तीन मानी गई हैं|

R.B.G.=Red,Blue,Green

जैसे-रंगीन टेलीविजन में तोनो प्राथमिक रंग उपस्थित होते हैं|

2.द्वितीयक रंग:-वे रंग जिनका निर्माण प्राथमिक रंगो के मिश्रण से होता हैं द्वितीयक रंग कहलाते हैं|इनकी संख्या भी 3 मानी गई हैं|-Megenta,Peacock blue,Yellow

3.सम्पूरक रंग-वे रंग जीके मिश्रण से सफेद रंग का निर्माण होता है उस समय वे सम्पूरक रंग कहलाते हैं|

Red +Blue=Megenta  ,Blue+Green =Peacock blue ,Green +Red=Yellow, Red +peacock blue =White ,Blue+Yellow=White ,Green+Megenta=White ,Red+Blue+Green=White ,                       Megenta+yellow+peacock blue=White

Rainbow (इन्द्रधनुष)-

इन्द्रधनुष का बनना वर्ण विक्षेपण (अपवर्तन)घटना का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है|

-इन्द्रधनुष वर्षा के तुरंत पश्चात सूर्य के विपरीत दिशा में दिखलाई देता है|सामान्यत इन्द्रधनुष दो प्रकार के पाये जाते है|

1.प्राथमिक इन्द्रधनुष-यह इन्द्रधनुष वर्षा के तुरंत पश्चात बनता है तथा इस इन्द्रधनुष के निर्माण में बाहर की तरफ लाल रंग व अंदर की तरफ बैंगनी रंग उपस्थित होता है|अंदर की तरफ उपस्थित बैंगनी रंग मानव की आँख पर लगभग 40.8˚के कोण का निर्माण करता है जबकि बाहर की तरफ स्थित लाल रंग मनुष्य की आँख पर 42.8˚के कोण का निर्माण करता है|

2.द्वितीयक इन्द्रधनुष-यह वर्षा के कुछ समय पश्चात बनता है यह प्राथमिक इन्द्रधनुष की तुलना में धुंधला व अस्पष्ट पाया जाता हैं|

इस प्रकार के इन्द्रधनुष में बाहर की तरफ बैंगनी रंग तथा अंदर की तरफ लाल रंग पाया जाता हैं|

बाहर की तरफ उपस्थित बैगनी रंग मनुष्य की आँख पर 50.8˚ का कोण बनाता है जबकि अंदर की तरफ स्थित लाल रंग 54. 52˚के कोण का निर्माण करता हैं|

 

 

 

परमाणु भट्टी

नियंत्रित नाभिकीय विखण्डन अभिक्रिया-

वह नाभिकीय विखण्डन अभिक्रिया सिसके अंतर्गत उत्सर्जित होने वाले तीन न्युट्रोन कणों में से दो न्युट्रोन कणों को किसी भी प्रक्रिया द्वारा अवशोषित करा लिया जाता है तथा शेष बचा एक न्युट्रोन अभिक्रिया को सतत रूप से आगे गतिशील रखता हैं |

92U23556Ba141 +36Kr92 +30n1+200Mev

जैसे-परमाणु भट्टी या नाभिकीय रिएक्टर नियंत्रित नाभिकीय विखण्डन अभिक्रिया पर आधारित पाये जाते हैं|

नाभिकीय/परमाणु भट्टी-वह युक्ति जिसके द्वारा नाभिकीय ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता हैं| नाभिकीय भट्टी कहलाती हैं|

विश्व में सर्वप्रथम परमाणु भट्टी का निर्माण अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय के अंतर्गत 1842 में प्रोफेसर एनरीको फर्मी के निर्देशन में किया गया|जबकि भारत की प्रथम परमाणु भट्टी ट्राम्बे (महाराष्ट्र)के अंतर्गत डा.होमी जहाँगीर भाभा के निर्देशन में बनकर तैयार हुई|जिसे अप्सरा नाम दिया गया|

भारत में 5 परमाणु भट्टी है जो क्रमश:है-अप्सरा,पूर्णिमा,जर्लिना,रुसी,साइरस |

सामान्यत: नाभिकीय भट्टियों में निम्नलिखित तीन भाग पाये जाते है-

1.ईधन कक्ष- नाभिकीय भट्टियों में ईधन के रूप में 92U23594Pu239 का उपयोग किया जाता हैं|लेकिन मुख्य रूप से भट्टियों में 92U235 का ही उपयोग किया जाता है|

