1857 Ki Kranti

1857 की क्रांति:                                                         –

1857 तक भारत में ब्रिटिश सरकार के 100 वर्ष पूरे हो गये थे,इस दौरान ब्रिटिश शासन के विरुद्ध असंतोष के कारण अधिकांश विद्रोह हुए|जबकि किसानों ने भू-राजस्व नीति के कारण विद्रोह किए|इनमे से प्रमुख थे-

वेल्लोर विद्रोह-(1806)-यह विद्रोह भारतीय सैनिको ने अंग्रेजो द्वारा उनके सामाजिक,धार्मिक रीति रिवाजो में हस्तक्षेप के कारण किया|

बैरकपुर विद्रोह (1824)-47 वी रेजीमेंट ने बर्मा में सेवा देने से मना कर दिया|

1849 में सांतवी बंगाल कैवलरी ,64वी. रेजीमेंट और 22 वी रेजीमेंट का विद्रोह|

1850 में 66 वी.NI व 1852 में 38 वी NI का विद्रोह|

1857 में होने वाला सैनिक विद्रोह भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सर्वाधिक शक्तिशाली विद्रोह था.जिसने स्वतंत्रता आन्दिलं का रूप धारण कर लिया था|

विद्रोह के कारण –

1857 में हुए विद्रोह का सर्वप्रमुख व तात्कालिक कारण सैनिको को चर्बीयुक्त कारतूस उपयोग करने के लिए दिया जाना था,इसके अलावा विद्रोह का कारण भारतीय सैनिको व जनता में अंग्रेजो के प्रति काफी असंतोष था जो धीरे-धीरे अंदर ही जमा हो रहा था,बस इसे एक चिंगारी की आवश्यकता थी जो चर्बी वाले कारतूसों ने प्रदान कर दी|इस विद्रोह के समय बारत के गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग थे|जबकि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री लार्ड पामर्स्टन थे|

1857 की क्रांति की पृष्ठभूमि में निम्नलिखित कारण विद्यमान थे-

1.राजनैतिक कारण –क्रांति के राजनैतिक कारणों में दो प्रमुख कारण थे-a-वेलेजली की सहायक सन्धियाँ  b. डलहौजी की व्यपगत नीतियाँ

व्यपगत नीति अथवा राज्य हडप नीति के तहत भारतीय राज्यों का तीन श्रेनियो वर्गीकरण किया गया|व्यपगत नीति के अनुसार जिस रियासत के राजा के कोई सन्तान नही होगी उसके राज्य को राजा की मृत्यु के बाद अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया जाएगा|राजा की विधवा को पुत्र गोद लेने का अधिकार नही था|इस नीति के तहत डलहौजी ने सतारा(1848),जैतपुर,सम्भलपुर(1849),बघाट(1850),उदयपुर (1852),झांसी(1853),नागपुर(1854) को अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया|

डलहौजी द्वारा राजस्थान की करौली रियासत को अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाये जाने को कोर्ट आफ डायरेक्टर्स ने यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि करौली संरक्षित मित्र है न किआश्रित राज्य|इसी प्रकार उदयपुर और बघाट के विलय के सम्बन्ध में लिए गये डलहौजी के निर्णय को लार्ड कैनिंग ने निरस्त कर दिया|

डलहौजी ने अवध को कुशासन का आरोप लगाकर हडप लिया था|

पेशवा बाजीराव द्वितीय की मृत्यु के बाद उसके पुत्र नाना साहेब की पेंशन को डलहौजी ने बंद कर दिया|क्योंकि वह पेंशन  निजी रूप से बाजीराव द्वितीय को दी गई थी ना कि पेशवा को|

डलहौजी ने कर्नाटक व तंजौर के नवाबो की राजकीय उपाधियाँ जब्त कर ली|

लार्ड डलहौजी ने 1849 में घोषणा की कि मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी शहजादे को मुगल महल (लाल किला) छोड़ना पड़ेगा तथा उसे कुतुबमीनार के पास एक छोटे से महान में रहना होगा|1856 में कैनिंग ने यह घोषणा की कि बहादुर शाह की मृत्यु के बाद मुगलों से सम्राट की पदवी छीन ली जायेगीं|और वे सिर्फ राजा कहलायेंगे|इन सभी कारणों से राजाओं व जनता में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आक्रोश व्याप्त हो गया था|

