प्रकाश (LIGHT)

प्रकाश

प्रकाश एक प्रकार की ऊर्जा है,प्रकाश की प्रकृति द्वैत पाई जाती है|अर्थात प्रकाश तरंग व कण दोनों की तरह व्यवहार करता हैं|

नोट-प्रकाश की तरंग प्रकृति की व्याख्या हाइमन व हाइजेनबर्ग के द्वारा की गई|जबकि प्रकाश की कणीय प्रकृति की व्याख्या न्यूटन द्वारा की गई|

  • प्रकाश एक सीधी सरल रेखा में संचरित होता है|
  • प्रकाश एक प्रकार की अनुप्रस्थ यांत्रिक तरंगे है|
  • सूर्य का दृश्य प्रकाश सात रंगो से मिलकर बना होता हैयह सर्वप्रथम न्यूटन नामक वैज्ञानिक ने बताया|

नोट:-उष्मा का संचरण पदार्थ की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में भिन्न-भिन्न विधियों द्वारा होता है|

  1. ठोस पदार्थ-चालन विधि द्वारा
  2. द्रव पदार्थ –संवहन विधि द्वारा
  3. गैसीय पदार्थ-विकिरण विधि द्वारा

सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक विकिरणों के द्वारा लगभग 8 मिनट 20 सेकण्ड में पहुंचता है|जबकि सूर्य का प्रकाश चन्द्रमा से परावर्तित होकर पृथ्वी तक विकिरण विधियों द्वारा आने में 1.28 सेकण्ड का समय लेता है|

प्रकाश का सर्वाधिक वेग निर्वात में 3×108m/sec. पाया जाता हैं|क्योंकि निर्वात का अपवर्तनांक न्यूनतम व एक पाया जाता हैं|

प्रकाश का फोटोन सिद्धांत मैक्स प्लांक नामक वैज्ञानिक ने प्रतिपादित किया इनके अनुसार प्रकाश ऊर्जा के छोटे-चौटे बंडलों के रूप में संचरित होता हैं,जिन्हें क्वांटा कहा जाता हैं|तथा दृश्य प्रकाश के क्वांटा को फोटोन कहा जाता हैं|

प्रत्येक क्वांटा की ऊर्जा निश्चित पाई जाती है|जिसका मान क्वांटा की तरंगदैर्ध्य के व्युत्क्रमानुपाती होता हैं|

E= ,E=h ,  c /

=hc/  ,E=hc /   {h=6.62×10-34 ,E=12400/A˚}

प्रकाश की तरंग सिद्धांत से सम्बन्धित घटनाएं

  1. प्रकाश का परावर्तन
  2. प्रकाश का अपवर्तन
  3. प्रकाश का पूर्ण आंतरिक परावर्तन
  4. प्रकाश का वर्ण विक्षेपण
  5. प्रकाश का व्यतिकरण
  6. प्रकाश का विवर्तन
  7. प्रकाश का ध्रुवण

प्रकाश की कणीय सिद्धांत से सम्बन्धित घटनाएं-

1.प्रकाश विद्युत प्रभाव 2.क्राम्पटन प्रभाव

प्रकाश का परावर्तन

सूर्य के प्रकाश को जब किसी अपारदर्शक सतह पर डाला जाता है तो प्रकाश का सतह से टकराकर लौटना प्रकाश का परावर्तन कहलाता है|

प्रकाश के परावर्तन से सम्बन्धित दो नियम दिए गए|

1.आपतित किरण,अभिलम्ब व परावर्तित किरण तीनों एक ही तल में पाए जाते हैं|

2.आपतन कोण का मान परावर्तन कोण के मान के समान पाया जाता हैं|,i =

जैसे-मनुष्यों के द्वारा वस्तुओं को देखने की प्रक्रिया परावर्तन घटना से सम्बन्धित होती हैं|

नोट:-1.सामान्यत कोई भी वस्तु उस रंग की दिखलाई देती है जिस रंग को वह परावर्तित करती है|

2.जब कोई वस्तु सभी रंगो को अवशोषित कर लेती है अर्थात किसी भी प्रकाश किरण का परावर्तन नही करती है तो काली दिखलाई देती है|

3.यदि वस्तु प्रकाश के सभी रंगो का परावर्तन करती है अर्थात किसी भी रंग का अवशोषण नही करती है तो वस्तु श्वेत चमकीली दिखाई देती हैं|

प्रकाश का अपवर्तन

प्रकाश की किरणों का माध्यम परिवर्तन के कारण अपने वास्तविक मार्ग से विचलित हो जाना प्रकाश का अपवर्तन कहलाता हैं|

सामान्स्त: विचलन दो प्रकार के प्राप्त होते हैं|

1.जब प्रकाश की किरण विरल माध्यम से सघन माध्यम की ओर गतिशील होती है तो किरने अपने वास्तविक पथ से अभिलम्ब की ओर मुड जाती हैं|

नोट-सघन माध्यम-जिस माध्यम के लिए अपवर्तनांक का मान अधिक पाया जाता हैं|

विरल माध्यम-जिस माध्यम के लिए अपवर्तनांक का मान कम पाया जाता हैं|

2.यदि प्रकाश की किरण सघन माध्यम से विरल माध्यम में गतिशील होती है तों वह अभिलम्ब से दूर हो जाती हैं|

अपवर्तन के नियम:-

1.आपतित किरण,अभिलम्ब व अपवर्तित किरण तीनों एक ही तल में उपस्थित पाये जाते हैं|

2.आपतित किरण की ज्या तथा अपवर्तित किरण की ज्या का अनुपात नियत पाया जाता है|तथा इस नियतांक मान को पदार्थ का अपवर्तनांक कहा जाता हैं|

प्रकाश के अपवर्तन से सम्बन्धित घटनाएं:-

1.आकाश में तारों का लगातार टिमटिमाते हुए दिखलाई देना|

2.पानी से भरे हुए गिलास के पेंदे में रखे सिक्के का अपनी वास्तविक स्थिति से ऊपर उठा हुआ दिखाई देना|

3.पानी से बहरे हुए गिलास में आंशिक रूप से डूबी हुई पेन्सिल /सीधी छड का मुडा हुआ दिखाई देना|

  1. सूर्य का उदय होने से पूर्व व अस्त होनें के पश्चात भी दिखाई देना|
  2. समुंद्रके पेंदे में स्थित मछली का अपनी वास्तविक स्थिति से कुछ ऊपर उठा हुआ दिखाई देना|
  3. श्वेत प्रकाश को प्रिज्म में से गुजारने पर सात रंगो में विभाजन अपवर्तन की घटना के कारण होता हैं|

नोट:अपवर्तनांक-

प्रकाश की किरणों को अवरोधित करने की क्षमता को पदार्थ का अपवर्तनांक कहा जाता हैं|जिसका मान स्नेल के नियम से ज्ञात किया जाता हैं|

किसी भी पदार्थ के अपवर्तनांक का मान सामान्यत पदार्थ की प्रकृति व उसके तापमान पर निर्भर करता है|

तापमान का मान बढने पर पदार्थ का अपवर्तनांक कम हो जाता है|अपवर्तनांक एक इकाई रहित राशि हैं|

यदि किसी माध्यम में प्रकाश का वेग ज्ञात हो तो उस माध्यम का अपवर्तनांक ज्ञात किया जा सकता है-

प्रकाश का माध्यम में वेग=निर्वात में प्रकाश का वेग/पदार्थ का अपवर्तनांक {U=C/ , =c/u

विभिन्न प्रकार के माध्यमों में प्रकाश का वेग माध्यम के अपवर्तनांक के मान पर निर्भर करता हैं|

सघन माध्यमों में प्रकाश का वेग कम पाया जाता है जबकि विरल माध्यमों में प्रकाश का वेग अधिक पाया जाता हैं|

पूर्ण आंतरिक परावर्तन:-

प्रकाश की यह घटना अपवर्तन की एक विशिष्ट अवस्था है इसको घटित होने के लिए निम्न दो शर्तो का पालन होना चाहिए|

1.प्रकाश की किरण सघन माध्यम से विरल माध्यम में गतिशील होनी चाहिए

2.आपतन कोण का मान क्रांतिक कोण से अधिक होना चाहिए|{}

पूर्ण आंतरिक परावर्तन से सम्बन्धित घटनाएं:-

1.गर्मी के दिनों में रेगिस्तान में मृग मरीचिका का बनना|

2.हीरे का चमकीला दिखाई देना (2.42 सर्वाधिक अपवर्तनांक)

3.सूर्य उदय व अस्त होते समय कुछ लालिमा का दिखलाई देना|

4.विद्युत बल्बों का चमकना|

5.सोनोग्राफी व एक्स रे चित्रों का निर्माण|

6.किसी जल से भरे हुए स्थान में काले रंग की वस्तुओं को रख देने पर वो चमकीली दिखाई देती है|

7.शीशे के चटकने पर दरारों का स्पष्ट चमकते हुए दिखाई देना|

वर्ण विक्षेपण:-

वर्ण विक्षेपण की घटना में अपवर्तन की घटना घटित होती है|जब किसी निकाल प्रिज्म में से सूर्य के श्वेत प्रकाश को गुजारा जाता है तो वह श्वेत प्रकाश अपने वास्तविक सात मूल रंगो में विभेदित हो जाता है इस परिघटना को वर्ण विक्षेपण कहते है|तथा रंगो से प्राप्त चित्रों को वर्ण स्पेक्ट्रम कहा जाता हैं|

सर्वाधिक वर्ण विक्षेपण बैंगनी रंग का पाया जाता है जबकि न्यूनतम वर्ण विक्षेपण लाल रंग का पाया जाता हैं|

रंगो का समूहन:-

सामान्यत:रंग तीन प्रकार के पाये जाते है-1.प्राथमिक रंग  2.द्वितीयक/गौण रंग  3.सम्पूरक रंग

1.प्राथमिक रंग-वे रंग जिनका निर्माण अन्य रंगो के मिश्रण से नहीं किया जा सकता अर्थात जिनका प्रकृति में स्वतंत्र अस्तित्त्व पाया जाता है|इनकी संख्या सामान्यत: तीन मानी गई हैं|

R.B.G.=Red,Blue,Green

जैसे-रंगीन टेलीविजन में तोनो प्राथमिक रंग उपस्थित होते हैं|

2.द्वितीयक रंग:-वे रंग जिनका निर्माण प्राथमिक रंगो के मिश्रण से होता हैं द्वितीयक रंग कहलाते हैं|इनकी संख्या भी 3 मानी गई हैं|-Megenta,Peacock blue,Yellow

3.सम्पूरक रंग-वे रंग जीके मिश्रण से सफेद रंग का निर्माण होता है उस समय वे सम्पूरक रंग कहलाते हैं|

Red +Blue=Megenta  ,Blue+Green =Peacock blue ,Green +Red=Yellow, Red +peacock blue =White ,Blue+Yellow=White ,Green+Megenta=White ,Red+Blue+Green=White ,                       Megenta+yellow+peacock blue=White

Rainbow (इन्द्रधनुष)-

इन्द्रधनुष का बनना वर्ण विक्षेपण (अपवर्तन)घटना का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है|

-इन्द्रधनुष वर्षा के तुरंत पश्चात सूर्य के विपरीत दिशा में दिखलाई देता है|सामान्यत इन्द्रधनुष दो प्रकार के पाये जाते है|

1.प्राथमिक इन्द्रधनुष-यह इन्द्रधनुष वर्षा के तुरंत पश्चात बनता है तथा इस इन्द्रधनुष के निर्माण में बाहर की तरफ लाल रंग व अंदर की तरफ बैंगनी रंग उपस्थित होता है|अंदर की तरफ उपस्थित बैंगनी रंग मानव की आँख पर लगभग 40.8˚के कोण का निर्माण करता है जबकि बाहर की तरफ स्थित लाल रंग मनुष्य की आँख पर 42.8˚के कोण का निर्माण करता है|