2.नियंत्रक कक्ष-इस कक्ष के अंतर्गत न्युट्रोन कणों को अवशोषित करने वाले पदार्थ प्रयुक्त किये जाते है|इस कक्ष में अवशोषक पदार्थ के रूप में कैडमियम,बोरान ,जिर्कोनियम की छडो का उपयोग किया जाता हैं|

3.मंदक कक्ष-इस कक्ष के अंतर्गत न्युट्रोन की गति को कम करने वाले पदार्थ प्रयुक्त किये जाते है|मंदक के रूप में भारी जल (D2O) व कार्बन ग्रेफाईट की छडो का उपयोग किया जाता हैं|

नोट:-मंदक के रूप में प्रयुक्त करने के आधार पर नाभिकीय रिएक्टर दो प्रकार के पाये जाते है-

a.स्विमिंग पुल रिएक्टर-वे भट्टियां जिनमे मंदक के रूप में भारी जल का उपयोग किया जाता है|

b.परमाणु पाइल रिएक्टर- वे परमाणु भट्टियां जिनके अंतर्गत मंदक के रूप में कार्बन ग्रेफाईट छडो का उपयोग किया जाता है|

नाभिकीय सलंयन:-

दो या दो से अधिक हल्के नाभिक जुडकर एक भारी नाभिक का निर्माण करते है तो इस प्रकार की अभिक्रिया को नाभिकीय सलंयन कहा जाता है|

नाभिकीय सलंयन अभिक्रिया को सम्पन्न होने के लिए उच्च ताप (108K)व उच्च दाब की आवश्यकता होती है|

प्रकृति में पृथ्वी पर नाभिकीय सलंयन अभिक्रिया को सम्पन्न करवाने के लिए पहले नाभिकीय विखण्डन अभिक्रिया सम्पन्न कराई जाती है

प्राकृतिक रूप से स्वत: नाभिकीय सलंयन अभिक्रिया सूर्य के केन्द्रीय भाग में सम्पन्न होती है|

1H1+1H32He4+0n1+25.7Mev

-सूर्य की उष्मा व प्रकाश की उत्पत्ति का कारण नाभिकीय सलयन अभिक्रिया है|

-सूर्य पर सर्वाधिक मात्रा में हाइड्रोजन गैस उपस्थित होती है

-अणु बम या हाइड्रोजन बम नाभिकीय सलयन अभिक्रिया पर आधारित है|

-नाभिकीय सलयन अभिक्रिया पर आधारित नाभिकीय भट्टियो को टोकामक कहा जाता है,तथा भारत का प्रथम टोकामक आदित्य नाम से जाना जाता हैं|

मानव शरीर और उसके मुख्य अंग Human body and its main organ

  1. नेत्र(Eye)

दृष्टि वह संवेदन है जिस पर प्रत्येक मनुष्य निर्भर रहता है, नेत्र शरीर का एक अमूल्य अवयव है|  नेत्रों  के द्वारा ही हमें वस्तु का दृष्टि ज्ञान होता है|  इसका निर्माण अत्यंत कोमल तंतुओं से होता है परंतु इसकी रचना जटिल एवं कार्य संषिष्ट है|

प्रत्येक नेत्र की रचना गोलीका आकार की होती है इसीलिए इसे अक्षीगोलक(Eye ball) कहते हैं| अक्षीगोलक एक गड्डे में स्थित रहता है, इसे नेत्र गुहा कहते हैं|  इसी गड्डे में नेत्र को सुरक्षा मिलती है|  नेत्र गोलक का व्यास 2.5 से.मी. होता है| नेत्र गुहा शंकु(Orbital cavity) रूप में होती है| दृष्टि तंत्रिका (Optic nerve)  तथा मस्तिष्क में स्थित दृष्टि केंद्र (Visual centes) कुछ नेत्र उपांग भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है|

नेत्र उपांग(Appendage of the Eye)

  1. भौह
  2. नेत्र श्लेष्मा पलकें
  3. नेत्र पक्षन
  4. नेत्र श्लेष्मा
  5. अश्रु उपकरण
  6. पेशियां
  7. कर्ण(Ear)

कर्ण शरीर का संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है, यह शरीर का आवश्यक अंग है| इससे किसी भी ध्वनि का बोध होता है| कर्ण द्वारा सुनने की क्रिया आठ वीं कपाल तंत्रिका, श्रवण तंत्रिका की सहायता से सम्पन्न होती है| कर्ण के मुख्य तीन भाग होते हैं|