2.प्रशासनिक कारण – भारतीयों को प्रशासन में उच्च पदों से वंचित कर दिया गया|कोई भी भारतीय सेना में सूबेदार से ऊँचे पद पर नहीं पहुंच सकता था|न्यायिक क्षेत्र में भी अंग्रेजो को भारतीयों से श्रेष्ठ दर्जा दिया गया|

3.सामाजिक व धार्मिक कारण :- रुढ़िवादी भारतीयों ने सामाजिक सुधारों का विरोध किया|साथ ही ईसाईं मिशनरियों को 1813 के चार्टर एक्ट द्वारा भारत में धर्म प्रचार की अनुमति मिल गई|उन्होंने धर्मांतरण के प्रयास किये|इसने भी भारतीयों को नाराज कर दिया|

1850 में धार्मिक निर्योग्यता अधिनियम संख्या-21 द्वारा ईसाई धर्म ग्रहण करने वाले लोगों को पैत्रक सम्पत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता था|इससे लोगों को यह लगने लगा कि भारत को ईसाईं देश बनाने की कोशिश की जा रही हैं|

  1. आर्थिक कारण –अंग्रेजो की आर्थिक नीतियों के कारण भारत के उद्योग व व्यापार नष्ट होने लगे थे |इसके अलावा मनमाना लगान व कठोर भू-राजस्व नीति के कारण लोगों के आर्थिक उत्पीडन ने असंतोष को जन्म दिया|जिससे विद्रोह की भूमिका तैयार होने लगी|

  2. सैनिक कारण –भारतीयों को समुन्द्र पार जाने पर दिया जाने वाला भत्ता बंद कर दिया गया|तथा 1854 के डाकघर अधिनियम द्वारा सैनिको को दी जाने वाली नि:शुल्क डाक सुविधा समाप्त कर दी गई|

विद्रोह की योजना व आरम्भ :-इस क्रांति के मुख्य योजनाकार नाना साहब व अजीमुल्ला खां व रानोजी बापू को माना जाता है| इन्होने 31 मई को क्रांति शुरू करने का दिन चुना था|तथा इसके प्रतिक के रूप में कमल का फूल व रोटी को चुना गया|कमल का फूल विद्रोह में शामिल होने वाली सभी सैनिक टुकड़ियों में पहुचायाँ गया|रोटी को एक गाँव का चौकीदार दूसरे गाँव के चौकीदार तक पहुचाता था|

चर्बी वाले कारतूसो के प्रयोग के विरुद्ध पहली घटना कलकत्ता के पास बैरकपुर छावनी में 29 मार्च 1857 को घटी,जब 34 वी नेटिव इन्फेंट्री रेजिमेंट के एक सिपाही मंगल पांडे ने चर्बी वाले कारतूसो के प्रयोग से नमा करते हुए लेफ्टिनेंट बाग़ व सार्जेंट मेजर ह्रुसन की हत्या कर दी|

मंगल पांडे उत्तर प्रदेश के गाजीपुर (वर्तमान बलिया)जिले का रहने वाला था,इस घटना के आरोप में 8 अप्रैल 1857 को मंगल पांडे को फांसी डे दी गई|

10 मई 1857 को मेरठ छावनी में 20 वी एन.आई. के पैदल सैनिको ने चर्बी वाले कारतूसों के प्रयोग से इनकार कर विद्रोह कर दिया|और अपने बंदी साथियों को मुक्त कराकर दिल्ली प्रस्थान किया|

12 मई को विद्रोहियों ने दिल्ली पर कब्जा कर बहादुर शाह जफर को भारत का बादशाह व विद्रोह का नेता घोषित कर दिया|