2.द्वितीयक इन्द्रधनुष-यह वर्षा के कुछ समय पश्चात बनता है यह प्राथमिक इन्द्रधनुष की तुलना में धुंधला व अस्पष्ट पाया जाता हैं|

इस प्रकार के इन्द्रधनुष में बाहर की तरफ बैंगनी रंग तथा अंदर की तरफ लाल रंग पाया जाता हैं|

बाहर की तरफ उपस्थित बैगनी रंग मनुष्य की आँख पर 50.8˚ का कोण बनाता है जबकि अंदर की तरफ स्थित लाल रंग 54. 52˚के कोण का निर्माण करता हैं|

 

 

 

परमाणु भट्टी

नियंत्रित नाभिकीय विखण्डन अभिक्रिया-

वह नाभिकीय विखण्डन अभिक्रिया सिसके अंतर्गत उत्सर्जित होने वाले तीन न्युट्रोन कणों में से दो न्युट्रोन कणों को किसी भी प्रक्रिया द्वारा अवशोषित करा लिया जाता है तथा शेष बचा एक न्युट्रोन अभिक्रिया को सतत रूप से आगे गतिशील रखता हैं |

92U23556Ba141 +36Kr92 +30n1+200Mev

जैसे-परमाणु भट्टी या नाभिकीय रिएक्टर नियंत्रित नाभिकीय विखण्डन अभिक्रिया पर आधारित पाये जाते हैं|

नाभिकीय/परमाणु भट्टी-वह युक्ति जिसके द्वारा नाभिकीय ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता हैं| नाभिकीय भट्टी कहलाती हैं|

विश्व में सर्वप्रथम परमाणु भट्टी का निर्माण अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय के अंतर्गत 1842 में प्रोफेसर एनरीको फर्मी के निर्देशन में किया गया|जबकि भारत की प्रथम परमाणु भट्टी ट्राम्बे (महाराष्ट्र)के अंतर्गत डा.होमी जहाँगीर भाभा के निर्देशन में बनकर तैयार हुई|जिसे अप्सरा नाम दिया गया|

भारत में 5 परमाणु भट्टी है जो क्रमश:है-अप्सरा,पूर्णिमा,जर्लिना,रुसी,साइरस |

सामान्यत: नाभिकीय भट्टियों में निम्नलिखित तीन भाग पाये जाते है-

1.ईधन कक्ष- नाभिकीय भट्टियों में ईधन के रूप में 92U23594Pu239 का उपयोग किया जाता हैं|लेकिन मुख्य रूप से भट्टियों में 92U235 का ही उपयोग किया जाता है|

2.नियंत्रक कक्ष-इस कक्ष के अंतर्गत न्युट्रोन कणों को अवशोषित करने वाले पदार्थ प्रयुक्त किये जाते है|इस कक्ष में अवशोषक पदार्थ के रूप में कैडमियम,बोरान ,जिर्कोनियम की छडो का उपयोग किया जाता हैं|

3.मंदक कक्ष-इस कक्ष के अंतर्गत न्युट्रोन की गति को कम करने वाले पदार्थ प्रयुक्त किये जाते है|मंदक के रूप में भारी जल (D2O) व कार्बन ग्रेफाईट की छडो का उपयोग किया जाता हैं|

नोट:-मंदक के रूप में प्रयुक्त करने के आधार पर नाभिकीय रिएक्टर दो प्रकार के पाये जाते है-

a.स्विमिंग पुल रिएक्टर-वे भट्टियां जिनमे मंदक के रूप में भारी जल का उपयोग किया जाता है|

b.परमाणु पाइल रिएक्टर- वे परमाणु भट्टियां जिनके अंतर्गत मंदक के रूप में कार्बन ग्रेफाईट छडो का उपयोग किया जाता है|

नाभिकीय सलंयन:-

दो या दो से अधिक हल्के नाभिक जुडकर एक भारी नाभिक का निर्माण करते है तो इस प्रकार की अभिक्रिया को नाभिकीय सलंयन कहा जाता है|

नाभिकीय सलंयन अभिक्रिया को सम्पन्न होने के लिए उच्च ताप (108K)व उच्च दाब की आवश्यकता होती है|

प्रकृति में पृथ्वी पर नाभिकीय सलंयन अभिक्रिया को सम्पन्न करवाने के लिए पहले नाभिकीय विखण्डन अभिक्रिया सम्पन्न कराई जाती है

प्राकृतिक रूप से स्वत: नाभिकीय सलंयन अभिक्रिया सूर्य के केन्द्रीय भाग में सम्पन्न होती है|

1H1+1H32He4+0n1+25.7Mev

-सूर्य की उष्मा व प्रकाश की उत्पत्ति का कारण नाभिकीय सलयन अभिक्रिया है|

-सूर्य पर सर्वाधिक मात्रा में हाइड्रोजन गैस उपस्थित होती है

-अणु बम या हाइड्रोजन बम नाभिकीय सलयन अभिक्रिया पर आधारित है|

-नाभिकीय सलयन अभिक्रिया पर आधारित नाभिकीय भट्टियो को टोकामक कहा जाता है,तथा भारत का प्रथम टोकामक आदित्य नाम से जाना जाता हैं|

1857 Ki Kranti

1857 की क्रांति:                                                         –

1857 तक भारत में ब्रिटिश सरकार के 100 वर्ष पूरे हो गये थे,इस दौरान ब्रिटिश शासन के विरुद्ध असंतोष के कारण अधिकांश विद्रोह हुए|जबकि किसानों ने भू-राजस्व नीति के कारण विद्रोह किए|इनमे से प्रमुख थे-

वेल्लोर विद्रोह-(1806)-यह विद्रोह भारतीय सैनिको ने अंग्रेजो द्वारा उनके सामाजिक,धार्मिक रीति रिवाजो में हस्तक्षेप के कारण किया|

बैरकपुर विद्रोह (1824)-47 वी रेजीमेंट ने बर्मा में सेवा देने से मना कर दिया|

1849 में सांतवी बंगाल कैवलरी ,64वी. रेजीमेंट और 22 वी रेजीमेंट का विद्रोह|

1850 में 66 वी.NI व 1852 में 38 वी NI का विद्रोह|

1857 में होने वाला सैनिक विद्रोह भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सर्वाधिक शक्तिशाली विद्रोह था.जिसने स्वतंत्रता आन्दिलं का रूप धारण कर लिया था|

विद्रोह के कारण –

1857 में हुए विद्रोह का सर्वप्रमुख व तात्कालिक कारण सैनिको को चर्बीयुक्त कारतूस उपयोग करने के लिए दिया जाना था,इसके अलावा विद्रोह का कारण भारतीय सैनिको व जनता में अंग्रेजो के प्रति काफी असंतोष था जो धीरे-धीरे अंदर ही जमा हो रहा था,बस इसे एक चिंगारी की आवश्यकता थी जो चर्बी वाले कारतूसों ने प्रदान कर दी|इस विद्रोह के समय बारत के गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग थे|जबकि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री लार्ड पामर्स्टन थे|

1857 की क्रांति की पृष्ठभूमि में निम्नलिखित कारण विद्यमान थे-

1.राजनैतिक कारण –क्रांति के राजनैतिक कारणों में दो प्रमुख कारण थे-a-वेलेजली की सहायक सन्धियाँ  b. डलहौजी की व्यपगत नीतियाँ

व्यपगत नीति अथवा राज्य हडप नीति के तहत भारतीय राज्यों का तीन श्रेनियो वर्गीकरण किया गया|व्यपगत नीति के अनुसार जिस रियासत के राजा के कोई सन्तान नही होगी उसके राज्य को राजा की मृत्यु के बाद अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया जाएगा|राजा की विधवा को पुत्र गोद लेने का अधिकार नही था|इस नीति के तहत डलहौजी ने सतारा(1848),जैतपुर,सम्भलपुर(1849),बघाट(1850),उदयपुर (1852),झांसी(1853),नागपुर(1854) को अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया|

डलहौजी द्वारा राजस्थान की करौली रियासत को अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाये जाने को कोर्ट आफ डायरेक्टर्स ने यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि करौली संरक्षित मित्र है न किआश्रित राज्य|इसी प्रकार उदयपुर और बघाट के विलय के सम्बन्ध में लिए गये डलहौजी के निर्णय को लार्ड कैनिंग ने निरस्त कर दिया|

डलहौजी ने अवध को कुशासन का आरोप लगाकर हडप लिया था|

पेशवा बाजीराव द्वितीय की मृत्यु के बाद उसके पुत्र नाना साहेब की पेंशन को डलहौजी ने बंद कर दिया|क्योंकि वह पेंशन  निजी रूप से बाजीराव द्वितीय को दी गई थी ना कि पेशवा को|

डलहौजी ने कर्नाटक व तंजौर के नवाबो की राजकीय उपाधियाँ जब्त कर ली|

लार्ड डलहौजी ने 1849 में घोषणा की कि मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी शहजादे को मुगल महल (लाल किला) छोड़ना पड़ेगा तथा उसे कुतुबमीनार के पास एक छोटे से महान में रहना होगा|1856 में कैनिंग ने यह घोषणा की कि बहादुर शाह की मृत्यु के बाद मुगलों से सम्राट की पदवी छीन ली जायेगीं|और वे सिर्फ राजा कहलायेंगे|इन सभी कारणों से राजाओं व जनता में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आक्रोश व्याप्त हो गया था|

2.प्रशासनिक कारण – भारतीयों को प्रशासन में उच्च पदों से वंचित कर दिया गया|कोई भी भारतीय सेना में सूबेदार से ऊँचे पद पर नहीं पहुंच सकता था|न्यायिक क्षेत्र में भी अंग्रेजो को भारतीयों से श्रेष्ठ दर्जा दिया गया|

3.सामाजिक व धार्मिक कारण :- रुढ़िवादी भारतीयों ने सामाजिक सुधारों का विरोध किया|साथ ही ईसाईं मिशनरियों को 1813 के चार्टर एक्ट द्वारा भारत में धर्म प्रचार की अनुमति मिल गई|उन्होंने धर्मांतरण के प्रयास किये|इसने भी भारतीयों को नाराज कर दिया|

1850 में धार्मिक निर्योग्यता अधिनियम संख्या-21 द्वारा ईसाई धर्म ग्रहण करने वाले लोगों को पैत्रक सम्पत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता था|इससे लोगों को यह लगने लगा कि भारत को ईसाईं देश बनाने की कोशिश की जा रही हैं|

  1. आर्थिक कारण –अंग्रेजो की आर्थिक नीतियों के कारण भारत के उद्योग व व्यापार नष्ट होने लगे थे |इसके अलावा मनमाना लगान व कठोर भू-राजस्व नीति के कारण लोगों के आर्थिक उत्पीडन ने असंतोष को जन्म दिया|जिससे विद्रोह की भूमिका तैयार होने लगी|

  2. सैनिक कारण –भारतीयों को समुन्द्र पार जाने पर दिया जाने वाला भत्ता बंद कर दिया गया|तथा 1854 के डाकघर अधिनियम द्वारा सैनिको को दी जाने वाली नि:शुल्क डाक सुविधा समाप्त कर दी गई|