बाह्यकर्ण

मध्यकर्ण

अन्तःकर्ण

a.बाह्यकर्ण(Outer Ear)

बाह्यकर्ण के दो स्पष्ट भाग होते हैं,पहला कर्ण पाली एवं दूसरा भाग कर्ण कुहर| जिसमें कर्ण पली बाहर की ओर स्थित है यह भाग अर्धचंद्राकार दिखाई देता है इसी का ऊपरी भाग पितप्रतयावसा उपस्थिति का बना होता है| कर्ण पाली का मुख्य कार्य ध्वनि को उत्पन्न तरंगों को एकत्रित करके आगे कान के भीतर भेजना है|बाह्य कर्ण का दूसरा भाग बाह्य क्छुर को कान की नली भी कहा जाता है यह नली लगभग 1 इंच लंबी होती है| नली का मार्ग सीधा नहीं बल्कि घुमावदार होता है रचना की दृष्टि से बाह्य कर्ण कुहर के दो भाग होते है| एक तिहाई भाग कार्टिलेज तथा भीतरी दो तिहाई भाग अस्थि निर्मित होता है| बाह्य कर्ण कुहर की त्वचा में विशेष प्रकार की ग्रंथि होती है जिसे कर्णमल संधि कहते हैं| इस ग्रंथि से पीला, चिकना पदार्थ स्रावित होता है जो बाह्य को चिकना रखता है|

बाह्य कर्ण कुहर पर छोटे छोटे रोम होते हैं जो बाहरी धूल के कण आदि को अंदर जाने से रोकते हैं| बाह्य कर्ण के दोनों भाग का कार्य न केवल ध्वनि तरंगों को एकत्रित करना है बल्कि उन्हें पारेषित करके आगे बढ़ाना भी है|

b.मध्यकर्ण (Middle Ear)

यह भाग अनियमित टेड़े आकार की गुहा है| मध्य कर्ण एक झिल्ली कृत पर्दे, कर्ण पटल के द्वारा बाह्य कर्ण से पृथक रहता है| जिस स्थान पर कर्ण पटल स्थित है वहीं से मध्य कर्ण का आरंभ होता है| वास्तव में मध्य कर्ण एक शंकरा आयताकार बॉक्स के समान है जिसकी अग्र मध्य पश्च भित्तियां होती हैं|

मध्य कर्ण की अग्र और पश्च भित्तियों में छिद्र हैं| अग्रभित्ति में कर्ण पटल के बिल्कुल समीप एक छिद्र होता है यह छिद्र नलिका का मुख्य द्वार है यह नलिका कंठ कर्ण नली कहलाती है| इस नलिका के द्वारा कान का संबंध नासा ग्रसनी गुहा से रहता है पश्चभित्ति का कण से संबंध शंखास्थी की कर्णमूल पदार्थ में स्थित कर्णमूल कोटर तथा करण मूल वायु सेल से रहता है मध्य कर्ण में तीन छोटी अस्थियां होती है जो कर्णास्थिका कहलाती है| संपूर्ण मध्य कर्ण गुहा श्लैष्मिक कला अस्तर से ढका रहता है| तीनों छोटी हस्तियां एक श्रृंखला के रूप में स्थित होती है जो निम्न है| मुग्दरक, घूर्णक, बलयक

  1. जिव्हा(Tongue)

जीव्हा मुख्यत: स्वाद ज्ञानकेंद्रीय है|  जिव्हा वस्तु के स्वाद का अनुभव कराती है|  जिसके आधार पर उसके उपयोग किए जाने या न किए जाने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया जाता है|  स्वाद रासायनिक संवेदना है जो स्वाद संग्राहक अंगों को उत्तेजित करते हैं|  प्रत्येक वस्तु में रासायनिक तत्व भिन्न भिन्न होने के कारण उनके स्वाद में विभिन्नता पाई जाती है|