4 जून को झांसी में राजा गंगाधर राव की विधवा रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में विद्रोह की शुरुआत हुई|झांसी के पतन के बाद रानी ग्वालियर की ओर चली गई|17 जून 1858 को अंग्रेज जनरल हौरोज से लडती हुई शहीद हो गई|इस पर जनरल ने कहा कि भारतीय क्रांतिकारियों में यहाँ सोई हुई औरत अकेली मर्द है|

ग्वालियर में तांत्या टोपे ने विद्रोह का नेतृत्व किया|ये नाना साहब का सेनापति भी थे|ये ग्वालियर के पतन के बाद राजस्थान भी आये|इनको अप्रैल 1859 में इनके मित्र ने विश्वास घात करके पकडवा दिया और इनको 18 अप्रैल को फांसी डे दी गई|

पंजाब में नामधारी सिखों ने सशस्त्र विद्रोह किया|जबकि बरेली में कहां बहादुर खान व हरियाणा में राव तुलाराम ने क्रांति का नेतृत्व किया|

लखनऊ में बेगम हजरत महल के नेतृत्व में 4 जून 1857 को विद्रोह की शुरुआत हुई|भारतीय सैनिको ने लखनऊ के ब्रिटिश रेजीडेंसी को घेरकर अवध के चीफ कमिश्नर हेनरी लारेंस की हत्या कर दी|

21 मार्च 1858 को कालिन कैम्पबेल ने जंग बहादुर के नेतृत्व में गोरखा रेजिमेंट की सहायता से लखनऊ पुन: जीता |बेगम हजरत महल पराजित होने पर नेपाल चली गई व गुमनामी में ही मर गई|

कानपुर में विद्रोह की शुरुआत 5 जून 1857 को नाना साहब के नेतृत्व में हुई|तात्यां टोपे ने उनकी सहायता की|16 दिसम्बर 1857 को कैम्पबेल का कानपुर पर अधिकार हो गया|नाना साहब भी पराजित होकर नेपाल चले गये|

जगदीशपुर (बिहार) में कुंवर सिंह ने विद्रोह किया|युद्ध में जख्मी हो जाने के बाद 26 अप्रैल 1858 को उनकी मृत्यु हो गई|

फैजाबाद में मौलवी अहमदुल्ला ने विद्रोह का नेतृत्व किया जबकि बरेली में खान बहादुर खान ने नेतृत्व किया|

दिल्ली में अंतिम मुगल बादशाह बहादुरशाह ने बख्त खां के सहयोग से नेतृत्व किया|20 सितम्बर 1857 को ले.हडसन ने बादशाह को हुमायु के मकबरे से गिरफ्तार कर लिया और उनको  उनकी बेगम के साथ रंगून भेज दिया|जहां 7 नवम्बर 1862 को उनकी मृत्यु हो गई|

दक्षिणी भारत,पंजाब,बंगाल,राजस्थान व महाराष्ट्र के अधिकांश भाग विद्रोह से अलग रहे|यहाँ के जमीदारों ने शासको के विरुद्ध होने वाले विद्रोह को कुचलने में अंग्रेजो की मदद की|

विद्रोह की असफलता के कारण –

1.विद्रोहियों के पास योग्य व कुशल नेतृत्व की कमी थी जबकि अंग्रेज सेनापति अधिक कुशल थे|

2.विद्रोह करने का अलग-अलग समय व सीमित क्षेत्र

3.शिक्षित व मध्यम वर्ग व व्यापारियों ने भी विद्रोहियों का साथ नही दिया

4.विद्रिहियो के पास सुनियोजित योजना व भविष्य का कोई दृष्टिकोण नही था|

विभिन्न विचारको के विचार –

रीज ने इसे कट्टरपंथीयों का ईसाईंयत के विरुद्ध संग्राम कहा|

डा.ताराचंद ने राष्ट्रीय विप्लव कहा|

टी.आर. होम्स ने सभ्यता और बर्बरता के मध्य संघर्ष कहा|

वी.डी.सावरकर ने भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा|

अशोक मेहता ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए सुनियोजित संग्राम कहा|

डा.रमेश मजूमदार ने अनुसार तथाकथित प्रथम राष्ट्रीय संग्राम न तो पहला ही,न ही राष्ट्रीय तथा न ही स्वतंत्रता संग्राम था |