विद्रोह की योजना व आरम्भ :-इस क्रांति के मुख्य योजनाकार नाना साहब व अजीमुल्ला खां व रानोजी बापू को माना जाता है| इन्होने 31 मई को क्रांति शुरू करने का दिन चुना था|तथा इसके प्रतिक के रूप में कमल का फूल व रोटी को चुना गया|कमल का फूल विद्रोह में शामिल होने वाली सभी सैनिक टुकड़ियों में पहुचायाँ गया|रोटी को एक गाँव का चौकीदार दूसरे गाँव के चौकीदार तक पहुचाता था|

चर्बी वाले कारतूसो के प्रयोग के विरुद्ध पहली घटना कलकत्ता के पास बैरकपुर छावनी में 29 मार्च 1857 को घटी,जब 34 वी नेटिव इन्फेंट्री रेजिमेंट के एक सिपाही मंगल पांडे ने चर्बी वाले कारतूसो के प्रयोग से नमा करते हुए लेफ्टिनेंट बाग़ व सार्जेंट मेजर ह्रुसन की हत्या कर दी|

मंगल पांडे उत्तर प्रदेश के गाजीपुर (वर्तमान बलिया)जिले का रहने वाला था,इस घटना के आरोप में 8 अप्रैल 1857 को मंगल पांडे को फांसी डे दी गई|

10 मई 1857 को मेरठ छावनी में 20 वी एन.आई. के पैदल सैनिको ने चर्बी वाले कारतूसों के प्रयोग से इनकार कर विद्रोह कर दिया|और अपने बंदी साथियों को मुक्त कराकर दिल्ली प्रस्थान किया|

12 मई को विद्रोहियों ने दिल्ली पर कब्जा कर बहादुर शाह जफर को भारत का बादशाह व विद्रोह का नेता घोषित कर दिया|

4 जून को झांसी में राजा गंगाधर राव की विधवा रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में विद्रोह की शुरुआत हुई|झांसी के पतन के बाद रानी ग्वालियर की ओर चली गई|17 जून 1858 को अंग्रेज जनरल हौरोज से लडती हुई शहीद हो गई|इस पर जनरल ने कहा कि भारतीय क्रांतिकारियों में यहाँ सोई हुई औरत अकेली मर्द है|

ग्वालियर में तांत्या टोपे ने विद्रोह का नेतृत्व किया|ये नाना साहब का सेनापति भी थे|ये ग्वालियर के पतन के बाद राजस्थान भी आये|इनको अप्रैल 1859 में इनके मित्र ने विश्वास घात करके पकडवा दिया और इनको 18 अप्रैल को फांसी डे दी गई|

पंजाब में नामधारी सिखों ने सशस्त्र विद्रोह किया|जबकि बरेली में कहां बहादुर खान व हरियाणा में राव तुलाराम ने क्रांति का नेतृत्व किया|

लखनऊ में बेगम हजरत महल के नेतृत्व में 4 जून 1857 को विद्रोह की शुरुआत हुई|भारतीय सैनिको ने लखनऊ के ब्रिटिश रेजीडेंसी को घेरकर अवध के चीफ कमिश्नर हेनरी लारेंस की हत्या कर दी|

21 मार्च 1858 को कालिन कैम्पबेल ने जंग बहादुर के नेतृत्व में गोरखा रेजिमेंट की सहायता से लखनऊ पुन: जीता |बेगम हजरत महल पराजित होने पर नेपाल चली गई व गुमनामी में ही मर गई|

कानपुर में विद्रोह की शुरुआत 5 जून 1857 को नाना साहब के नेतृत्व में हुई|तात्यां टोपे ने उनकी सहायता की|16 दिसम्बर 1857 को कैम्पबेल का कानपुर पर अधिकार हो गया|नाना साहब भी पराजित होकर नेपाल चले गये|

जगदीशपुर (बिहार) में कुंवर सिंह ने विद्रोह किया|युद्ध में जख्मी हो जाने के बाद 26 अप्रैल 1858 को उनकी मृत्यु हो गई|

फैजाबाद में मौलवी अहमदुल्ला ने विद्रोह का नेतृत्व किया जबकि बरेली में खान बहादुर खान ने नेतृत्व किया|

दिल्ली में अंतिम मुगल बादशाह बहादुरशाह ने बख्त खां के सहयोग से नेतृत्व किया|20 सितम्बर 1857 को ले.हडसन ने बादशाह को हुमायु के मकबरे से गिरफ्तार कर लिया और उनको  उनकी बेगम के साथ रंगून भेज दिया|जहां 7 नवम्बर 1862 को उनकी मृत्यु हो गई|

दक्षिणी भारत,पंजाब,बंगाल,राजस्थान व महाराष्ट्र के अधिकांश भाग विद्रोह से अलग रहे|यहाँ के जमीदारों ने शासको के विरुद्ध होने वाले विद्रोह को कुचलने में अंग्रेजो की मदद की|

विद्रोह की असफलता के कारण –

1.विद्रोहियों के पास योग्य व कुशल नेतृत्व की कमी थी जबकि अंग्रेज सेनापति अधिक कुशल थे|

2.विद्रोह करने का अलग-अलग समय व सीमित क्षेत्र

3.शिक्षित व मध्यम वर्ग व व्यापारियों ने भी विद्रोहियों का साथ नही दिया

4.विद्रिहियो के पास सुनियोजित योजना व भविष्य का कोई दृष्टिकोण नही था|

विभिन्न विचारको के विचार –

रीज ने इसे कट्टरपंथीयों का ईसाईंयत के विरुद्ध संग्राम कहा|

डा.ताराचंद ने राष्ट्रीय विप्लव कहा|

टी.आर. होम्स ने सभ्यता और बर्बरता के मध्य संघर्ष कहा|

वी.डी.सावरकर ने भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा|

अशोक मेहता ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए सुनियोजित संग्राम कहा|

डा.रमेश मजूमदार ने अनुसार तथाकथित प्रथम राष्ट्रीय संग्राम न तो पहला ही,न ही राष्ट्रीय तथा न ही स्वतंत्रता संग्राम था |
 

Kim Jong Un

प्राचीन और मध्ययुगीन इतिहास में राजाओं, सुल्तानों और बादशाहों की तानाशाही के तमाम सारे उदाहरण मिलते हैं। राजा, महाराजा, सुल्तान या बादशाह स्वेच्छारी हो सकते थे। क्योंकि उनके ऊपर जनतांत्रिक नियंत्रण नहीं था। विश्व के राजनीतिक परिदृश्य में जब लोकतंत्र का आगाज हो रहा था वैसे हालात में तानाशाही शासन की अवधारणा समझ से परे थी। लेकिन सच ये है कि दुनिया ने ऐसे सनकियों का शासन देखा जिससे दुनिया बर्बादी के कगार पर आ पहुंची।

किम जोंग

उत्तर कोरिया का तानाशाह किम जोंग उन जिस तरह से हर काम पर अड़ियल रुख अपनाता है और हर फैसले पर अडिग रहताहै उससे माना जा रहा है कि वह दुनिया का अगला हिटलर साबित हो सकता है। किम जोंग की सनक और खौफनाक कारनामों के किस्से मशहूर हैं। वह एक ऐसा तानाशाह है जो अपने सगेसंबंधियों पर भी रहम नहीं करता। किसी को मौत देना उसके लिए लिए सबसे छोटा काम है।

फूफा को 120 शिकारी कुत्तों के सामने फेंकवाया

किम जोंग ने साल 2013 में अपने सगे फूफा को बेरहमी से मरवा दिया था। उसने अपने फूफा को खूंखार कुत्तों के सामने डलवा दिया था। 120 शिकारी कुत्तों ने किम के फूफा जेंग सेंग को नोच नोच कर मार डाला | कहा जाता है कि जिस फूफा को सनकी तानाशाह ने मरवा दिया उसी ने उसे सियासत की बारीकियां सिखाई थीं। लेकिन किम जोंग को लगने लगा था कि फूफा का प्रभाव उससे ज्यादा हो रहा है तो उसने फूफा पर कुछ आरोप लगाकर उसे उसकी हत्या करा दी।

बुआ को दिया जहर

किम जोंग की बुआ ने जब अपने पति की मौत पर सवाल उठाया तो उसे भी जहर दिला दिया गया। इसके बाद बताया गया कि उसकी मौत हार्ट अटैक से हुई है। 2015 में कोरिया भागे एक अफसर ने सनसनीखेज खुलासा करते हुए कहा था कि जोंग ने अपनी बुआ की हत्या करा दी।

झपकी लेने में सेना प्रमुख को मरवाया

किम जोंग को फरमान पर आनाकानी पसंद नहीं है, क्योंकि ऐसा करने वाले को सिर्फ सजामौत होती है। तानाशाह के बार किम जोंग ने उत्तर कोरिया के रक्षा प्रमुख ह्योंग योंग तोप से उड़वा दिया था। उनकी गलती सिर्फ इतनी थी कि उन्होंने किम जोंग की एक मीटिंग में झपकी लेने की हिमाकत कर दी थी।

नहीं रोने पर होती है सजा मौत

कहा जाता है कि किंम जोंग के पिता की जब मौत हुई तो ऐलान किया गया कि अंतिम संस्कार में मौजूद हर किसी को रोना होगा। लेकिन जिन लोगों के मौके पर आंसू नहीं आए उन्होंने उन्हें सजा ए मौत मिली। शोक नहीं वाले लोगों को गिरफ्तार किया गया और गोली मार दी गई।

स्कूल में अश्लील साहित्य पढ़ते हुए मिला

कहा जाता है कि किंग जोंग ने स्विटजरलैंड के इंटरनेशनल स्कूल ऑफ बर्न में दूसरे नाम से पढ़ाई की। स्कूल में वह काफी कमजोर छात्र था। उसकी सोहबत ठीक नहीं थी। एक बार वो स्कूल में उसे पोर्न मैगजीन पढ़ते हुए पकड़ा गया था।

सनक में लेता है कोई भी फैसला

किम जोंग उन को सबसे सनकी तानाशाह बताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि 2015 में साउथ कोरिया में बार्डर पर लाउडस्पीकर लगाकर अपना प्रोपेगंडा लोगों को सुनाना शुरू किया था। इस पर किम जोंग उन बौखला गया और सीमा पर अपने सैनिक भेज दिया। किम जोंग ने ऐलान किया कि अगर साउथ कोरिया ने लाउड स्पीकर नहीं बंद किए तो उसकी सेना हमला कर देगी। इसके बाद बड़ी मशक्कत से दोनों देशों का विवाद सुलझा था।
खुद को भगवान बताता है तानाशाह :
उत्तरी कोरिया का तानाशाह किम जोंग खुद को भगवान के रूप में पेश करता है। वह अपने देश के नागरिकों के बीच ऐसे तथ्य पेश करता है जिसे लोग उसे भगवान मानने लगें।

 

Bullet Train in India

भारत में बुलेट ट्रेन की आधारशिला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व जापान के प्रधान मंत्री शिंजो आबे ने 14 सितम्बर 2017 को गुजरात के अहमदाबाद में रखी| यह बुलेट ट्रेन अहमदाबाद से मुम्बई के बीच चलेगी| इसकी रफ्तार 250 किमी.प्रति घंटा होगी|जिससे अहमदाबाद से मुम्बई के बीच की 500किमी. की दूरी 2 घंटे में पूरी हो सकेगी|

भारत में बुलेट ट्रेन को कुछ लोग विकास का बड़ा कदम मानते है और कुछ लोग गैर जरूरी प्रोजेक्ट| आलोचकों का कहना है कि बुलेट ट्रेन पर लगने वाली लागत को यदि वर्तमान रेलवे सिस्टम पर खर्च किया जाए तो बहुत सारी यात्री सुविधाएं बढाई जा सकती हैं जैसे- जहां रेल कनेक्टिविटी नहीं है वहां पर नई रेल परियोजना,यात्री सुरक्षा आदि| इसी प्रकार की आलोचनाए दिल्ली मैट्रो के समय दी गई थी कि क्या हमारे पास ऐसी विलासिता पर खर्च करने लायक पैसा है?,लेकिन आज देखे तो 7 शहरों में आज मैट्रो चल रही है और 24 शहरों में मैट्रो प्रोजेक्ट चल रहे हैं|