किसी वस्तु के स्वाद को जानने के लिए वस्तु का स्वादेंद्रियों को सीधे संपर्क में आना होता है स्वाद का पता भोजन की तरल अवस्था में ही चलता है| भोजन का कुछ अंश लार में घुल जाता है| लार में घुला हुआ यह भोजन स्वाद कलिकाओं को क्रियाशील कर देता है खाद्य पदार्थ द्वारा एक रासायनिक क्रिया होती है जिसके फलस्वरुप तंत्रिका आवेग पैदा हो जाता है| ये आवेश मस्तिष्क के स्वाद केंद्र तक पहुंचते हैं और स्वाद का अनुभव देने लगते हैं किसी वस्तु का स्वाद जानने के लिए उसे घुलनशील होना अनिवार्य है| जीवा पर रखी हुई ठोस वस्तु का स्वाद अस्पष्ट होता है| मुख्य रूप से स्वाद चार प्रकार का होता है कड़वा, मीठा, नमकीन, खट्टा| अधिकांश खाद्य पदार्थों में स्वाद के अतिरिक्त गंध भी होती है| जिव्हा के आगे का भाग मीठे वे नमकीन स्वाद का अनुभव नहीं कराता क्योंकि यहां पर स्वाद का मध्य भाग किसी भी प्रकार के स्वाद का अनुभव नहीं करता क्योंकि यहां पर कलिकाओं का अभाव रहता है कुछ वैज्ञानिक धात्विक और छारीय स्वादों को भी इस वर्ग में सम्मिलित करते हैं|  स्वाद का मुख्य अंग जिव्हा है क्योंकि स्वाद के संग्राहक इसी में निहित होते है|

  1. नासिका(Nose)

नासिका भी अन्य ज्ञानेंद्रियों की तरह महत्वपूर्ण ज्ञानेंद्रि है| यह घ्राण संवेदना के ज्ञान का अंगक है| सुगंध और दुर्गंध की अनुभूति नासिका के द्वारा होती है| घ्राण संवेदना एक रासायनिक संवेदना है| सूंघने की क्रिया के लिए वस्तु की अवस्था गैस के रुप में होना आवश्यक है|  जब यह गैस  नासिका गुहा में अग्रेसित होती है तो घ्राण क्षेत्र की कोशिकाएं उत्तेजित हो जाती हैं एवं घ्राण का अनुभव होने लगता है घ्राण संवेदना तभी सींव है जब गैस का नाक की श्लेष्मा के साव में घुलनशील स्थिति में आ जाए| नासिका गुहा में गैस या कण वायु के माध्यम से पहुंचते हैं|


नाक द्वारा जोर से खींची गई गैस अधिक मात्रा तथा तीव्र गति से नासिका गुहा में जाती है जिससे गंध का अनुभव तुरंत हो जाता है, यहां तक कभी-कभी गंध असहनीय हो जाती है| नाक ऊपरी हिस्से पर लगाए गए रासायनिक पदार्थ की गंध नासिका द्वारा सरलता से अनुभव कि जा सकती है| घ्राण प्रदेश से आने वाली सूक्ष्म तंतु वृक्षायन द्वारा घ्राण बल्ब के तंतु से मिले रहते हैं| घ्राण बल्ब मस्तिष्क का भी बाहर निकला हुआ भाग है, जो की एथमायड अस्थि की प्लेट के ऊपर उपस्थित होता है| घ्राण बल्ब से संवेदन घ्राण पथ में पहुंचता है| घ्राण तंत्र अनेक केन्द्र्कों में प्रसारित होते हुए अनंत में घ्राण केंद्र में पहुंचता है यह केंद्र प्रममस्तिष्क में स्थित होता है तथा यहीं पर घ्राण संवेदन ग्रहण किये जाते हैं|

  1. त्वचा

त्वचा शरीर की सतह पर एक सुरक्षात्मक आवरण होता है| यह उन गुहाओं की उपकला से संबंध रखती है जिनके द्वारा त्वचा पर खुलते हैं| त्वचा में स्पर्श तंत्रिका अंताग स्थित होते हैं| यह शरीर के तापमान तथा शरीर में होने वाली जल हानि को नियंत्रित करती है| त्वचा स्पर्श संवेदन की महत्वपूर्ण ज्ञानेंद्रिय है| संवेदन के अनुभव के लिए संबंधित संवेदी तंत्रिकाओं में उत्तेजना आवश्यक है| इस प्रकार उत्पन्न उत्तेजना मस्तिष्क में परेषित होने के पश्चात केंद्रीय तंत्रिका तंत्र उसका विश्लेषण करती है एवं मस्तिष्क द्वारा उस विशेष संवेदना का अनुभव होता है त्वचा को दो स्तरों में विभाजित किया जाता है, बाह्य त्वचा, अंत:स्तत्वचा