लेकिन लागत-लाभ के आधार पर किसी प्रोजेक्ट का मूल्यांकन कैसे हो सकता है|,बुलेट ट्रेन के प्रोजेक्ट की लागत तो मौटे तौर पर 1.1 लाख करोड है जिसका 80% तो हमें 0.1 फीसदी ब्याज पर मिल रहा हैं जो कि 50 साल में चुकाना होगा|अन्य सारी परियोजनाओं की तुलना में यह सस्ता प्रोजेक्ट है|

लेकिन इसके अन्य फायदे भी है जैसे-इससे मिलने वाली आमदनी,रोजगार और साथ ही साथ जापान जैसा दोस्त|

जापानी प्रधानमंत्री ने तो कहा कि यदि जापान का JA और इण्डिया का I मिल जाए तो जय बनता है जो विजय का प्रतीक है जिससे भारत जापान के बीच रणनीतिक भागीदारी बढ़ेगी|क्योकि अभी हमनें कुछ समय पहले चीन के ओ आर ओ बी प्रोजेक्ट व डोकलाम प्रकरण का सामना किया है|

बुलेट ट्रेन एक ऐसा प्रोजेक्ट है जो दुनिया को संदेश देता है कि भारत में बदलाव की रफ्तार जबरदस्त है,ऐसा संदेश न सिर्फ देश के प्रति धारणा बदलता है बल्कि ऐसा माहौल भी निर्मित करता है जिससे विदेशियों की नजर हम पर पडती है फिर चाहे वे निवेशक हो या पर्यटक|

बुलेट ट्रेन भारत में केवल रेल सेवा को ही सुधार नही देगी बल्कि भारत में बदलाव की प्रक्रिया को तेज कर देगी ताकि वह एक आधुनिक/विकसित देश के रूप में विश्व मंच पर उभर सके|

भारत के प्रमुख युद्ध

*1. हाईडेस्पीज का युद्ध (Battle of the Hydaspes) समय : 326 ई.पू.*
किसके बीच – सिकंदर और पंजाब के राजा पोरस के बीच हुआ, जिसमे सिकंदर की विजय हुई।

*2. कलिंग की लड़ाई (Kalinga War) समय : 261 ई.पू.*
किसके बीच – सम्राट अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया। युद्ध के रक्तपात को देखकर उसने युद्ध न करने की कसम खाई।

*3. सिंध की लड़ाई (समय : 712 ई.)*
किसके बीच – मोहम्मद कासिम ने अरबों की सत्ता स्थापित की।

*4. तराईन का प्रथम युद्ध (Battles of Tarain) समय : 1191 ई.*
किसके बीच – मोहम्मद गौरी और पृथ्वी राज चौहान के बीच हुआ, जिसमे चौहान की विजय हुई।

*5. तराईन का द्वितीय युद्ध (2nd Battles of Tarain) समय : 1192 ई.*
किसके बीच – मोहम्मद गौरी और पृथ्वी राज चौहान के बीच हुआ, जिसमे मोहम्मद गौरी की विजय हुई।

*6. चंदावर का युद्ध (Battle of Chandawar) समय : 1194 ई.*
किसके बीच – इसमें मुहम्मद गौरी ने कन्नौज के राजा जयचंद को हराया।

*7. पानीपत का प्रथम युद्ध (First Battle of Panipat ) समय : 1526 ई.*
किसके बीच – मुग़ल शासक बाबर और इब्राहीम लोधी के बीच।

*8. खानवा का युद्ध (Battle of Khanwa) समय : 1527 ई.*
किसके बीच – बाबर ने राणा सांगा को पराजित किया।

*9. घाघरा का युद्ध (Battle of Ghagra) समय : 1529 ई.*
किसके बीच – बाबर ने महमूद लोदी के नेतृत्व में अफगानों को हराया।

*10. चौसा का युद्ध (Battle of Chausal) समय : 1539 ई.*
किसके बीच – शेरशाह सूरी ने हुमायु को हराया

*11. कन्नौज /बिलग्राम का युद्ध (Battle of Kanauj or Billgram) समय : 1540 ई.*
किसके बीच – एकबार फिर से शेरशाह सूरी ने हुमायूँ को हराया व भारत छोड़ने पर मजबूर किया।

*12. पानीपत का द्वितीय युद्ध (Second Battle of Panipat) समय : 1556 ई.*
किसके बीच – अकबर और हेमू के बीच।

*13. तालीकोटा का युद्ध (Battle of Tallikota) समय : 1565 ई.*
किसके बीच – इस युद्ध से विजयनगर साम्राज्य का अंत हो गय।

*14. हल्दी घाटी का युद्ध (Battle of Haldighati) समय : 1576 ई.*
किसके बीच – अकबर और राणा प्रताप के बीच, इसमें राणा प्रताप की हार हुई।

*15. प्लासी का युद्ध (Battle of Plassey) समय : 1757 ई.*
किसके बीच – अंग्रेजो और सिराजुद्दौला के बीच, जिसमे अंग्रेजो की विजय हुई और भारत में अंग्रेजी शासन की नीव पड़ी।

*16. वांडीवाश का युद्ध (Battle of Wandiwash) समय : 1760 ई.*
किसके बीच – अंग्रेजो और फ्रांसीसियो के बीच, जिसमे फ्रांसीसियो की हार हुई।

*17. पानीपत का तृतीय युद्ध (Third Battle of Panipat) समय : 1761 ई.*
किसके बीच – अहमदशाह अब्दाली और मराठो के बीच, जिसमे फ्रांसीसियों की हार हुई।

*18. बक्सर का युद्ध (Battle of Buxar) समय : 1764 ई.*
किसके बीच – अंग्रेजो और शुजाउद्दौला, मीर कासिम एवं शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना के बीच, जिसमे अंग्रेजो की विजय हुई।

*19. प्रथम मैसूर युद्ध (समय : 1767-69 ई.)*
किसके बीच – हैदर अली और अंग्रेजो के बीच, जिसमे अंग्रेजो की हार हुई।

*20. द्वितीय मैसूर युद्ध (समय : 1780-84 ई.)*
किसके बीच – हैदर अली और अंग्रेजो के बीच, जो अनिर्णित छूटा।

*21. तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध (समय : 1790 ई.)*
किसके बीच – टीपू सुल्तान और अंग्रेजो के बीच लड़ाई संधि के द्वारा समाप्त हुई।

*22. चतुर्थ आंग्ल मैसूर युद्ध (समय : 1799 ई.)*
किसके बीच – टीपू सुल्तान और अंग्रेजो के बीच, टीपू की हार हुई और मैसूर शक्ति का पतन हुआ।

*23. चिलियान वाला युद्ध (समय : 1849 ई.)*
किसके बीच – ईस्ट इंडिया कंपनी और सिखों के बीच हुआ था जिसमे सिखों की हार हुई।

*24. भारत चीन सीमा युद्ध (समय : 1962 ई.)*
किसके बीच – चीनी सेना द्वारा भारत के सीमा क्षेत्रो पर आक्रमण। कुछ दिन तक युद्ध होने के बाद एकपक्षीय युद्ध विराम की घोषणा। भारत को अपनी सीमा के कुछ हिस्सों को छोड़ना पड़ा।

*25. भारत पाक युद्ध (Indo-Pakistani War) समय : 1965 ई.*
किसके बीच – भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध जिसमे पाकिस्तान की हार हुई। भारत पाकिस्तान के बीच शिमला समझौता हुआ।

*26. भारत पाक युद्ध (Indo-Pakistani War) समय : 1971 ई.*
किसके बीच – भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध जिसमे पाकिस्तान की हार हुई। फलस्वरूप बांग्लादेश एक स्वतन्त्र देश बना।

*27. कारगिल युद्ध (Kargil War) समय : 1999 ई.*
किसके बीच – जम्मू एवं कश्मीर के द्रास और कारगिल क्षेत्रो में पाकिस्तानी घुसपैठियों को लेकर हुए युद्ध में पुनः पाकिस्तान को हार का सामना करना पड़ा और भारतीयों को जीत मिली।

भारतीय लेखक

प्रमुख भारतीय लेखक एवं उनकी पुस्तके-

◆पंचतंत्र ~ विष्णु शर्मा

●प्रेमवाटिका ~ रसखान
●मृच्छकटिकम् ~ शूद्रक
●कामसूत्र् ~ वात्स्यायन
●दायभाग ~ जीमूतवाहन
●नेचुरल हिस्द्री ~ प्लिनी

●दशकुमारचरितम् ~ दण्डी
●अवंती सुन्दरी ~ दण्डी
●बुध्दचरितम् ~ अश्वघोष
●कादम्बरी् ~ बाणभटृ
●अमरकोष ~ अमर सिहं
●शाहनामा ~ फिरदौसी
●साहित्यलहरी ~ सुरदास
●सूरसागर ~ सुरदास
●हुमायूँनामा ~ गुलबदन बेगम

●नीति शतक ~ भर्तृहरि
●श्रृंगारशतक ~ भर्तृहरि
●वैरण्यशतक ~ भर्तृहरि
●हिन्दुइज्म ~ नीरद चन्द्र चौधरी

●पैसेज टू इंगलैंड ~ नीरद चन्द्र चौधरी

●अॉटोबायोग्राफी अॉफ ऐन अननोन इण्डियन ~ नीरद चन्द्र चौधरी

●कल्चर इन द वैनिटी वैग ~ नीरद चन्द्र चौधरी

●मुद्राराक्षस ~ विशाखदत्त

●अष्टाध्यायी ~ पाणिनी
●भगवत् गीता ~ वेदव्यास
●महाभारत ~ वेदव्यास
●मिताक्षरा ~ विज्ञानेश्वर

●राजतरंगिणी ~ कल्हण
●अर्थशास्त्र ~ चाणक्य
●कुमारसंभवम् ~ कालिदास
●रघुवंशम् ~ कालिदास
●अभिज्ञान शाकुन्तलम् ~ कालिदास

●गीतगोविन्द ~ जयदेव
●मालतीमाधव ~ भवभूति
●उत्तररामचरित ~ भवभूति
●पद्मावत् ~ मलिक मो. जायसी

●आईने अकबरी ~अबुल फजल
●अकबरनामा ~अबुल फजल
●बीजक ~ कबीरदास
●रमैनी ~ कबीरदास
●सबद ~ कबीरदास
●किताबुल हिन्द ~ अलबरूनी
●कुली ~ मुल्कराज आनन्द
●कानफैंशंस अॉफ ए लव ~मुल्कराज आनन्द

●द डेथ अॉफ ए हीरो~मुल्कराज आनन्द

●जजमेंट ~ कुलदीप नैयर
●डिस्टेंन्ट नेवर्स~ कुलदीप नैयर

●इण्डिया द क्रिटिकल इयर्स~ कुलदीप नैयर

●इन जेल ~ कुलदीप नैयर
●इण्डिया आफ्टर नेहरू ~कुलदीप नैयर

●बिटवीन द लाइन्स ~कुलदीप नैयर

●चित्रांगदा ~रविन्द्र नाथ टैगौर

●गीतांजली~रविन्द्र नाथ टैगौर

●विसर्जन ~रविन्द्र नाथ टैगौर

●गार्डनर ~रविन्द्र नाथ टैगौर

●हंग्री स्टोन्स ~रविन्द्र नाथ टैगौर

●गोरा ~ रविन्द्र नाथ टैगौर

●चाण्डालिका~ रविन्द्र नाथ टैगौर

●भारत-भारती ~ मैथलीशरण गुप्त

●डेथ अॉफ ए सिटी~ अमृता प्रीतम

●कागज ते कैनवास~ अमृता प्रीतम

●फोर्टी नाइन डेज~ अमृता प्रीतम

●इन्दिरा गाँधी रिटर्नस ~खुशवंत सिहं

●दिल्ली ~खुशवंत सिहं
●द कम्पनी अॉफ वीमैन ~ खुशवंत सिहं

●सखाराम बाइण्डर ~ विजय तेंदुलकर

●इंडियन फिलॉस्पी ~डॉ. एस. राधाकृष्णन

●इंटरनल इंडिया ~इंदिरा गाँधी

●कामयानी ~जयशंकर प्रसाद

●आँसू ~ जयशंकर प्रसाद
●लहर ~ जयशंकर प्रसाद
●लाइफ डिवाइन ~अरविन्द घोष

●ऐशेज अॉन गीता ~अरविन्द घोष

●अनामिका ~सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

●परिमल ~सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

●यामा ~ महादेवी वर्मा
●ए वाइस अॉफ फ्रिडम ~नयन तारा सहगल

●एरिया अॉफ डार्कनेस ~वी. एस. नायपॉल

●अग्निवीणा ~ काजी नजरुल इस्लाम

●डिवाइन लाइफ ~ शिवानंद
●गोदान ~ प्रेमचन्द्र
●गबन ~ प्रेमचन्द्र
●कर्मभूमि ~ प्रेमचन्द्र
●रंगभूमि ~ प्रेमचन्द्र
●अनटोल्ड स्टोरी ~बी. एम. कौल

●कन्फ्रन्डेशन विद पाकिस्तान ~बी. एम. कौल

●कितनी नावों में कितनी बार ~अज्ञेय

●गोल्डेन थेर्सहोल्ड ~सरोजिनी नायडू

●ब्रोकेन विंग्स ~सरोजिनी नायडू

●दादा कामरेड ~ यशपाल
●पल्लव ~ सुमित्रानन्दन पंत्त

●चिदम्बरा~ सुमित्रानन्दन पंत्त

●कुरूक्षेत्र ~रामधारी सिहं ‘दिनकर’

●उर्वशी ~रामधारी सिहं ‘दिनकर’

●द डार्क रूम ~आर. के. नारायण

●मालगुड़ी डेज ~आर. के. नारायण

●गाइड ~आर. के. नारायण
●माइ डेज ~आर. के. नारायण
●नेचर क्योर ~ मोरारजी देसाई

●चन्द्रकान्ता ~देवकीनन्दन खत्री

●देवदास ~शरतचन्द्र चटोपाध्याय

●चरित्रहीन ~शरतचन्द्र चटोपाध्याय…

शिक्षक दिवस: श्री राधा कृष्णन जी का परिचय

*🥀🍃🥀​डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्ण🥀🍃🥀*

*📍जन्म-*5 सितंबर 1888
*📍पिता का नाम-*वीरास्वामी
*📍माता का नाम-*सीताम्मा
*📍प्रारंभिक शिक्षा-*क्रिश्चन मिशनरी संस्था नॉर्थन मिशन स्कूल तिरुपति
*📍मैट्रिक स्तर की परीक्षा उत्तीर्ण-*1902 में
*📍विषय में विशेष योग्यता-* मनोविज्ञान ,इतिहास और गणित
*📍राधाकृष्णन ने m.a. पास किया-*दर्शनशास्त्र विषय में
*📍दर्शनशास्त्र के सहायक प्राध्यापक-*मद्रास रेजीडेंसी कॉलेज में 1916
*📍दर्शनशास्त्र से परिचय-* राधाकृष्ण के लेख और भाषण के माध्यम से
*📍मानक उपाधियां-*यूरोप और अमेरिका प्रवास के बाद
*📍पंडित जवाहरलाल नेहरू से प्रथम मुलाकात-*1928 में शीत ऋतु में (कोलकाता अधिवेशन के दौरान)
*📍मानचेस्टर विश्वविद्यालय द्वारा आमंत्रण-*व्याख्यान हेतु 1929 में
*📍आंध्र विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर-*1931 से 36 तक
*📍ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में प्राध्यापक-*1936 से 1952 तक
*📍जॉर्ज पंचम कॉलेज के प्रोफेसर के रूप में कार्य-*कोलकाता विश्वविद्यालय 1935 से 1941 तक
*📍1939 से 48 तक-*काशी हिंदू विश्वविद्यालय के चांसलर
*📍यूनेस्को में उपस्थिति-*1946 में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में
*📍संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य-*1947 से 49 तक
*📍राधाकृष्णन का उपराष्ट्रपति बनना-*1952 में सोवियत संघ से आने के बाद
उप राष्ट्रपति के रूप में
*📍राधाकृष्णन का पदभार-*राज्य सभा में अध्यक्ष
*📍शिक्षक दिवस-*श्रेष्ठ शिक्षकों को सम्मानित करना
*📍शिक्षक दिवस-*सर्वपल्ली राधाकृष्ण के जन्मदिन अर्थात 5 सितंबर को
*📍ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा सर की उपाधि-*1931 में
*📍भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित-*1954 में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद द्वारा
*📍भारत रत्न पुरस्कार-*दार्शनिक व शैक्षिक उपलब्धियों के लिए
*📍लगातार पांच सालो तक नोमिनेट हुए-*नोबेल पुरस्कार के लिए
*📍राधा कृष्ण का व्यक्तित्व-* महान शिक्षाविद ,महान दार्शनिक, महान वक्ता ,विचारक भारतीय संस्कृति के,वैज्ञानिक डॉक्टर
*📍विशेष उपलब्धि-*भारत को शिक्षा के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों तक ले जाना
*📍विशेष  रूचि-*अच्छी किताब पढ़ने की
*📍महात्मा गांधी से मुलाकात-*1915 में
*📍रविंद्रनाथ टैगोर से मुलाकात-*1918 में मैसूर में
*📍”रविंद्र नाथ टैगोर का दर्शन” शिर्षक पुस्तक-*डॉक्टर राधाकृष्णन द्वारा 1918 में प्रकाशित
*📍अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान-*”द रीन ऑफ रिलीजन  इन कंटेंपरेरी फिलॉस्फी पुस्तक से
*📍सोवियत संघ के विशिष्ट राजदूत-*सर्वपल्ली डॉक्टर राधाकृष्णन 1952
*📍उपराष्ट्रपति पद पर नियुक्त-*13मई1952 से 12मई 1962
*📍राष्ट्रपति पद पर  निर्वाचित-*13मई 1962 में राजेंद्र प्रसाद के बाद(13मई1967)
*📍डॉक्टर सर्वपल्ली राष्ट्रपति पद पर ताजपोशी-*13 मई 1962 को 31 तोपों की सलामी के साथ
*📍डॉक्टर राधाकृष्णन का पहनावा-*सफेद कपड़े और दक्षिण भारतीय पगड़ी
*📍नाईट बेचलर की उपाधि लौटाई-*आजादी के बाद
*📍5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाने की शुरुआत-*1962 से
*📍साहित्य अकादमी फेलोशिप-*1968 में (डॉक्टर राधाकृष्ण इसे पाने वाले पहले व्यक्ति थे)
*📍टेम्प्लेटो प्राइस-*1975 (मरणोपरांत)
*📍ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा स्कॉलरशिप की शुरुआत-*1989 डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के नाम से
*📍मृत्यु-*17 अप्रैल 1975(88वर्ष) को
*📍डॉक्टर राधाकृष्णन की जीवनी का प्रकाशन-*1989 में उनके पुत्र डॉक्टर एस गोयल द्वारा
*📍विशेष उपलब्धि-*भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति ,भारत के द्वितीय राष्ट्रपति, गैर राजनीतिक के होते हुए भी संविधान सभा क सदस्य, नोबेल पुरस्कार के लिए 5 बार चयन

 

*🥀🍃🥀डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म🥀🍃🥀*

*🍁दक्षिण भारत के तिरुतनी* नामक स्थान में हुआ था यह स्थान *चेन्नई से 64 किलोमीटर उत्तर पूर्व में* स्थित है

*🍁इनका *जन्म 5 सितंबर 1888* को हुआ था जिस परिवार में *इन्होने जन्म लिया वह एक ब्राह्मण परिवार* था और *इनका जन्म स्थान भी एक पवित्र तीर्थ स्थल के रूप में विख्यात है*

*🍁राधा कृष्ण के पुरखे पहले कभी सर्वपल्ली नामक ग्राम*में रहते थे और *18वीं शताब्दी के मध्य उन्होंने तिरुतनी ग्राम*की ओर निष्क्रमण किया था

🍁लेकिन *उनके पूर्वज चाहते थे कि उनके नाम के साथ उनके जन्म स्थल के ग्राम का बोध* भी सदेव रहे इसी कारण *उनके परिजन अपने नाम के पूर्व सर्व्पल्ली* लगाते हैं

🍁डॉक्टर राधाकृष्णन एक गरीब लेकिन *विद्वान ब्राम्हण* की संतान थे उनके *पिता का नाम सर्वपल्ली वीरास्वामी और माता का नाम सीताम्मा* था

*🍁इनके पिता राजस्व विभाग में कार्य करते थे इनके पिता के ऊपर बहुत बड़े परिवार के भरण-पोषण* का दायित्व था

*🍁वीरा स्वामी के 5 पुत्र और एक पुत्री* थी जिसमें *राधाकृष्णन का स्थान दूसरे नंबर के पुत्र*पर था इनके *पिता काफी कठिनाइयो के साथ परिवार का निर्वहन* कर रहे थे

🍁इस कारण *बालक राधाकृष्णन का बचपन में कोई विशेष सुख प्राप्त नहीं*किया

 

*🥀🍃🥀राजनीति में आने से पूर्व डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जीवन🥀🍃🥀*

🍁डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत *एक प्रख्यात शिक्षाविद्,  महान दार्शनिक, उत्कृष्ट वक्ता और एक आस्थावान हिंदू विचारक*थे
🍁डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन *राजनीति में आने से पूर्व उन्होंने अपने जीवन के महत्वपूर्ण 40 वर्ष शिक्षक के रुप* में बिताए थे

🍁डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन में *एक आदर्श शिक्षक के सभी गुण* मौजूद थे *डॉक्टर राधाकृष्णन समस्त विश्व को एक शिक्षालय* मानते थे

🍁उनकी मान्यता थी कि *शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का शुद्ध उपयोग* किया जा सकता है इसीलिए *समस्त विश्व को एक इकाई समझकर ही शिक्षा का प्रबंधन* किया जाना चाहिए

🍁एक बार *ब्रिटेन के एडिनबरा विश्वविद्यालय में भाषण* देते हुए उन्होंने कहा था कि *मानव की जाति एक* होनी चाहिए *मानव इतिहास का संपूर्ण लक्ष्य मानव जाति की मुक्ति है और यह तभी संभव हो सकता है जब समस्त देशों की नीतियों का आधार विश्व शांति की स्थापना* का प्रयत्न करना हो

🍁सर्वपल्ली राधाकृष्णन अपनी *बुद्धिमतापूर्ण व्याख्याओं ,आनंदमय अभिव्यक्तियों और हंसाने वाली कहानियों से अपने छात्रों को मंत्रमुग्ध*कर दिया करते थे

🍁वह छात्रों को  *उच्च नैतिक मूल्यों का आचरण करने के लिए प्रेरित* करते थे वह जिस विषय को पढ़ाते थे *उसे पढ़ाने से पहले स्वयं अध्ययन* करते थे *दर्शन शास्त्र जैसे  गंभीर विषय को भी वह अपनी शैली की नवीनता से सरल और रोचक* बना देते थे

 

*🥀🍃🥀शिक्षा के क्षेत्र में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का योगदान🥀🍃🥀*

*🍁शिक्षा के क्षेत्र में डॉक्टर राधाकृष्णन ने जो अमूल्य योगदान दिया वह निश्चित अविस्मरणीय* है वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे *वह एक जाने माने विद्वान शिक्षक, वक्ता ,प्रशासक, राजनीयक, देशभक्त और शिक्षा शास्त्रीय*थे

🍁अपने जीवन के *उत्तरार्ध में अनेक उच्च पदों पर काम करते हुए भी शिक्षा के क्षेत्र में सतत योगदान* करते रहे
उनकी मान्यता थी कि *यदि सही तरीके से शिक्षा की जाए तो समाज की अनेक बुराइयों को मिटाया* जा सकता है

🍁डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का कहना था कि *केवल जानकारी देने से शिक्षा नहीं होती बल्कि जानकारी का अपना महत्व है और आधुनिक युग में तकनीकी जानकारी महत्वपूर्ण विधि है*

*🍁व्यक्ति के बौद्धिक झुकाव और उसकी लोकतांत्रिक भावना का भी शिक्षा में बड़ा* महत्व है यह सभी बातें *व्यक्ति को उत्तरदायी नागरिक* बनाती है

*🍁शिक्षा का लक्ष्य है ज्ञान के प्रति समर्पण की भावना और निरंतर सीखने की प्रवृत्ति* यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो *व्यक्ति को ज्ञान और कौशल दोनों प्रदान* करती है

🍁इन सभी का *जीवन में उपयोग करने का मार्ग प्रशस्त करती है करुणा प्रेम और श्रेष्ठ परंपराओं का विकास* भी शिक्षा के उद्देश्य है

*🍁डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन कहते हैं जब तक शिक्षक शिक्षा के प्रति समर्पित और प्रतिबंध* नहीं होगा और *शिक्षा को एक मिशन* नहीं मानेगा तब तक *अच्छी शिक्षा की कल्पना*नहीं की जा सकती है

*🍁डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का कहना था कि शिक्षक*उन्हीं लोगों को बनाया जाना चाहिए जो *सबसे अधिक बुद्धिमान हो शिक्षक को मात अच्छी तरह अध्यापन करके ही संतुष्ट नहीं* हो जाना चाहिए बल्कि उसे *अपने छात्रों का स्नेह और आदर भी अर्जित* करना चाहिए

*🍁सम्मान शिक्षक होने भर से नहीं मिलता उसे अर्जित* करना पड़ता है

 

*🥀🍃🥀शिक्षक दिवस की शुरुआत🥀🍃🥀*
*🍁शिक्षक दिवस की शुरुआत डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन पर देश के दूसरे राष्ट्रपति बनने के समय 1962* में की गई थी

*🍁हमारे देश के पूर्व और द्वितीय राष्ट्रपति डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती प्रतिवर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस* के रूप में मनाई जाती है

🍁इन दिनों जब *शिक्षा की गुणात्मकता का हास होता जा रहा है और गुरू शिष्य संबंधों की पवित्रता को ग्रहण* लगता जा रहा है

*🍁डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का पुण्यस्मरण फिर एक नई चेतना पैदा* कर सकता है

*🍁सन 1962 में जब डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन हमारे देश के दूसरे राष्ट्रपति* बने थे तब कुछ *शिष्य और प्रशंसक उनके पास गए उन्होंने डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन से निवेदन किया कि वह उनके जन्मदिन को शिक्षक दिवस* के रूप में मनाना चाहते हैं

🍁उन्होंने कहा *मेरे जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रुप में मनाने से निश्चित ही में अपने को  गौरवान्वित अनुभव*करुंगा तब से आज तक *5 सितंबर सारे देश में उनका जन्मदिन शिक्षक दिवस के रुप में मनाया* जा रहा है

*🍁डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपना जन्मदिन अपने व्यक्तिगत नाम से नहीं बल्कि संपूर्ण शिक्षक बिरादरी को सम्मानित* किए जाने के *उद्देश्य से शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की इच्छा व्यक्त* की थी

 

*🥀🍃🥀डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन को प्राप्त मानक उपाधियां, सम्मान और देश के महान विचारकों से मुलाकात🥀🍃🥀*

🌺🎍🌺✨✨✨✨🌺🎂🌺

*🌹”””मौत कभी अंत या बाधा नहीं है बल्कि अधिक से अधिक नए कदमों की शुरुआत है””🌹*

🍁ऐसे *सकारात्मक विचारों को जीवन में अपनाने वाले असीम प्रतिभा के धनी डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन को पुरस्कारों और उपाधियों से सम्मानित* किया गया है

*🍁डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन व्यक्तित्व के धनी थे उनका स्वभाव हंसमुखी दूसरों की मदद करना और अपने विद्यार्थियों में नैतिक गुणों का विकास* करने जैसा था

🍁डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के कार्य *उनके अमूल्य विचार प्रतिभा के धनी और देश को  शिक्षा के क्षेत्र में एक नई पहचान दिलाने वाले डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन को उनके जीवन्तकाल और मरणोपरांत गई उपाधियों और सम्मान से सम्मानित* किया गया है

*🍁डॉक्टर राधाकृष्णन यूरोप और अमेरिका प्रवास से भारत लौटे तो यहां की विभिन्न विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद उपाधि प्रदान कर उनकी विद्वता का सम्मान* किया

*🍁1929 में इन्हें व्याख्यान देने हेतु मानचेस्टर विश्वविद्यालय द्वारा आमंत्रित* किया

 

*🍁1932 में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन को नाइट बेचलर/ सर की उपाधि* दी गई थी *जिसे इन्होने आजादी के बाद लौटा* दिया था

*🍁1931 में इन्हें फेलो ऑफ द ब्रिटिश एकेडमी*

*🍁1954 में इन्है इनके कार्यों के लिए भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित* किया गया

*🍁1954 में इन्हें जर्मन ऑर्डर पौर मेरिट फॉर आर्ट्स एंड साइंस सम्मान* से सम्मानित किया गया

*🍁1961 में पीस प्राइज ऑफ थे जर्मन बुक ट्रेड से 1962 में इन के जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत* की गयी

*🍁1963 में ब्रिटिश ऑर्डर ऑफ मेरिट सम्मान*

*🍁1968 में साहित्य अकादमी फेलोशिप(डॉक्टर राधाकृष्णन इसे पाने वाले पहले व्यक्ति थे)*

*🍁1975 में टेम्पल्टों ऑफ प्राइज़ (मरणोपरांत) 1989 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा इनके नाम से स्कॉलरशिप* की शुरुआत की गई

 

*🥀🍃🥀भारतीय नेताओं से मुलाकात और उनका जीवन पर प्रभाव🥀🍃🥀*

*🍁डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन 1915 में महात्मा गांधी जी से मिले उनके विचारों से प्रभावित होकर राधाकृष्णन ने राष्ट्रीय आंदोलन* के समर्थन में अनेक लेख लिखें

*🍁1918 में रविंद्र नाथ टैगोर से मिले रविंद्र नाथ टैगोर ने इन्हें बहुत प्रभावित* किया यही कारण था कि *इनकी विचारों की अभिव्यक्ति हेतु डॉक्टर राधाकृष्णन ने 1918 में रविंद्रनाथ टैगोर का दर्शन शीर्षक से एक पुस्तक* प्रकाशित की

*🍁डॉक्टर राधाकृष्णन किताबों को बहुत अधिक महत्व* देते थे उनका मानना था कि *पुस्तके वह साधन है जिनके माध्यम से हम विभिन्न संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण* कर सकते हैं

*🍁राधाकृष्णन द्वारा लिखी उनकी किताब द मीन ऑफ रिलीजन इन कंटेंपरेरी फिल्म सिटी से उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर* पर पहचान मिली

*🍁डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन 1928 की शीत ऋतु में पंडित जवाहरलाल नेहरू* से मिले थे उनकी *यह प्रथम मुलाकात* थी

*🍁पंडित जवाहरलाल नेहरु कांग्रेस पार्टी के वार्षिक अधिवेशन में सम्मिलित* होने के लिए आए थे

*🍁यद्यपि सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारतीय शैक्षिक सेवा के सदस्य* होने के कारण किसी भी *राजनीतिक संभाषण में हिस्सेदारी नहीं*कर सकते थे लेकिन *उन्होंने अपने इस पद की कोई परवाह नहीं*की और भाषण दिया

 

*🥀🍃🥀डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का विद्यार्थी जीवन और कार्यकाल🥀🍃🥀*

*🍁डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने जिस परिवार में जन्म लिया था उस परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं* थी लेकिन *वह शुरू से ही ज्ञानी और मेघावी* छात्र थे

🍁उन्हें *बचपन से ही किताबें पढ़ने का अत्याधिक शौक और रुचि* थी *राधाकृष्णन शुरू से ही पढ़ाई लिखाई में काफी रुचि* रखते थे

*🍁राधाकृष्णन का बचपन तिरुतनी और तिरुपति जैसे धार्मिक स्थलों*पर ही व्यतीत हुआ उन्होंने *अपने प्रथम 8 वर्ष तिरुतनी* में ही गुजारे थे

*🍁राधाकृष्णन का परिवार धार्मिक भावनाओं से संपूर्ण* था लेकिन इसके बावजूद *उन्होंने राधाकृष्णन को प्रारंभिक शिक्षा के लिए क्रिश्चन मिशनरी संस्था लुर्थन मिशनरी स्कूल तिरुपति में अध्ययन* के लिए भेजा

🍁इसके पश्चात *अगले 4 वर्षों के लिए इन्हें वेलूर में शिक्षा ग्रहण* करने हेतु भेजा गया इसके बाद की *शिक्षा मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में पूरी* हुई

🍁स्कूल के दिनों में ही *डॉक्टर राधाकृष्ण ने बाइबल के महत्वपूर्ण अंश कंठस्थ याद* कर लिए थे जिसके लिए *उन्हें विशिष्ट योग्यता का सम्मान* दिया गया

🍁राधाकृष्णन ने कम उम्र में ही *अपने स्वामी विवेकानंद और वीर सावरकर को पढ़* लिया था और *इनके विचारों को आत्मसात* किया

*🍁डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने 1902 में मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी* से पास की ओर *छात्रवृत्ति प्राप्त की क्रिश्चियन कॉलेज मद्रास ने भी राधाकृष्णन की विशेष योग्यता के कारण इन्हें छात्रवृत्ति* प्रदान की

*🍁1904 में डॉक्टर राधाकृष्णन ने कला संकाय परीक्षा में प्रथम श्रेणी*में प्राप्त की *इन्हें मनोविज्ञान इतिहास और गणित विषय में विशेष योग्यता की टिप्पणी* भी उच्च प्राप्तांकों के कारण मिली थी

*🍁डॉक्टर राधाकृष्णन ने 1916 में दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर* किया और *मद्रास रेजीडेंसी कॉलेज में दर्शनशास्त्र विषय के सहायक प्राध्यापक* का पद पर कार्य किया

 

*🥀🍃🥀व्यवसायिक कार्य🥀🍃🥀*

*🍁मद्रास रेसीडेंसी  कॉलेज* में वह प्राध्यापक भी रहे *राधाकृष्णन ने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से विश्व को भारतीय दर्शनशास्त्र*से परिचित कराया

*🍁डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के लेखक की प्रशंसा पूरे विश्व में की गई 1931 से 1936 तक आंध्र विश्वविद्यालय* के यह वाइस चांसलर रहे

🍁इसके पश्चात *डॉक्टर राधाकृष्णन ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में 1936 से 1952 तक प्राध्यापक बने कलकत्ता विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने वाले जॉर्ज पंचम कॉलेज के प्रोफेसर के रूप में इन्होंने 1935 से 1941* तक का कार्य किया

*🍁1939 से 1948 तक काशी हिंदू विश्वविद्यालय के चांसलर* भी बने इसके पश्चात *1953 से 1962 तक डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन दिल्ली विश्वविद्यालय के चांसलर* रहे

🍁इसी दौरान *डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन को सोवियत संघ के विशिष्ट राजदूत और भारत का उप राष्ट्रपति पद के लिए निर्वाचित* किया गया था

🍁यह सब *डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की प्रतिमा* का ही असर था कि उन्हें *स्वतंत्रता के बाद संविधान निर्मात्री  सभा का सदस्य बनाया गया 1964 में यूनेस्को में भारतीय प्रतिनिधि* के रूप में इन्हें नियुक्त किया गया

 

 

*🥀🍃🥀राधाकृष्णन का राजनीतिक जीवन और राजनयिक कार्य🥀🍃🥀*

*🍁डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की असीम प्रतिभा और उत्कृष्ट कार्य के कारण ही स्वतंत्रता के बाद उन्हें संविधान निर्मात्री सभा का सदस्य* बनाया गया

*🍁डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन 1947 से 1949 तक संविधान निर्मात्री सभा* के सदस्य रहे इसी समय *डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन कई विद्यालय विश्वविद्यालयों के चेयरमैन* भी नियुक्त किए गए

🍁भारतीय कांग्रेसजन चाहते थे कि *सर्वपल्ली राधाकृष्णन के गैर राजनीतिक व्यक्ति* होते हुए भी इस *संविधान सभा के सदस्य*बनाया जाए

*🍁पंडित जवाहरलाल नेहरु चाहते थे कि राधाकृष्णन के संभाषण और वक्तृव्य प्रतिभा का उपयोग 14-15 अगस्त 1947 की रात्रि को उस समय किया जाए जब संविधान सभा का ऐतिहासिक सत्र आयोजित* हो

🍁राधाकृष्णन को निर्देश दिया गया है कि *वह अपना संबोधन  रात्रि को ठीक 12:00 बजे समाप्त करें इसी के पश्चात पंडित जवाहरलाल नेहरु जी के नेतृत्व में संवैधानिक संसद द्वारा शपथ* ली जानी थी

🍁इस संबोधन के बारे में *डॉक्टर राधाकृष्णन और पंडित जवाहरलाल नेहरू के अलावा किसी को भी नहीं पता* था आजादी के बाद उनसे *आग्रह किया गया कि वह मातृभूमि की सेवा के लिए विशिष्ट राजदूत* के रूप में *सोवियत संघ के साथ राजनियक कार्य*की पूर्ति करें

🍁इस प्रकार *विजयलक्ष्मी पंडित का डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन को नया उत्तराधिकारी* चुना गया

*🍁पंडित जवाहरलाल नेहरू के चयन पर कई व्यक्तियों*ने आश्चर्य व्यक्त किया कि *एक दर्शनशास्त्री को राजनीतिक सेवाओं*के लिए *क्यों चुना गया उन्हें संदेह* था कि *डाक्टर राधा कृष्ण की योग्यताए*सौंपी गई

*🍁जिम्मेदारी के अनुकूल नहीं है लेकिन बाद में सर्वपल्ली राधाकृष्ण ने साबित* किया कि *मास्को में नियुक्ति भारतीय राजनीतिज्ञ* में सबसे बेहतर थे

*🍁डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ना तो राजनीतिक क्षेत्र में और ना शिक्षक जगत* में नियमों से बंधे हुए नहीं थे

*🍁1952 में सोवियत संघ से आने के बाद डॉक्टर राधाकृष्णन को उपराष्ट्रपति* निर्वाचित किया गया *संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति का नया पद सर्जित* किया गया

*🍁जवाहरलाल नेहरू ने इस पद हेतु राधा कृष्ण का चयन करके पुनः लोगों को चौंका* दिया सभी को *आश्चर्य था कि इस पद के लिए कांग्रेस पार्टी के किसी राजनीति्ञ*का चुनाव क्यों नहीं किया गया

*🍁उप राष्ट्रपति के रूप में राधा कृष्णन ने राज्यसभा में अध्यक्ष का पदभार* संभाला

*🍁सन 1952 में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन को भारत का प्रथम उपराष्ट्रपति* बनाया गया *डॉक्टर राधाकृष्णन ने पंडित जवाहरलाल नेहरू के चयन को सही साबित* किया

🍁क्योंकि *उपराष्ट्रपति के रूप में एक गैर राजनीतिक व्यक्ति ने सभी राजनीतिज्ञ*को प्रभावित किया था *डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन उपराष्ट्रपति के पद पर 13 मई 1952 से 12 मई 1962 तक कार्यरत* रहे

🍁जब *1962 में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद का राष्ट्रपति के रूप में कार्यकाल समाप्त* होने वाला था *उसके पश्चात डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन को राष्ट्रपति का पद* दिया गया

*🍁डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन देश के दूसरे राष्ट्रपति के रूप में 13 मई 1962 को नियुक्त*किए गए डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के *राष्ट्रपति बनने पर उन्हें 31 तोपों की सलामी के साथ राष्ट्रपति के पद* पर बिठाया गया

*🍁डॉक्टर राधाकृष्णन का राष्ट्रपति के रूप में कार्यकाल 13 मई 1962 से 12 मई 1967 तक* का था

🍁डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के *राष्ट्रपति बनने पर प्रसिद्ध दार्शनिक बर्टेड रसेल ने कहा था– *कि “”यह विश्व के दर्शनशास्त्र का सम्मान है की महान भारतीय गणराज्य मैं डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्ण को राष्ट्रपति के रुप में चुना और एक दार्शनिक होने के नाते में विशेषत: खुश हु”*

*🍁प्लेटो ने कहा था की–दार्शनिक को राजा होना चाहिए और महान भारतीय गणराज्य ने एक दार्शनिक को राष्ट्रपति बनाकर प्लेटो को सच्ची श्रद्धांजलि* अर्पित की है

 

*🥀🍃🥀डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की नजरों में गुरु शिष्य का संबंध🥀🍃🥀*

🍁डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन *पूरी दुनिया को एक ही विद्यालय के रूप*में देखते थे उनका विचार था कि *शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सही उपयोग* किया जा सकता है *अतः विश्व को एक ही इकाई मानकर शिक्षा का प्रबंधन* करना चाहिए

*🍁विश्व की अनूठी परंपरा के प्रवर्तक डॉक्टर राधाकृष्णन अपने विद्यार्थियों का स्वागत हाथ मिलाकर* करते थे वह अपने *विद्यार्थियों को जीवन में उच्च नेतिक कर्तव्य को करने के विचार प्रसारित* करते रहते थे

*🍁मैसूर में कोलकाता आते वक्त मैसूर स्टेशन पर डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जय जयकार* से गूंज उठा था

🍁यह वह पल था *जब हर किसी की आंखे उन की विदाई पर नम थी उनका व्यक्तित्व प्रवाह केवल छात्र-छात्राओं पर ही नहीं बल्कि देश विदेश के अनेक प्रबुद्ध लोगो*पर भी पड़ा

*🍁रूसी नेता स्टालिन के हृदय में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के प्रति* बहुत सम्मान था

*🍁बच्चों को भी इस महान शिक्षक से विशेष लगाव था इसी कारण राष्ट्रपति बनने के कुछ समय बाद विद्यार्थियों द्वारा उनके जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की इच्छा जाहिर*की गई थी

🍁डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन *बच्चों की शिक्षा के प्रति कोई समझौता* नहीं करते थे *वह बच्चों को वही शिक्षा देना चाहते थे जो उनके जीवन को बेहतर* बना सके

*🍁विद्यार्थियों के समय को वह विद्यार्थियों के अध्ययन कार्य*में ही लगाते थे

*🍁एक अच्छा शिक्षक वही हो सकता है जो अपने छात्रों का भविष्य उज्जवल* बना सके और *उसे सही दिशा में एक अच्छा ज्ञान प्राप्त* कर सके

 

*🥀🍃🥀डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जीवनी🥀🍃🥀*

*🍁डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जीवनी को उनके पुत्र डॉक्टर एस. गोपाल ने 1989 में प्रकाशित* किया

🍁इससे पूर्व *डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जीवन की घटनाओं के संबंध में किसी को भी अधिक जानकारी नहीं* थी

*🍁लेकिन बाद में स्वयं उनके पुत्र ने ही माना कि उनकी पिता की व्यक्तिगत जिंदगी के विषय* में लिखना एक बड़ी चुनौती थी और *एक नाजुक मामला* था

🍁लेकिन *डॉक्टर एस गोपाल ने पिता के साथ अपने संबंधों को भी जीवन में रेखांकित* किय

*🍁1952 में न्युयार्क में लाइब्रेरी ऑफ लिविंग फिलॉसफर के नाम से एक श्रृंखला  दी गई है जिसमें सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बारे में अधिकारिक रूप* से लिखा गया था

*🍁राधाकृष्णन ने उस में दर्ज जानकारी का कभी Khandan* नहीं किया

*🍁मार्च 1975 में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन को टेंपलटन पुरस्कार* से सम्मानित किया गया *जोकि धर्म के क्षेत्र में उत्थान के लिए प्रदान किया*जाता है

🍁इस *पुरस्कार को ग्रहण करने वाले डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के ईसाई संप्रदाय* के व्यक्ति थे

 

 

 

*🥀🍃🥀डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की मृत्यु🥀🍃🥀*

*””“मौत कभी अंत या बाधा नहीं है बल्कि अधिक से अधिक नए कदमो की शुरुआत है।”””*

 

*ऐसे सकारात्मक विचारों को जीवन में अपनाने वाले असीम प्रतिभा का धनी सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन लम्बी बीमारी के बाद 17 अप्रैल, 1975 को प्रातःकाल इहलोक* लोक छोङकर परलोक सिधार गये।

*देश के लिए यह अपूर्णीय* क्षति थी। परंतु अपने समय के *महान दार्शनिक तथा शिक्षाविद् के रूप में वे आज भी अमर* हैं।

*शिक्षा को मानव व समाज का सबसे बड़ा आधार मानने* वाले डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन का *शैक्षिक जगत में अविस्मरणीय व अतुलनीय योगदान सदैव अविस्मरणीय* रहेगा। उनके *अमुल्य विचार के साथ अपनी कलम को यहीं विराम* देते हैं।

 

 

अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस

नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में 51वां अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाया गया. यह दिवस पूरे विश्व में मनाया जाता है जिसके तहत विभिन्न जागरुकता कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं.

अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस प्रतिवर्ष 08 सितंबर को पूरे विश्व में मनाया जाता है. इसके तहत यूनेस्को द्वारा घोषित विषय ‘डिजिटल दुनिया में साक्षरता’ के अंतर्गत कार्यक्रम आयोजित किया गया. इस कार्यक्रम में गणमान्य व्यक्तियों को सम्मानित किया गया. भारत में साक्षरता के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले राज्यों, जिलों, ग्राम पंचायतों तथा गैर-सरकारी संगठनों को साक्षर भारत पुरस्कार प्रदान किए गये.

राष्ट्रीय साक्षरता मिशन प्राधिकरण वर्ष 1988 से अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाता है. स्वतंत्रता के बाद से निरक्षरता समाप्त करना भारत सरकार के लिए प्रमुख चिंता का विषय रहा है. अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस के अवसर पर निरक्षरता समाप्त करने के लिए जन जागरुकता को बढ़ावा और प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रमों के पक्ष में वातावरण तैयार किया जाता है.

वर्ष 1996 से इस कार्यक्रम को अधिक प्रभावी बनाने के लिए कुछ नए अवयव जोड़े गए हैं. वर्ष 1996 में कार्यक्रम ‘मशाल मार्च’ का आयोजन किया गया था जिसमें स्कूली छात्र और साक्षरता कार्यकर्ता शामिल हुए थे. इसके बाद के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाने के लिए राज्य साक्षरता मिशन प्राधिकरण (एसएलएमए) द्वारा साक्षरता कार्यकर्ताओं के लिए राज्य स्तर पर प्रतियोगिताएं (रंगोली, ड्राइंग आदि), जेएसएस उत्पादों (केआरआईटीआई) की प्रदर्शनी, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, संगोष्ठी, और सांस्कृ्तिक कार्यक्रमों जैसी कई गतिविधियां शामिल की गई हैं.

मानव शरीर और उसके मुख्य अंग Human body and its main organ

  1. नेत्र(Eye)

दृष्टि वह संवेदन है जिस पर प्रत्येक मनुष्य निर्भर रहता है, नेत्र शरीर का एक अमूल्य अवयव है|  नेत्रों  के द्वारा ही हमें वस्तु का दृष्टि ज्ञान होता है|  इसका निर्माण अत्यंत कोमल तंतुओं से होता है परंतु इसकी रचना जटिल एवं कार्य संषिष्ट है|

प्रत्येक नेत्र की रचना गोलीका आकार की होती है इसीलिए इसे अक्षीगोलक(Eye ball) कहते हैं| अक्षीगोलक एक गड्डे में स्थित रहता है, इसे नेत्र गुहा कहते हैं|  इसी गड्डे में नेत्र को सुरक्षा मिलती है|  नेत्र गोलक का व्यास 2.5 से.मी. होता है| नेत्र गुहा शंकु(Orbital cavity) रूप में होती है| दृष्टि तंत्रिका (Optic nerve)  तथा मस्तिष्क में स्थित दृष्टि केंद्र (Visual centes) कुछ नेत्र उपांग भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है|

नेत्र उपांग(Appendage of the Eye)

  1. भौह
  2. नेत्र श्लेष्मा पलकें
  3. नेत्र पक्षन
  4. नेत्र श्लेष्मा
  5. अश्रु उपकरण
  6. पेशियां
  7. कर्ण(Ear)

कर्ण शरीर का संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है, यह शरीर का आवश्यक अंग है| इससे किसी भी ध्वनि का बोध होता है| कर्ण द्वारा सुनने की क्रिया आठ वीं कपाल तंत्रिका, श्रवण तंत्रिका की सहायता से सम्पन्न होती है| कर्ण के मुख्य तीन भाग होते हैं|

बाह्यकर्ण

मध्यकर्ण

अन्तःकर्ण

a.बाह्यकर्ण(Outer Ear)

बाह्यकर्ण के दो स्पष्ट भाग होते हैं,पहला कर्ण पाली एवं दूसरा भाग कर्ण कुहर| जिसमें कर्ण पली बाहर की ओर स्थित है यह भाग अर्धचंद्राकार दिखाई देता है इसी का ऊपरी भाग पितप्रतयावसा उपस्थिति का बना होता है| कर्ण पाली का मुख्य कार्य ध्वनि को उत्पन्न तरंगों को एकत्रित करके आगे कान के भीतर भेजना है|बाह्य कर्ण का दूसरा भाग बाह्य क्छुर को कान की नली भी कहा जाता है यह नली लगभग 1 इंच लंबी होती है| नली का मार्ग सीधा नहीं बल्कि घुमावदार होता है रचना की दृष्टि से बाह्य कर्ण कुहर के दो भाग होते है| एक तिहाई भाग कार्टिलेज तथा भीतरी दो तिहाई भाग अस्थि निर्मित होता है| बाह्य कर्ण कुहर की त्वचा में विशेष प्रकार की ग्रंथि होती है जिसे कर्णमल संधि कहते हैं| इस ग्रंथि से पीला, चिकना पदार्थ स्रावित होता है जो बाह्य को चिकना रखता है|

बाह्य कर्ण कुहर पर छोटे छोटे रोम होते हैं जो बाहरी धूल के कण आदि को अंदर जाने से रोकते हैं| बाह्य कर्ण के दोनों भाग का कार्य न केवल ध्वनि तरंगों को एकत्रित करना है बल्कि उन्हें पारेषित करके आगे बढ़ाना भी है|

b.मध्यकर्ण (Middle Ear)

यह भाग अनियमित टेड़े आकार की गुहा है| मध्य कर्ण एक झिल्ली कृत पर्दे, कर्ण पटल के द्वारा बाह्य कर्ण से पृथक रहता है| जिस स्थान पर कर्ण पटल स्थित है वहीं से मध्य कर्ण का आरंभ होता है| वास्तव में मध्य कर्ण एक शंकरा आयताकार बॉक्स के समान है जिसकी अग्र मध्य पश्च भित्तियां होती हैं|

मध्य कर्ण की अग्र और पश्च भित्तियों में छिद्र हैं| अग्रभित्ति में कर्ण पटल के बिल्कुल समीप एक छिद्र होता है यह छिद्र नलिका का मुख्य द्वार है यह नलिका कंठ कर्ण नली कहलाती है| इस नलिका के द्वारा कान का संबंध नासा ग्रसनी गुहा से रहता है पश्चभित्ति का कण से संबंध शंखास्थी की कर्णमूल पदार्थ में स्थित कर्णमूल कोटर तथा करण मूल वायु सेल से रहता है मध्य कर्ण में तीन छोटी अस्थियां होती है जो कर्णास्थिका कहलाती है| संपूर्ण मध्य कर्ण गुहा श्लैष्मिक कला अस्तर से ढका रहता है| तीनों छोटी हस्तियां एक श्रृंखला के रूप में स्थित होती है जो निम्न है| मुग्दरक, घूर्णक, बलयक

  1. जिव्हा(Tongue)

जीव्हा मुख्यत: स्वाद ज्ञानकेंद्रीय है|  जिव्हा वस्तु के स्वाद का अनुभव कराती है|  जिसके आधार पर उसके उपयोग किए जाने या न किए जाने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया जाता है|  स्वाद रासायनिक संवेदना है जो स्वाद संग्राहक अंगों को उत्तेजित करते हैं|  प्रत्येक वस्तु में रासायनिक तत्व भिन्न भिन्न होने के कारण उनके स्वाद में विभिन्नता पाई जाती है|

किसी वस्तु के स्वाद को जानने के लिए वस्तु का स्वादेंद्रियों को सीधे संपर्क में आना होता है स्वाद का पता भोजन की तरल अवस्था में ही चलता है| भोजन का कुछ अंश लार में घुल जाता है| लार में घुला हुआ यह भोजन स्वाद कलिकाओं को क्रियाशील कर देता है खाद्य पदार्थ द्वारा एक रासायनिक क्रिया होती है जिसके फलस्वरुप तंत्रिका आवेग पैदा हो जाता है| ये आवेश मस्तिष्क के स्वाद केंद्र तक पहुंचते हैं और स्वाद का अनुभव देने लगते हैं किसी वस्तु का स्वाद जानने के लिए उसे घुलनशील होना अनिवार्य है| जीवा पर रखी हुई ठोस वस्तु का स्वाद अस्पष्ट होता है| मुख्य रूप से स्वाद चार प्रकार का होता है कड़वा, मीठा, नमकीन, खट्टा| अधिकांश खाद्य पदार्थों में स्वाद के अतिरिक्त गंध भी होती है| जिव्हा के आगे का भाग मीठे वे नमकीन स्वाद का अनुभव नहीं कराता क्योंकि यहां पर स्वाद का मध्य भाग किसी भी प्रकार के स्वाद का अनुभव नहीं करता क्योंकि यहां पर कलिकाओं का अभाव रहता है कुछ वैज्ञानिक धात्विक और छारीय स्वादों को भी इस वर्ग में सम्मिलित करते हैं|  स्वाद का मुख्य अंग जिव्हा है क्योंकि स्वाद के संग्राहक इसी में निहित होते है|

  1. नासिका(Nose)

नासिका भी अन्य ज्ञानेंद्रियों की तरह महत्वपूर्ण ज्ञानेंद्रि है| यह घ्राण संवेदना के ज्ञान का अंगक है| सुगंध और दुर्गंध की अनुभूति नासिका के द्वारा होती है| घ्राण संवेदना एक रासायनिक संवेदना है| सूंघने की क्रिया के लिए वस्तु की अवस्था गैस के रुप में होना आवश्यक है|  जब यह गैस  नासिका गुहा में अग्रेसित होती है तो घ्राण क्षेत्र की कोशिकाएं उत्तेजित हो जाती हैं एवं घ्राण का अनुभव होने लगता है घ्राण संवेदना तभी सींव है जब गैस का नाक की श्लेष्मा के साव में घुलनशील स्थिति में आ जाए| नासिका गुहा में गैस या कण वायु के माध्यम से पहुंचते हैं|


नाक द्वारा जोर से खींची गई गैस अधिक मात्रा तथा तीव्र गति से नासिका गुहा में जाती है जिससे गंध का अनुभव तुरंत हो जाता है, यहां तक कभी-कभी गंध असहनीय हो जाती है| नाक ऊपरी हिस्से पर लगाए गए रासायनिक पदार्थ की गंध नासिका द्वारा सरलता से अनुभव कि जा सकती है| घ्राण प्रदेश से आने वाली सूक्ष्म तंतु वृक्षायन द्वारा घ्राण बल्ब के तंतु से मिले रहते हैं| घ्राण बल्ब मस्तिष्क का भी बाहर निकला हुआ भाग है, जो की एथमायड अस्थि की प्लेट के ऊपर उपस्थित होता है| घ्राण बल्ब से संवेदन घ्राण पथ में पहुंचता है| घ्राण तंत्र अनेक केन्द्र्कों में प्रसारित होते हुए अनंत में घ्राण केंद्र में पहुंचता है यह केंद्र प्रममस्तिष्क में स्थित होता है तथा यहीं पर घ्राण संवेदन ग्रहण किये जाते हैं|

  1. त्वचा

त्वचा शरीर की सतह पर एक सुरक्षात्मक आवरण होता है| यह उन गुहाओं की उपकला से संबंध रखती है जिनके द्वारा त्वचा पर खुलते हैं| त्वचा में स्पर्श तंत्रिका अंताग स्थित होते हैं| यह शरीर के तापमान तथा शरीर में होने वाली जल हानि को नियंत्रित करती है| त्वचा स्पर्श संवेदन की महत्वपूर्ण ज्ञानेंद्रिय है| संवेदन के अनुभव के लिए संबंधित संवेदी तंत्रिकाओं में उत्तेजना आवश्यक है| इस प्रकार उत्पन्न उत्तेजना मस्तिष्क में परेषित होने के पश्चात केंद्रीय तंत्रिका तंत्र उसका विश्लेषण करती है एवं मस्तिष्क द्वारा उस विशेष संवेदना का अनुभव होता है त्वचा को दो स्तरों में विभाजित किया जाता है, बाह्य त्वचा, अंत:स्तत्वचा